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जलवायु परिवर्तन: दुनिया में गर्मी का रिकॉर्ड टूटने पर क्या कहती है ये नई रिपोर्ट
- Author, डेविड शुकमन
- पदनाम, साइंस एडिटर, बीबीसी न्यूज़
इस बात की संभावना अब पहले से अधिक बढ़ गई है कि आने वाले पाँच वर्ष में दुनिया का तापमान बढ़कर एक नये स्तर तक पहुँच सकता है.
एक प्रमुख अध्ययन के बाद ये कहा गया है कि 2025 तक कोई एक वर्ष पूर्व-औद्योगिक काल से 1.5 डिग्री तक गर्म हो सकता है. इस अध्ययन के मुताबिक़, अब इसकी 40 प्रतिशत तक संभावना है.
यह तापमान जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के तहत निर्धारित दो तापमान सीमाओं से कम है.
यह अध्ययन विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के ज़रिये सामने आया है.
बताया गया है कि ये निष्कर्ष ब्रिटेन के मौसम विभाग के अलावा अमेरिका और चीन समेत दस देशों के शोधकर्ताओं के साझा अध्ययन पर आधारित है.
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, धरती का तापमान बढ़ने से बेमौसम बरसात, जंगलों की आग, चक्रवात और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के आने की संभावना बढ़ती है.
पिछले दशक में, यह अनुमान लगाया गया था कि किसी एक वर्ष में तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ने की संभावना केवल 20 प्रतिशत होगी. लेकिन नये अध्ययन में इसकी संभावना बढ़कर 40 प्रतिशत हो गई है.
ब्रिटेन के वरिष्ठ मौसम विज्ञानी लियन हरमैनसन ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "जब हम 1850-1900 के समय के तापमान से तुलना करते हैं तो अंतर साफ़ दिखाई देता है. इस दौरान तापमान बढ़ा है और ताज़ा अध्ययन यह बताता है कि हम 1.5 डिग्री के क़रीब पहुँच रहे हैं. यह कुछ कड़े निर्णय लेने का समय है ताकि समय हमारे हाथ से ना निकल जाये."
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले पाँच वर्षों में से किसी एक वर्ष में तापमान इस तरह बढ़ना फिर भी एक अस्थायी अवस्था है. लेकिन अब हमारे पास सिर्फ़ एक या दो दशक का समय है जब हम पूरी तरह 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को हमेशा के लिए पार कर देंगे.
दुनिया के सामने क्या हैं लक्ष्य?
पेरिस समझौते के तहत वैश्विक औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि ना होने देने और 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार ना करने के प्रयास करने का लक्ष्य स्थापित किया था और यह किसी एक वर्ष के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए है.
लंदन के इंपीरियल कॉलेज में ग्रांथम इंस्टिट्यूट के शोध निदेशक डॉक्टर जोएरी रोगेल्ज के अनुसार, मौसम विभाग की इस घोषणा में बताये गए 1.5 डिग्री सेल्सियस की तुलना पेरिस समझौते में शामिल 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से नहीं की जा सकती.
उन्होंने कहा कि पेरिस समझौते में ग्लोबल वॉर्मिंग (जलवायु परिवर्तन) की बात की जाती है जिसमें हमारे ग्रह का तापमान साल दर साल एक जैसा रखने का प्रयास किया जाता है. एक ही साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस के बदलाव से ना सिर्फ़ पेरिस समझौते का उल्लंघन होता है, बल्कि यह हम सबके लिए एक बहुत बुरी ख़बर भी है.
उन्होंने कहा, "यह हमें एक बार फिर से बताता है कि अपनी जलवायु की सुरक्षा के लिए किये गए हमारे प्रयास नाकाफ़ी हैं. हमें अपने उत्सर्जन को जल्द से जल्द शून्य तक लाना पड़ेगा ताकि जलवायु परिवर्तन को रोका जा सके."
साल 2018 में संयुक्त राष्ट्र के एक पैनल ने एक ऐतिहासिक रिपोर्ट में बताया था कि कैसे हमारे ग्रह के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की वृद्धि हमारी जलवायु पर बहुत बुरा असर डाल सकती है.
अभी के अनुमानों के अनुसार, ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए किये गए प्रयासों के बावजूद, हमारे ग्रह का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पेटेरी तालास ने कहा है कि इस नये शोध के परिणाम सिर्फ़ नंबर नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक हैं.
उन्होंने कहा, "इस अध्ययन से पता चलता है कि हम निश्चित रूप से पेरिस समझौते में लिखी गई जलवायु परिवर्तन की निचली सीमा तक पहुँच रहे हैं. ये दुनिया के लिए एक और चेतावनी है कि हमें ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के अपने प्रयासों को तेज़ी से बढ़ाना होगा और कार्बन न्यूट्रल बनना पड़ेगा."
'1.5 डिग्री कोई जादूई आंकड़ा नहीं'
यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग के एक जलवायु वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एड हॉकिन्स ने बताया कि अगर ये नया पूर्वानुमान सही साबित होता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम पेरिस समझौते की सीमा को पार जायेंगे.
वो बताते हैं कि साल 2016 में भी दो अलग-अलग महीनों के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस का उछाल देखा गया था.
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, एक साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा गर्म महीनों की संख्या बढ़ेगी. फिर ऐसा और ज़्यादा होगा, फिर शायद यह तापमान दो-तीन साल के लिए बढ़ जायेगा और कुछ समय बाद हर साल यह तापमान बढ़ा हुआ ही रहेगा.
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उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि 1.5 डिग्री सेल्सियस कोई 'जादुई नंबर' नहीं है जिससे हमें दूर रहना है. अगर इसकी तुलना साधारण जीवन से की जाये तो जलवायु परिवर्तन किसी खाई की तरह नहीं है जो एक किनारे पहुँचकर हम नीचे गिर जायेंगे, बल्कि हम एक ढलान पर हैं और जैसे-जैसे नीचे पहुँच रहे हैं, वैसे-वैसे चीज़ें हमारे लिए ख़राब होती जा रही हैं.
वो कहते हैं, "हमें बढ़ते हुए तापमान को रोकना ही होगा. हमें इस बात को पहचानने की ज़रूरत है कि जलवायु परिवर्तन का असर पूरी दुनिया में देखा जा सकता है और यह आने वाले समय में ख़राब ही होगा."
यह नई रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन पर होने वाले सीओपी-26 सम्मेलन के नज़दीक आई है. यह सम्मेलन ग्लास्गो में इस साल नवंबर में आयोजित होगा.
इस सम्मेलन का लक्ष्य ग्लोबल लीडर्स को जलवायु संकट को हल करने के लिए प्रेरित करना है.
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