पाकिस्तान की सियासत में इमरान ख़ान के लिए कैसी है भविष्य की राह?- दुनिया जहान

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पाकिस्तान बीते दिनों भीषण बाढ़ से जूझ रहा था.
बाढ़ की चपेट में आकर एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई. लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर जाने पर मजबूर हो गए.
इसी दौरान पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान एक मिशन में जुटे थे. इमरान ख़ान लोगों से अपील कर रहे थे कि वो सड़क पर उतरें और मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करें.
इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने से पहले दो दशक से ज़्यादा वक़्त तक पाकिस्तान के स्थापित नेताओं के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले रखा था.
वे क़रीब चार साल तक प्रधानमंत्री रहे फिर इस साल अप्रैल में विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उन्हें कुर्सी से हटा दिया.
अब वो आतंकवाद जैसे गंभीर आरोप का सामना कर रहे हैं.
ऐसे में अब सवाल ये है कि इमरान ख़ान के भविष्य की राह कैसी है?
बीबीसी ने इस सवाल का जवाब पाने के लिए चार एक्सपर्ट से बात की.

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बदलती भूमिका

साल 1952 में जन्मे इमरान ख़ान के शुरुआती दिन लाहौर में बीते.
इमरान ख़ान के पिता सिविल इंजीनियर थे. इमरान की चार बहनें थीं. उनके माता-पिता बच्चों की पढ़ाई पर बहुत ध्यान देते थे. उनके कई रिश्तेदार कामयाब क्रिकेटर थे.
लेखक और पत्रकार बीजे सादिक़ ने इमरान ख़ान की बायोग्राफ़ी लिखी है. वे बताते हैं, "उनके बड़े चचेरे भाई पाकिस्तान टीम का हिस्सा थे. उनमें से एक ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के लिए खेले थे. पाकिस्तान के कप्तान रहे थे. उनके दूसरे चचेरे भाई माजिद ख़ान कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में कप्तान रहे. वे पाकिस्तान टीम के लिए खेले. वे उनके रोल मॉडल थे."
इमरान ख़ान साल 1972 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी गए. वहां पढ़ाई शुरू करने के पहले वो बर्मिंघम में पाकिस्तान टीम की ओर से टेस्ट मैच खेल चुके थे. क्रिकेट करियर की शुरुआत यादगार नहीं रही. बीजे सादिक बताते हैं कि ड्रॉप होने के बाद उन्होंने खूब मेहनत की. 1975 के वर्ल्ड कप के क़रीब इमरान टीम में लौटे और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
उन्हें क्रिकेट इतिहास के सबसे उम्दा ऑलराउंडर में से एक माना जाता है. वो बेजोड़ कप्तान थे. पाकिस्तान ने 1992 में वर्ल्ड कप जीता तो टीम की कमान उनके ही हाथ में थी.

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क्रिकेट के बाद...

मैदान के बाहर भी उनके जलवे कम नहीं थे.
बीजे सादिक़ बताते हैं, "वो चर्चित सोशलाइट थे. 1970 और 80 के दशक में वे इंग्लैंड और बॉलीवुड में महिलाओं के साथ डेटिंग कर रहे थे. उन्हें रॉकस्टार की तरह सम्मान दिया जाता था. इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और भारत समेत उन तमाम जगहों पर जहां क्रिकेट को चाहने वाले थे, वे जाते और हलचल सी मचा देते. ख़ासकर महिलाएं उनकी तरफ़ खिंची चली आती थीं."
अभिजात्य वर्ग के बीच भी उनके चाहने वाले कम नहीं थे. बीजे सादिक बताते हैं कि लंदन के पढ़े लिखे बुर्जुआ लोग, लंदन के सीनियर बैंकर, उद्योगपति, नेता, नौकरशाह, और राजपरिवार के सदस्य तक इमरान ख़ान के बड़े प्रशंसक थे. साल 1985 में कैंसर की वजह से इमरान ख़ान की मां की मौत हो गई. इसके बाद अपने देश के बारे में सोचने का उनका नज़रिया बदला.
बीजे सादिक़ कहते हैं, "ये वो पल था जब उनका सच से सामना हुआ. उनकी मुलाक़ात कैंसर के अनगिनत मरीज़ों से हुई. उनमें से कई कैंसर के इलाज का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं थे. वो दूरदराज़ के इलाकों से इमरान ख़ान के गृहनगर लाहौर पहुंचते. उनके पास एक भी पैसा नहीं होता. इमरान ख़ान को लगा कि वे समाज को कुछ वापस लौटा सकते हैं."
इमरान ख़ान ने लाहौर में एक कैंसर अस्पताल तैयार करने में आर्थिक मदद दी. फिर उन्हें लगा कि पाकिस्तान में वास्तविक बदलाव का रास्ता राजनीति से होकर गुजरता है.
बीजे सादिक़ कहते हैं, "वे जानते थे कि देश सैन्य तानाशाहों से उकता चुका है. बीते 75 सालों में हमने चार सैन्य तानाशाह देखे थे. पाकिस्तान के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सेना की हमेशा बहुत सक्रिय भूमिका रही है. वे वहां भी बदलाव देखना चाहते थे. वे एक वास्तविक लोकतंत्र चाहते थे ताकि लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला जा सके."
पाकिस्तान की राजनीति की पेचीदा और मुश्किल डगर पर ये इमरान ख़ान के सफ़र की शुरुआत थी.

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पाकिस्तान की राजनीति में एंट्री

चैटम हाउस यानी लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफेयर्स की फेलो फरज़ाना शेख कहती हैं, "पाकिस्तान का राजनीतिक परिदृश्य बहुत मुश्किल भरा है. उन्हें एक प्रमुख राजनेता के तौर पर उभरने में कई साल लग गए."
फरज़ाना शेख इमरान के सत्ता तक पहुंचने की लंबी यात्रा को याद करती हैं.
पाकिस्तान 1947 में दुनिया के नक्शे पर आया. 20 साल से ज़्यादा समय तक वहां सेना का शासन रहा. 1970 के बाद कई साल तक भुट्टो और शरीफ़ परिवार ने सत्ता की बागडोर थामे रखी.
इमरान ख़ान पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारे में दाखिल हुए तो उन्होंने मतदाताओं के सामने जानी पहचानी राजनीति से अलग विकल्प पेश किया.
फरज़ाना शेख कहती हैं कि उनका अभियान भ्रष्टाचार और वंशवाद की राजनीति के विरोध पर केंद्रित था.
इमरान ख़ान ने साल 1996 में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी यानी पीटीआई का गठन किया. 2018 में वो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर सामने आए.
फरज़ाना शेख कहती हैं, "संसद में अपनी पार्टी की ओर से वो वनमैन शो की तरह थे. तब कोई भी ये नहीं सोचता था कि वो पाकिस्तान के स्थापित राजनीतिक दलों का वर्चस्व ख़त्म कर सकते हैं. साल 2013 से 2018 के बीच के साल एक नेता के तौर पर उनके लिए बहुत अहम थे."
प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी के लिए इमरान ख़ान को देश की शक्तिशाली सेना के समर्थन की ज़रूरत थी. 2018 का चुनाव आते आते उन्हें ये समर्थन हासिल हो गया.

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...और हाथ से फिसलने लगी सत्ता

फरज़ाना शेख कहती हैं कि सेना के समर्थन के बाद भी उनकी पार्टी बमुश्किल बहुमत तक पहुंची.
फरज़ाना शेख बताती हैं, "उनके लिए कुछ भी करना मुश्किल था. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उनके पास बड़ा बहुमत नहीं था. वजह ये भी थी कि वो अपने राजनीतिक विरोधियों का लगातार तिरस्कार करते रहे. संसद हो या सड़क वो दिन रात उन्हें झूठा, चोर और धोखेबाज़ बताते रहे. वे उनके साथ बातचीत से इनकार करते रहे. कुछ कर दिखाने के लिए उन्हें सहयोग की ज़रूरत थी और विपक्ष उनसे सहयोग को तैयार नहीं था."
राजनीतिक विरोधियों से तो नहीं लेकिन इमरान ख़ान ने चरमपंथी समूह पाकिस्तान तालिबान से बात की.
फरज़ाना शेख कहती हैं, "लोगों ने कहा कि आप धोखेबाजों और चोरों से बात करने को तैयार नहीं हैं लेकिन आप आतंकवादियों से बात करेंगे. जिनके हाथ निर्दोष पाकिस्तानियों के ख़ून से रंगे हैं. सिर्फ़ आलोचकों ने ही नहीं बल्कि विश्लेषकों ने भी उनके दोहरे मानदंड को उजागर किया."
फरज़ाना कहती हैं कि उन्होंने अपने कदम को ये कहते हुए उचित ठहराने की कोशिश की कि वो ऐसे मुसलमान हैं जो राह भटक गए हैं.
राजनीतिक विरोधियों ने इसे लेकर उन्हें कठघरे में खड़ा किया. कोविड 19 भी उनके लिए चुनौती के तौर पर सामने आया. इमरान ने वादा किया था कि गरीबी हटाना उनकी प्राथमिकता होगी, लेकिन इन चुनौतियों की वजह से उनके किए वादे पीछे छूटते गए.
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद खराब नज़र आने लगी. इस बीच सत्ता भी उनके हाथ से फिसलने लगी.

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कुर्सी गई, संघर्ष जारी

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की फेलो मदीहा अफ़ज़ल कहती हैं, "तथ्य ये है कि पाकिस्तान के 75 साल के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है."
वो कहती हैं कि वादे पूरे नहीं कर पाने की वजह से इमरान ख़ान की लोकप्रियता घटने लगी.
बीते साल के आखिर में इमरान ख़ान और सेना के संबंधों में भी दरार आने लगी. तभी से उनके लिए मुश्किलें बढ़ने लगीं.
मदीहा अफ़ज़ल कहती हैं, "आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर इमरान ख़ान और सैन्य नेतृत्व के बीच हफ़्तों तक गतिरोध बना रहा. सेना के लिए ये असहज करने वाली स्थिति थी. इमरान ख़ान और सेना के रिश्तों में सबसे बड़ी दरार यहीं से पैदा हुई."
मदीहा कहती हैं कि इमरान ख़ान ने रणनीतिक तौर पर भी कुछ ग़लत कदम उठाए. इस साल फ़रवरी में इमरान ख़ान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत के लिए मॉस्को गए. उस दौरे की टाइमिंग को लेकर भी विवाद हुआ. वो याद दिलाती हैं कि इमरान उसी दिन पुतिन से मुलाक़ात कर रहे थे जिस दिन रूस ने यूक्रेन पर हमला किया.
इमरान ख़ान के विरोधियों ने उन्हें कमज़ोर होते देख निर्णायक वार किया.
मदीहा अफ़ज़ल कहती हैं, "नेशनल असेंबली में इमरान ख़ान के गठबंधन में शामिल दलों ने जब ये देखा कि सेना ने उनसे समर्थन हटा लिया है तो उन्होंने पाला बदल लिया. अब विपक्ष के लिए सत्ता में आने का रास्ता साफ़ हो गया."
इस साल अप्रैल की शुरुआत में इमरान ख़ान काफी कमज़ोर हो चुके थे. वे राजनीतिक तौर पर पांव जमाए रखने के लिए जूझ रहे थे.

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मदीहा अफ़ज़ल बताती हैं, "उन्होंने संविधान के परे जाकर संसद को भंग कराने की कोशिश की. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे ख़ारिज कर दिया और अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान का आदेश दिया. नौ अप्रैल को वोटिंग हुई और इमरान ख़ान सत्ता से बाहर हो गए."
इमरान ख़ान सिर्फ़ चार साल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रह सके. उनकी जगह शरीफ़ ख़ानदान के शहबाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री बने. पाकिस्तान के लिए ये जानी पहचानी सी स्थिति तो थी लेकिन एक मामले में कुछ अंतर भी दिख रहा था.
पहले सेना का भरोसा खो देने के बाद सत्ता से हटने वाले नेता चुपचाप परे चले जाते थे और दोबारा वापसी करने के लिए ताक़त जुटाते थे.
लेकिन इमरान ख़ान एक नई लकीर खींच रहे थे. अपनी हार को चुपचाप मंजूर करने के बजाए गरजते हुए भाषण दे रहे थे.
मदीहा बताती हैं कि इमरान ख़ान की रैलियों में हज़ारों लोग आ रहे थे और ज़मीनी स्तर पर उनकी ताक़त दिख रही थी.
इस बीच बाढ़ में पाकिस्तान के एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई. लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े. संकट की इस घड़ी के बीच भी इमरान ख़ान ने लोगों से अपील की कि वो सड़कों पर उतरें. इमरान ख़ान देश की दुर्दशा के लिए अपने राजनीतिक विरोधियों को ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे. ये एक अप्रत्याशित कदम था. विपक्ष के पास इसका कोई तोड़ नहीं था.
मदीहा कहती हैं कि उनसे पहले कुर्सी से हटाए जाने के बाद कोई नेता ऐसा नहीं कर पाया था.
एक तरफ इमरान ख़ान सरकार को चुनौती और धमकी दे रहे थे. दूसरी तरफ उनके भाषणों के टीवी पर सीधे प्रसारण पर रोक लगा दी गई. उन पर आतंकवाद रोधी क़ानून के तहत केस दर्ज हुआ.


कुर्सी मिलेगी या जेल?

पाकिस्तान में जून के महीने में बाढ़ आई. इसने कोरोना महामारी की वजह से बेहाल रहे लोगों की दिक्कतें बढ़ा दीं. इमरान ख़ान चार साल तक प्रधानमंत्री रहे थे लेकिन वो आरोप लगा रहे थे कि तमाम दिक्कतों के लिए पहले की सरकारें ज़िम्मेदार हैं.
पॉलिसी ऑर्गनाइजेशन तबादलाब के सीईओ मुशर्रफ़ ज़ैदी कहते हैं, "मुझे लगता है कि उनकी ग़लतियों के साथ कुछ दूसरी चीजें भी जुड़ती चली गईं. मसलन दुनिया भर में तेल की कीमतों में हुआ इज़ाफ़ा, सप्लाई चेन का बाधित होना और पूरी दुनिया में ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी. इनमें से कुछ की ज़िम्मेदारी इमरान ख़ान पर आनी थी लेकिन ये उन्हें सत्ता से बाहर करने वाले सैन्य नेतृत्व और उनकी जगह लेने वाली सरकार पर आ गई."
मुशर्रफ़ ज़ैदी इमरान ख़ान के आलोचक रहे हैं.
उनकी राय है कि अगर इमरान ख़ान ख़ुद पर लगे आरोपों से अपना बचाव कर पाए और जेल नहीं गए तो वो अपनी बढ़ती लोकप्रियता का फ़ायदा उठा सकते हैं.
मुशर्रफ़ ज़ैदी कहते हैं, " मुझे लगता है कि सत्ता से बाहर होने के ठीक बाद विरोध प्रदर्शन की अपील पर लोगों ने उन्हें जिस तरह का समर्थन दिया, उससे इमरान ख़ान ख़ुद भी हैरान हो गए. मुझे लगता है कि लोगों की प्रतिक्रिया ने उनका हौसला बुलंद किया. उनकी उम्मीदें बनाए रखीं कि भले ही वो कुछ ही समय के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रह पाए हों लेकिन अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होते हैं तो वो दोबारा सत्ता में आ सकते हैं."
इमरान ख़ान की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उन्हें जनसमर्थन तो मिल रहा है लेकिन कई धड़े उनका साथ देने को तैयार नहीं हैं. मुशर्रफ़ ज़ैदी की राय में सेना के साथ दोबारा गठजोड़ करना भी आसान नहीं होगा. ऐसे में वो कोई स्थिर सरकार देने की स्थिति में आ पाएंगे, ये मुश्किल लगता है.
ज़ैदी की राय है कि अगर इमरान ख़ान चुनाव अभियान में हिस्सा लेना चाहते हैं तो उन्हें देश के लिए अपने नज़रिए पर गंभीरता से विचार करना होगा.
ज़ैदी कहते हैं, "मैंने बार बार कहा है कि वो दुनिया के सबसे उम्रदराज़ टीनएज़र हैं. इमरान ख़ान अलग दुनिया में रहते हैं. पाकिस्तान जिस हाल में है, ये उससे अलग है. वो पाकिस्तान को एक ऐसे स्वतंत्र और स्वायत्त देश के रूप में देखना चाहते हैं जिसकी अपने क्षेत्र और दुनिया में मजबूत देश की पहचान हो. और वो इसे बिना किसी कुर्बानी या कठिन परिश्रम के हासिल करना चाहते हैं. जबकि आर्थिक तरक्की के लिए ऐसा करना ज़रूरी है."
इमरान ख़ान के सामने पहली और सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो जेल जाने से बचें.
मुशर्रफ़ ज़ैदी कहते हैं, "इस देश में इमरान ख़ान से भी ज़्यादा लोकप्रिय रहे नेता जेल गए हैं और उन्हें फ़ांसी हुई है. मैं अधिकारियों से प्रार्थना और गुजारिश करूंगा कि वो इमरान ख़ान के साथ ऐसी कोई कहानी न लिखें. लेकिन अगर इमरान ख़ान के विरोध का सिलसिला जारी रहा तो उनकी ओर से पेश राजनीतिक और आर्थिक ख़तरों से निपटने के लिए सरकार जो कुछ कर सकती है, उसमें पहला कदम जेल हो सकती है."
क़रीब एक दशक पहले पाकिस्तान की राजनीति की तुलना क्रिकेट से करते हुए इमरान ख़ान ने कहा था कि ये पैड, हेलमेट और गलव्स के बिना एक तेज़ गेंदबाज़ की छह गेंद खेलने जैसा है.
बतौर नेता उनके अनुभव ने भी इस तुलना को सटीक ठहराया.
उन्होंने वोटरों से एक ऐसे नए पाकिस्तान का वादा किया था जो भ्रष्टाचार मुक्त होगा. लेकिन ऐसा कर दिखाने के बजाए वो अपने विरोधियों को घेरने में जुटे रहे और अब उनके ख़िलाफ़ कई गंभीर आरोप हैं.
इस बीच पाकिस्तान समस्याओं की बाढ़ से घिरा है.
लौटते हैं उसी सवाल पर कि इमरान ख़ान के लिए भविष्य की राह कैसी होगी.
हमारे पहले एक्सपर्ट बीजे सादिक़ कहते हैं कि अगर वो ख़ुद पर लगे आरोपों से निजात पा सके और उनकी मांग के मुताबिक तुरंत चुनाव हुए तो उन्होंने जो काम शुरू किया है, उसे अंजाम तक पहुंचा भी सकते हैं. वे कहते हैं कि इमरान ख़ान खासे लोकप्रिय हैं. उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई तो कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी ये कहना मुश्किल है. यानी आगे कुछ भी हो सकता है.
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