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जलवायु परिवर्तन: भारत कोयले के बिना क्यों नहीं रह सकता है?
- Author, रजनी वैद्यनाथन
- पदनाम, बीबीसी दक्षिण एशिया संवाददाता
भारत दुनिया का ऐसा तीसरा सबसे बड़ा देश है जो बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधनों को निकालता है और उसमें भी वो सबसे अधिक कोयला निकालता है.
दुनिया के बड़े देश मांग कर रहे हैं कि कोयले का खनन कम किया जाना चाहिए. यह भारत जैसे तेज़ी से विकास कर रहे देश के लिए कितना मुश्किल है कि वो अपने सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत को खो दे?
भारत में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों को ऐसे समझा जा सकता है कि 2006 में मेरी शौनक नामक एक युवा व्यवसायी से बात हुई थी.
उन्होंने कहा था, "भारतीयों से ही क्यों कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कहा जाता है जबकि पश्चिम दशकों से धरती को प्रदूषित कर रहा है और लाभ उठाया है."
वो तेज़-तर्रार उद्यमी मुंबई की एक जूते की फ़ैक्ट्री के मालिक थे, उन्होंने स्वीकार किया था कि ये हवा में गंदी गैस भर रहा है.
उन्होंने कहा, "मैं इन जूतों को ब्रिटेन और अमेरिका में निर्याता करता हूं. ये इस तरह है कि पश्चिम अपना उत्सर्जन विकासशील देशों में भेज रहा है तो हमें क्यों रुकना चाहिए?"
हालांकि, तब से बहुत कुछ बदल गया है. वैश्विक कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है और भारत की जनसंख्या और अर्थव्यवस्था भी तेज़ी से बढ़ रही है.
पश्चिम लगातार भारत से कार्बन उत्सर्जन कम करने का आग्रह कर रहा है और उसमें भी उसका ध्यान उसके सबसे ज़रूरी स्रोत कोयले पर है. ये सबसे गंदे ईंधनों में से एक है. भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में इसकी भागीदारी 70% है.
स्थानीय समुदायों के लिए लाइफ़लाइन
ओडिशा के तालचेर ज़िले की एक खदान के बाहर अभी सूर्योदय होने ही वाला है और सजे-धजे ट्रकों में कोयला पूरी तरह भरा हुआ है. तभी एक ट्रेन शोर मचाती हुई वहां से गुज़रती है जो देशभर में कोयला ले जाती है.
चमकदार गुलाबी साड़ियों में महिलाओं का एक समूह हाथों से कोयला इकट्ठा कर रहा है. अपने सिर पर बंधी टोकरियों में कोयला डालने से पहले वो उसे बारीकी से देखती हैं. वहीं, पुरुष अपनी साइकिलों पर कोयले के भारी बोझ संभालते हुए ले जा रहे हैं.
ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कोयला उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 40 लाख लोग जुड़े हुए हैं जिन्हें इससे रोज़गार मिलता है. भारत का अधिकतर कोयला भंडार कोयला बेल्ट कहे जाने वाले झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों में है.
इन इलाक़ों में कोयला अर्थव्यवस्था का आधार है. ये स्थानीय समुदायों की लाइफ़लाइन भी है जो कि भारत के सबसे ग़रीब लोगों में से एक हैं.
ओडिशा में कोयला मज़दूरों के हितों को उठाने वाले यूनियन नेता सुदर्शन मोहंती कहते हैं, "भारत कोयले के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता है."
मोहंती की तरह ही देश के अधिकतर हिस्से में मौजूद कई लोगों का मानना है कि कोयले से स्वच्छ ऊर्जा संसाधनों की ओर जाने से पहले एक साफ़ रणनीति होनी चाहिए जो कि कोयले पर निर्भर लोगों के रोज़गार के लिए बंदोबस्त करे और उन्हें पीछे न छोड़ दे.
एक खुली खदान के मुहाने पर बात करते हुए उन्होंने मुझसे कहा कि इन खदानों का रास्ता साफ़ करने के लिए दशकों पहले कई परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा है.
उनका कहना है कि अगर ये खदानें हटा दी जाती हैं तो फिर उन लोगों पर एक बार फिर आजीविका संकट आ जाएगा.
वो कहते हैं, "अगर हम कोयले का उत्पादन विश्व समुदाय के दबाव में आकर बंद कर देते हैं तो हम अपनी आजीविका कैसे चलाएंगे?"
दूसरी ओर राख की एक घाटी बनी हुई थी जिसके दूसरी तरफ़ हरे पेड़ थे. उन्होंने उस ओर दिखाते हुए कहा कि फॉरेस्ट कवर बढ़ाने के लिए ये पेड़ लगाए गए हैं.
मोहंती कहते हैं, "हम पर्यावरण की चिंताएं भी मैनेज करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन जब कोयले के उत्पादन से समझौते की बात आती है तो यह असंभव है."
स्वच्छ ऊर्जा के लिए बाज़ार
बीते एक दशक में भारत की कोयले की खपत लगभग दोगुनी हो गई है. देश अच्छी गुणवत्ता का कोयला आयात कर रहा है और उसकी योजना आने वाले सालों में कई दर्जन नई खदान खोलने की है.
हालांकि, आज भी एक औसत भारतीय ब्रिटेन या अमेरिका की तुलना में बेहद कम बिजली की खपत कर पाता है.
इसके साथ ही भारत स्वच्छ ऊर्जा की ओर भी जा रहा है जिसमें उसका लक्ष्य 2030 तक ग़ैर-जीवाश्म ईंधन से 40% तक बिजली बनाना है.
दिल्ली स्थिति पर्यावरण के थिंक टैंक काउंसिल फ़ॉर एनर्जी, इनवायरमेंट एंड वाटर के अरुणाभ घोष कहते हैं कि देश ने इस दिशा में छलांग लगाई ज़रूर है.
उन्होंने दिल्ली मेट्रो सिस्टम का उदाहरण देते हुए कहा कि इसका रोज़ाना का संचालन 60% सौर ऊर्जा पर निर्भर है.
हालांकि घोष यह भी कहते हैं कि देश में नवीकरणीय ऊर्जा की परियोजना को बढ़ाने के लिए बाहर से निवेश लाना बेहद ज़रूरी है.
"ये मुक्त धन की बात नहीं है. ये बहुत साधारण है कि हम दुनिया में स्वच्छ ऊर्जा के निवेश के सबसे बड़े बाज़ार हैं और हम चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक आएं और पैसा निवेश करें और इसके बदले में अच्छे रिटर्न पाएं."
'कोई विकल्प नहीं है'
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा समिति के अनुसार, 1.3 अरब की आबादी वाले भारत में अगले 20 सालों में ऊर्जा की ज़रूरत किसी भी देश से सबसे अधिक होगी.
लेकिन ओडिशा के समुदाय हमें याद दिलाते हैं कि कोयले पर निर्भरता कम करने में कितनी बड़ी चुनौतियां हैं और उनको पाने के लिए बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.
कोयले की खदान के बाहर एक झुग्गी-झोपड़ी में चूल्हे पर जमुना मुंडा बैठी हुई हैं.
आजीविका के लिए कोयले की खदान में काम करने वाली जमुना उन 10 लाख से अधिक लोगों में शामिल हैं जिनके पास बिजली नहीं है लेकिन अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए कोयला ज़रूर है.
खाना बनाते हुए वो कहती हैं, "अगर हमारे पास कोयला नहीं होगा तो हम कैसे पका सकते हैं. रात में हम इसे जलाते हैं और इसे अपने घर में रखते हैं जिससे रोशनी मिलती है."
"अगर ये नुक़सानदेह है तो हम इसको लेकर क्या कर सकते हैं? हमारे पास कोयला इस्तेमाल करने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है."
भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं जो इससे असहमत होंगे उनका तर्क होगा कि देश नवीकरणीय ऊर्जा में लंबी छलांग लगा चुका है और उसके पास सौर ऊर्जा जैसे विकल्प भी हैं.
लेकिन तब भी एक राष्ट्र की कोयले पर इस तरह की निर्भरता दिखाती है कि कोयला-मुक्त भविष्य अभी बहुत दूर है.
जमुना से बात करते हुए उन्होंने मुझे शौनक से सालों पहले की गई बात याद दिला दी कि हम भारत को कोयले से कैसे अलग कर सकते हैं जबकि ये बहुत जटिल है.
ऊर्जा के भूखे इस देश में विकास अक्सर एक क़ीमत ही अदा करके पाया जाता है.
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