नासा ने चांद की ओर रवाना होने वाले सबसे शक्तिशाली रॉकेट के लॉन्च को रोका

फ़्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर पर एसएलएस रॉकेट

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इमेज कैप्शन, फ़्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर पर एसएलएस रॉकेट

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने घोषणा की है कि चांद की ओर भेजे जाने वाले उसके अब तक के सबसे शक्तिशाली रॉकेट स्पेस लॉन्च सिस्टम या एसएलएस के प्रक्षेपण को आज के लिए रद्द कर दिया है.

ये नासा का अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. ये नासा के आर्टेमिस मिशन का हिस्सा है जिसके तहत 50 साल बाद एक बार फिर इंसान को चांद पर भेजने की तैयारी हो रही है. ये रॉकेट अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित केनेडी स्पेस सेंटर से स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग साढ़े आठ बजे अंतरिक्ष के लिए रवाना होना था.

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  • स्पेस लॉन्च सिस्टम के लॉन्च डायरेक्टर चार्ली ब्लैकवेल थॉम्पसन ने बताया कि इंजन में आई तकनीकी ख़राबी की वजह से आर्टेमिस प्रोजेक्ट के लॉन्च को आज के लिए रद्द कर दिया है.
  • इंजीनियर इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि आख़िर चूक कहां हुई.
  • नासा के डेरोल नेल ने बताया कि दो सितंबर को दोबारा से लॉन्च की तारीख रखी जा सकती है लेकिन ये इंजन में आई ख़राबी को दूर करने पर निर्भर करेगा.
  • कैनेडी स्पेस सेंटर पर मौजूद बीबीसी संवाददाता रेबेका मोरेल्ले ने बताया, "हमें थोड़ी देर पहले ये पता चला है कि नासा की टीम किसी तकनीकी ख़राबी को दूर करने की कोशिश कर रही है. रॉकेट के चार इंजनों में से एक इंजन में ये समस्या आई थी. रॉकेट के लॉन्च के लिए ये ज़रूरी था और ये ज़रूरत के मुताबिक़ ठंडा नहीं हो पा रहा है."
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आर्टेमिस पर लगा ओरियोन यान

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अपोलो मिशन के पाँच दशक बाद मानव मिशन

लगभग 100 मीटर लंबे एसएलएस का काम धरती से बहुत दूर ओरियोन नाम के एक टेस्ट-कैप्सूल को दागा जाना था. ये चांद के इर्द-गिर्द चक्कर लगाएगा और छह सप्ताह बाद प्रशांत महासागर में वापस नीचे आएगा.

ये इस रॉकेट का पहला मिशन है जिसमें कोई अंतरिक्ष यात्री सवार नहीं होगा. लेकिन यदि ये मिशन कामयाब रहता है तो, भविष्य में इस रॉकेट से अंतरिक्ष यात्री भी मिशन पर जा सकेंगे.

यदि सबकुछ ठीक रहा तो इंसान 2024 से एक बार फिर चांद पर क़दम डाल सकेगा.

नासा के अंतरिक्ष यात्री रैंडी ब्रेसनिक कहते हैं, "आर्टेमिस-1 में हम जो भी कर रहे हैं वो ये साबित करने के लिए कर रहे हैं कि हम क्या कर सकते हैं, और इससे आर्टेमिस-2 के मानव मिशन को लेकर जो भी ख़तरे होंगे उन्हें दूर किया जा सकेगा."

रॉकेट

आर्टेमिस नासा के लिए एक अहम मिशन है. इस साल दिसंबर में नासा अपोलो 17 के चांद पर पहुंचने के 50 साल पूरे करेगा. ये आख़िरी बार था जब मनुष्य चांद पर गया था.

नासा ने आर्टेमिस के ज़रिए फिर से नई तकनीक के साथ चांद पर पहुंचने का वादा किया था.

आर्टेमिस यूनानी देवता अपोलो की जुड़वाँ बहन का नाम है जिसे 'चांद की देवी' भी कहा जाता है.

नासा 2030 के दशक में, या उसके बाद, मंगल ग्रह पर पहुंचने का इरादा रखता है और चांद पर फिर से जाने के प्रयास को इसी की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है.

अपोलो मिशन के रॉकेट सैटर्न-5 से शक्तिशाली ये रॉकेट ना सिर्फ़ अंतरिक्ष यात्रियों को और अधिक दूर ले जा सकेगा बल्कि इस पर सामान भी अधिक लादा जा सकेगा. इससे अंतरिक्ष यात्री अधिक समय तक अंतरिक्ष में रह सकेंगे.

मिशन की तैयारियों पर बात करते हुए नासा के प्रशासक बिल नेल्सन ने कहा, "हम सब लोग जो चांद को निहारते हैं, उस दिन का सपना देखते हैं कि इंसान फिर से चांद पर क़दम रखे, साथियों, हम यहां आ गए हैं. हम दोबारा वहां जा रहे हैं. और वो यात्रा, हमारी ये यात्रा आर्टेमिस-1 के साथ शुरू हो रही है."

बीबीसी न्यूज़ से बात करते हुए बिल नेल्सन ने कहा, "पहला मानव मिशन लॉन्च आर्टेमिस-2 दो साल बाद 2024 में होगा. हम ये उम्मीद कर रहे हैं कि चांद की सतह पर उतरने का पहला लॉन्च आर्टेमिस-3 साल 2025 में होगा."

वीडियो कैप्शन, नासा चांद तक जाने के लिए एक नए रॉकेट को रवाना करने की तैयारी कर रहा है.

लॉन्च की तैयारी

एसएलएस के लॉन्च पैड पर पहुंचने के बाद एक सप्ताह तक इंजीनियरों ने इस पर काम किया और इसे उड़ान के लिए तैयार किया.

यदि सब कुछ ठीक नहीं रहा तो फिर दो सितंबर को अगला प्रयास किया जाएगा. अगर इसमें भी कामयाबी नहीं मिली तो 5 सितंबर को लॉन्च की कोशिश की जाएगी.

ऐसा अनुमान है कि रॉकेट लॉन्च को देखने के लिए दो लाख लोग केनेडी में समुद्रतट और वहाँ के रास्तों के आस-पास जुटेंगे.

इस रॉकेट के क्रू कैप्सूल का नाम ओरियोन है जो क़रीब एक मीटर चौड़ा और पांच मीटर लंबा है. ये 1960 और 1970 के दशक के मॉड्यूल से अधिक चौड़ा है.

लॉन्च के समय एसएलएस से 39.1 मेगान्यूटन्स के बल का धक्का लगेगा. 1960 और 70 के दशक में अपोलो मिशन के दौरान जो सैटर्न-5 रॉकेट दागे गए थे उनकी तुलना में नासा के नए अभियान में 15% अधिक बल का इस्तेमाल होगा.

इसे यदि अन्य तरीक़े से समझा जाए तो रॉकेट दागे जाने के समय जो ऊर्जा निकलेगी वो 60 कॉन्कोर्ड सुपरसोनिक जेट विमानों के टेक-ऑफ़ करते समय निकलने वाली ऊर्जा के बराबर होगी.

साल 1972 में आख़िरी बार इंसान चांद पर उतरा था

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इमेज कैप्शन, साल 1972 में आख़िरी बार इंसान चांद पर उतरा था

इस टेस्ट लॉन्च एक बड़ा मक़सद ओरियोन की तापमान को सहने की क्षमता का परीक्षण करना है. ये देखा जाएगा कि इसका सुरक्षा कवच धरती की कक्षा में वापस लौटते समय सलामत रहता है या नहीं.

यूरोप भी इस मिशन में अहम सहयोगी है. ओरियोन को अंतरिक्ष में ले जाने वाला प्रोपल्सन मॉड्यूल यूरोप ने ही तैयार किया है.

ओरियोन को चांद तक ले जाने में इस मॉड्यूल की अहम भूमिका है.

यूरोप को उम्मीद है कि एसएलएस और ओरियोन के इस मिशन और भविष्य के मिशन में सहयोग करने से कभी ना कभी यूरोप का कोई व्यक्ति भी चांद पर क़दम रख पाएगा.

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