ब्रिटेन का प्रधानमंत्री अब कोई क्यों ही बनना चाहेगा?

    • Author, लॉरा क्वेंसबर्ग
    • पदनाम, प्रेज़ेंटर संडे विद लॉरा क्वेंसबर्ग

दुनिया में कोई भी, ख़ासकर वो जो कंज़रवेटिव पार्टी का नेतृत्व हासिल करना चाहते हैं, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्यों बनना चाहेंगे?

ठीक है, प्रधानमंत्री को केंद्रीय लंदन में शानदार जॉर्जियाई घर, सैकड़ों कर्मचारी, निजी यात्राएं और हर सप्ताह किंग से मिलने का मौका मिलता है.

आपको कुछ अच्छा करने और लोगों का जीवन बेहतर करने का मौका भी मिलता है. और जो भी है, इतिहास में तो आपकी जगह पक्की हो ही जाती है.

लेकिन क्यों, अभी क्यों, कोई भी जिसका दिमाग़ ठीक होगा, वो अपनी दावेदारी नेतृत्व के चुनाव के लिए पेश करेगा ताकि उसे सर्वोच्च पद मिल सके?

जब मैंने यही सवाल, हाल ही में डाउनिंग स्ट्रीट के एक अनुभवी कर्मचारी से पूछा तो उसका जवाब था, 'ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं पता.'

नए ब्रितानी प्रधानमंत्री के सामने कई मुश्किल चुनौतियां और सवाल होंगे. इनमें सबसे मुश्किल है ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति.

ब्रिटेन ग़रीब होता जा रहा है और देश की जनता इसे महसूस कर रही है- या एक कैबिनेट मंत्री के शब्दों में कहें तो, "हमारे सामने वो सब समस्याएं हैं जो पहले से थीं और अब आर्थिक संकट भी है."

अल्पकाल के लिए प्रधानमंत्री रहीं लिज़ ट्रस के प्रशासन ने जो मुश्किल हालात पैदा किए हैं उन्होंने कंज़रवेटिव पार्टी को संकट में डाल दिया है. उनके फ़ैसले, और फिर उनसे पीछे हटने की वजह से ब्रिटेन को वित्तीय बाज़ार के हाथों क्रूर व्यवहार सहने के लिए मजबूर कर दिया.

पार्टी अनियंत्रित हो गई है?

ब्रिटेन में परिवार और कंपनियां ख़र्च पूरे करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और कईयों को लगता है कि जो वित्तीय मुश्किलें वो झेल रहे हैं उनके लिए कंज़रवेटिव पार्टी ज़िम्मेदार है.

और जो भी ब्रितानी प्रधानमंत्री का पद संभालेगा, उसके पास सेवाओं पर ख़र्च करने के लिए कम पैसा होगा.

नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) गंभीर दबाव में है, इसी तरह बुज़ुर्गों और विकलांगों के लिए काम करने वाली सेवाएं भी दबाव में हैं.

शिक्षा सेवाएं भी कोविड के बाद उबरने की कोशिश कर रही हैं.

यातायात सेवाएं लचर हैं, और इमारतें बनाने के सामने कठोर चुनौतियां हैं, साथ ही जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा आपूर्ति की समस्या भी है.

ये समस्याएं आपको मानसिक तनाव में ला सकती हैं और इनकी सूची लंबी होती जा रही है.

ये कल्पना करना भी भोलापन ही होगा कि जनता के लिए बजट कम होने से कई सरकारी विभागों के लिए वो काम करने मुश्किल हो जाएंगे जो जनता के लिए करने ज़रूरी हैं.

वित्त मंत्री जेरेमी हंट ने कहा है कि कुछ मुश्किल फ़ैसले लेने पड़ेंगे और इसके अपने कारण हैं.

कटौतियां होने जा रही हैं, लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं है, महंगाई भी लगातार बढ़ रही है.

और विदेशी मोर्चे पर, ब्रिटेन का यूक्रेन का समर्थन जारी रखने से पीछे हटने का सवाल ही नहीं है. अभी इन सवालों का जवाब भी नहीं मिला है कि ये युद्ध कब तक खिंचेगा और इसका नतीजा क्या होगा या ये कैसे समाप्त होगा.

ब्रिटेन और उसके सहयोगी चीन से कैसे निबटें? और ब्रेक्ज़िट के दौरान आयरलैंड सीमा को लेकर यूरोपीय संघ के साथ विवाद का निबटारा अभी बाक़ी है.

काग़ज़ पर देखा जाए तो नए प्रधानमंत्री के पास इन समस्याओं का समाधान करने के लिए राजनीतिक क़ाबिलियत होनी चाहिए, क्योंकि कंज़रवेटिव पार्टी के पास संसद में विशाल और ऐतिहासिक बहुमत है.

लेकिन कंज़रवेटिव पार्टी की अंदरूनी राजनीति और खींचतान की वजह से ये विशाल बहुमत भी काल्पनिक ही लगता है. एक कैबिनेट मंत्री कहते हैं, "पार्टी अनियंत्रित हो गई है."

'एक बुरा ख़्वाब जो ख़त्म नहीं हो रहा'

और यहां अगला प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे उम्मीदवारों का व्यक्तित्व आ जाता है (माफ़ कीजिएगा, आपमें से कुछ लोग ये चाहते हैं कि ये चरित्र के बारे में ना हो, लेकिन ये सौदे का हिस्सा है).

सबसे बड़ा व्यक्तित्व बोरिस जॉनसन का है- जिन्हें कुछ महीने पहले उनके साथियों ने पद से हटा दिया था.

हालांकि, कंज़रवेटिव पार्टी के कुछ सांसद हैं, जो बोरिस जॉनसन के पद छोड़ने के समय तालियां बजा रहे थे, कुछ की आंखों में तो आंसू तक आ गए थे, उन्हें लगता है कि बोरिस जॉनसन ही अभी की परिस्थितियों का जवाब हैं.

कैबिनेट में उनका समर्थन करने वाले एक सदस्य कहते हैं, "2019 में भी ये हमारे अस्तित्व का सवाल था, अब भी ये हमारे अस्तित्व का सवाल ही है."

मज़ाकिया लहजे में वो कहते हैं, "हम लज़ारस के बाद सबसे बड़ी वापसी की तैयारी कर रहे हैं."

(माना जाता है कि ईसा मसीह ने मौत के चार दिन बाद लज़ारस को ज़िंदा कर दिया था)

इस बारे मैं सैकड़ों लेख लिखे जा चुके हैं कि क्या ये सही विचार है या संभव भी है या नहीं.

मान लेते हैं कि ऐसा हो जाता है. उनके कई सहकर्मियों के लिए ये बेहद मुश्किल होगा, और उन सांसदों के लिए ये गंभीर शर्मिंदगी की बात होगी, इनमें कुछ उनके समर्थक भी शामिल हैं, जो सार्वजनिक रूप से जॉनसन से पद छोड़ने के लिए कह रहे थे.

एक पूर्व मंत्री चिंता ज़ाहिर करते हैं, "आधी कंज़रवेटिव पार्टी निराश होगी और 90 फ़ीसदी देश इससे निराश होगा."

एक अन्य सांसद कहते हैं, "मैं ये सोचता रहता हूं कि मैं ऐसे दुस्वपन में हूं जो ख़त्म ही नहीं हो रहा है, और फिर मुझे अहसास होता है कि मैं ऐसी ही स्थिति में हूं. मैं अपने साथियों से पूछता रहता हूं कि क्या उनकी भी याद्दाश्त जा रही है."

इसमें कोई शक नहीं है कि बोरिस जॉनसल सबसे बड़े राजनीतिक सेलिब्रिटी हैं. लेकिन उनके साथ काम करने वाले बहुत से लोगों को लगता है कि ये लोकप्रियता नहीं है बल्कि बदनामी है.

पिछली बार वो अपने नेतृत्व में पार्टी को एकजुट नहीं रख पाए थे, ऐसे में वो इस बार रख पाएंगे इसकी कितनी गारंटी है? बाइबल के मुताबिक लज़ारस को भले ही मौत के बाद ज़िंदा कर दिया गया हो, लेकिन ये भी कहा गया है कि फिर वो कभी हंसे नहीं थे.

लेकिन पूर्व वित्त मंत्री ऋषि सुनक के लिए भी ख़तरा इतना ही है. सुनक सांसदों के पसंदीदा भी साबित हो सकते हैं.

कुछ लोग उन्हें बोरिस जॉनसन के पतन के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं और कभी भी उन्हें अपना नेता नहीं स्वीकार कर पाएंगे. एक सूत्र चेताते हुए कहते हैं, "कंज़रवेटिव पार्टी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो सुनक के नेतृत्व में काम नहीं करेगा."

सुनक और बोरिस जॉनसन कैंप एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं- दोनों के लिए ही पार्टी को एकजुट करना मुश्किल होगा, एक कैबिनेट मंत्री के मुताबिक इससे "तर्क-वितर्क का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाएगा."

और इसी वजह से पेनी मोर्डोंट के समर्थकों को लगता है कि वो प्रधानमंत्री की रेस जीत सकती हैं. उनके पीछे कोई कड़वाहट भरा इतिहास नहीं है और वो एक टीम कप्तान की तरह अपने नेतृत्व में पार्टी को एकजुट कर सकती हैं.

महामानव नेतृत्व की ज़रूरत

लेकिन अभी ये भी स्पष्ट नहीं है कि अगर आपसे कोई नफ़रत नहीं करता है तो क्या इसका मतलब ये है कि आपको पर्याप्त पसंद किया जा रहा है.

और फिर मतदान भी होना है. कंज़रवेटिव पार्टी की रेटिंग पहले ही धड़ाम हो चुकी है. क्या वो फिर से वापसी कर पाएगी? ज़ाहिर है, कुछ भी संभव है.

लेकिन पोल तो ये बता रहे हैं कि कंज़रवेटिव पार्टी के लिए तबाही है. ये सिर्फ़ कोई मामूली झटका नहीं होगा, इससे उबरने के लिए पार्टी को महामानव नेतृत्व की ज़रूरत होगी.

जनता, और ये सही भी है, वेस्टमिंस्टर में क्या हो रहा है इससे अधिक परवाह अन्य रोचक चीज़ों की करती है. लेकिन इस बार जनता का ध्यान राजनीतिक घटनाक्रम पर है और जनता कंज़रवेटिव पार्टी में जो चल रहा है और पार्टी जो कर रही है उससे नाराज़ है.

ऐसे में कोई भी प्रधानमंत्री क्यों ही बनना चाहेगा?

यही राजनीति है. ये सेवा करने के लिए उच्च विचारों के आह्वान और महत्वाकांक्षा की वासना का मिश्रण है.

या फिर एक पूर्व वरिष्ठ मंत्री के शब्दों में कहें तो, "कंज़रवेटिव पार्टी में हमेशा कोई ना कोई ऐसा ज़रूर होता है जिसे लगता है कि वो सभी संकटों का समाधान करके ख़ुशहाली ला सकता है."

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