ईरानः प्रदर्शनकारी महिलाओं की आंखों देखी, 'दमन के साथ बढ़ रहा है गुस्सा'

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, एना फोस्टर और जेवान आबदी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
ईरान में हिजाब के विरोध में जारी प्रदर्शनों के केंद्र में महिलाएं हैं. 22 वर्षीय महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद से ईरान की नई पीढ़ी आक्रोशित है.
महिलाएं नए अधिकारों और आज़ादी की मांग कर रही हैं. हालिया विरोध प्रदर्शनों को ईरान में पिछले कई साल में हुए प्रदर्शनों में सबसे बड़ा बताया जा रहा है.
हालांकि, कई प्रदर्शनकारियों का ये भी कहना है कि सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के 'स्पष्ट ख़तरे' हैं.
विरोध प्रदर्शनों को लेकर पश्चिमी ईरान की तीन महिलाओं ने अपने अनुभव साझा कर रही हैं. सुरक्षा की वजह से हमने उनकी पहचान बदल दी है.

नील, 24, बुकान से
मैं इन प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हूं और मैंने इन्हें बहुत क़रीब से देखा है. ऐसे प्रदर्शन में शामिल होने का ये मेरा पहला अनुभव है और मैं बहुत हैरान हूं.
लोगों के नारे लगाने से पहले ही पुलिस गोली चलाना शुरू कर देती है. वो शॉटगन का इस्तेमाल करते हैं.
मैंने उन्हें लोगों पर लाठियों से हमला करते हुए अपनी आंखों से देखा है. मैं बहुत क़रीब थी. वो मुझ पर भी हमला कर सकते थे. लेकिन हम किसी तरह बच गए.
अब रोज़ाना की ज़िंदगी वैसी नहीं है जैसी पहले थी. शाम ढलने से पहले ही अब दुकानें बंद हो जाती हैं. पहले ये पूरी रात खुला करती थीं. सड़कों पर अब पहले से कम वाहन होते हैं. पहले आधी रात तक सड़कों पर गाड़ियों की भीड़ रहती थी.
अब लोगों की गाड़ियों और घरों पर भी हमले हो रहे हैं.
मुझे पूरा विश्वास है कि हम कामयाब होंगे. लोग बहुत बहादुर हैं. भले ही सरकार कितनी भी बर्बर क्यों ना हो. मैं इस बात को लेकर निश्चिंत हूं कि सरकार लोगों का हमेशा दमन नहीं कर सकती है.
मैं सिर्फ़ ये कहना चाहती हूं कि पुलिस बहुत बर्बरता कर रही है. उन्होंने मेरी आंखों के सामने बुज़ुर्ग लोगों तक पर हमले किए हैं. उन्होंने महिलाओं पर हमले किए हैं.
वो ख़ास तौर पर सिर पर वार करते हैं. वो महिलाओं पर और अधिक बर्बरता से हमला करते हैं.
लेकिन एक सबसे अहम बात ये है कि मैंने पुलिसवालों की आंखों के सामने अपना हिजाब उतारा और मैं ठीक उनके सामने से होकर गुज़री.
मैंने अन्य महिलाओं को भी ऐसा ही करते हुए देखा है. पुलिस कुछ भी नहीं कह पाई. ये इस बात का संकेत है कि हम जीत रहे हैं.

रोजानो, 45, सनानदेज की महिला अधिकार कार्यकर्ता और लेखिका
प्रदर्शन के पहले दिन, जब लोग इकट्ठा होना शुरू हुए, तब प्रदर्शन में 90 प्रतिशत महिलाएं थीं. शुरुआत में, सुरक्षाबल उन पुरुषों को निशाना बना रहे थे और उनका दमन कर रहे थे जो महिलाओं के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हुए थे.
प्रदर्शन के दौरान सबसे पहला नारा था, 'महिला, ज़िंदगी और आज़ादी.' सभी जगहें महिलाओं से भरी थीं, वो महिलाएं जिनका दमन किया जा रहा था, जिन्हें पीटा जा रहा था लेकिन ये महिलाएं पुलिस की लाठियों से नहीं डर रहीं थीं. पुलिस बल महिलाओं से घर जाने के लिए कह रहे थे.
ये औरतें ईरान के समाज में महिलाएं के साथ होने वाले हर तरह के भेदभाव का सामना कर रहीं हैं. मैंने प्रदर्शन में शामिल लोगों की बहादुरी और इसके उद्देश्य के प्रति समर्पण देखा है. मैंने पुलिसवालों की आंखों में डर देखा है.
महिलाएं बराबरी की इस लड़ाई में अब पीछे हटना नहीं चाहती है. अभी भी उन्हें बराबरी नहीं मिली है.
ये भी पढ़ें;- ईरान में महसा अमीनी की मौत: महिलाओं को लेकर कैसा है सऊदी अरब और यूएई जैसे मध्य पूर्व के देशों का रुख़

इमेज स्रोत, EPA
शहर के अलग-अलग इलाक़ों में बड़ी संख्या में स्पेशल फोर्सेज़ के जवान तैनात हैं. लेकिन लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी चल रही है और वो अपना हर ज़रूरी काम कर रहे हैं.
जब हड़ताल होती है तो सभी दुकानें और बाज़ार बंद होते हैं. लेकिन लोग फिर भी घरों से बाहर निकलते हैं.
ऐसा लग रहा है कि लोग ये दिखाना चाहते हैं कि वो अब सरकार से नहीं डरते हैं. वो ये भी जताना चाहते हैं कि वो सड़कों को नहीं छोड़ेंगे और प्रदर्शनों से पीछे नहीं हटेंगे.
एक बात जो हैरान करती है कि लोग सुरक्षाबलों की मौजूदगी में भी बहुत चिंतित नज़र नहीं आते हैं. दिन में वो आसानी से सुरक्षाबलों के सामने से गुज़रते हैं और शाम को फिर से प्रदर्शन शुरू कर देते हैं. वो अलाव जलाते हैं और नारेबाज़ी करते हैं.

जिलान, 52, बुकान से
मैंने असली विद्रोह देखा है. ख़ासकर युवा लड़कियों और लड़कों की तरफ़ से जो रोज़ाना प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं. ये पीढ़ी बहादुर है और इसे ख़ौफ़ नहीं है. वो जानते हैं कि उन्हें जेल हो सकती है, वो जानते हैं कि उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है, मारा पीटा जा सकता है, यहां तक उनकी हत्या भी की जा सकती है. बावजूद इसके वो क्रांति में शामिल हो रहे हैं.
जीना (माहशा अमीनी का कुर्द नाम) की मौत के साथ शुरू हुए इन प्रदर्शनों की एक अहम बात ये है कि इसमें महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं. वो पुरुषों के साथ खड़े होकर इन प्रदर्शनों में शामिल हो रही हैं.
दंगारोधी बल इन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए हर संभव तरीका अपना रहे हैं. जबकि ये प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपने मूल अधिकार मांग रहे हैं.
उन्होंने प्रदर्शनकारियों का दमन करने के लिए बंदूकों का इस्तेमाल किया है. ऑनलाइन शेयर करे जा रहे वीडियो में दुनिया ये देख भी रही है. मैं ख़ुद इस सब पर नज़र बनाए हुए हूं.
अब यहां हमारी ज़िंदगी सामान्य नहीं रही है. एक तरफ़ ऐसी घटनाएं लोगों में उम्मीद जगा रही है कि इस सरकार का अंतिम समय आ रहा है. लेकिन दूसरी तरफ़ जो हो रहा है उससे लोगों का मानसिक स्वास्थ्य ख़राब हो रहा है. मैंने बहुत से लोगों को ये कहते हुए सुना है कि अब वो पहले जैसे नहीं रहे हैं.
एक और सकारात्मक बात ये है कि प्रदर्शनकारियों को उन लोगों से भी हमदर्दी मिल रही है जिन्हें आप नहीं जानते हैं. अब अलग-अलग नस्लों के बीच नया संबंध बना है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. और अधिक संख्या में शहर और लोग इन प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं.
इससे पहले हुए प्रदर्शनों की तरह इस बार लोग घर बैठकर नहीं देखना चाहते हैं, उन्होंने तय कर लिया है कि जब तक मक़सद हासिल नहीं होगा, वो लड़ते रहेंगे.
पिछली बार के प्रदर्शनों की तरह इस बार सरकार जेल भेजने, प्रताड़ित करने और हत्या कर देने की धमकियों से लोगों में ख़ौफ़ पैदा नहीं कर पा रही है.
जैसे-जैसे सत्ता का दमन और अपराध बढ़ रहे हैं, लोगों का ग़ुस्सा भी बढ़ता ही जा रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














