रूस क्या वाक़ई डिफॉल्ट कर गया है, भारत से कैसे मिल रही मदद

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बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस पहली बार विदेशी कर्ज़ नहीं चुका पाने के कारण डिफॉल्ट होने की कगार पर है. ऐसा यूक्रेन पर हमले के कारण रूस के वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अलग-थलग होने और कई तरह के प्रतिबंधों के सामना करने की वजह से हुआ है.
27 मई को 10 करोड़ डॉलर का भुगतान करना था लेकिन रूस नहीं कर पाया था. इसके बाद 30 दिनों का समय और दिया गया था लेकिन रूस इस डेट पर भी भुगतान नहीं कर सका. रूस को मिला अतिरिक्त समय भी रविवार को ख़त्म हो चुका है.
रूस के डिफॉल्ट होने की औपचारिक घोषणा बॉण्ड होल्डर की ओर से होगी क्योंकि सामान्य तौर पर रेटिंग्स एजेंसियां इसकी घोषणा करती हैं कि कर्ज़दार डिफॉल्ट कर गया है.
क्रेडिट डेरिवेटिव्स डिटरमिनेशन्स कमिटी निवेशकों का पैनल है, जिसने अभी तक कोई फ़ैसला नहीं किया है. सोमवार को रूस के वित्त मंत्रालय ने कहा था कि मई में ही भुगतान कर दिया गया था. रूस का कहना है कि रक़म यूरोक्लियर को ट्रांसफर किया गया था. रूस का कहना है कि पैसे को स्टेकहोल्डर के पास पहुँचने से रोक दिया गया इसलिए भुगतान नहीं हो पाया है. यूरोक्लियर बेल्जियम की एक वित्तीय सर्विस कंपनी है.

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रूस का इनकार
रूस ने डिफॉल्ट होने की बात को ख़ारिज किया है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दमित्री एस पेस्कोव ने सोमवार को पत्रकारों से कहा था कि डिफॉल्ट होने का बयान पूरी तरह से अवैध है. पोस्कोव ने कहा था, ''सच यह है कि यूरोक्लियर ने पैसे को रोक लिया है और जिसे मिलना था, उन तक पहुँच नहीं पाया. दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमें डिफॉल्ट कहने का कोई मतलब नहीं है.''
रूसी वित्त मंत्रालय ने कहा है कि विदेशी वित्तीय संस्थानों के काम पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है. रूसी वित्त मंत्रालय ने कहा कि निवेशकों को उस वित्तीय कंपनी से संपर्क करना चाहिए. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, यूरोक्लियर ने इस बारे में टिप्पणी से इनकार किया है.
भारत के जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने ट्वीट कहा है, ''रूस वित्तीय रूप से अब भी मज़बूत है. अब बाइडन ने बॉन्डहोल्डर के भुगतान को ब्लॉक डिफॉल्ट होने पर मजबूर किया है. बाइडन अब इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. बाइडन को लग रहा है कि प्रतिबंधों से ज़्यादा कारगर जबरन डिफॉल्ट कराना है.टट
यूनिवर्सिटी ऑफ़ जॉर्जिया के टेरी कॉलेज ऑफ बिज़नेस में क़ानून के प्रोफ़ेसर और सॉवरन डेब्ट के विशेषज्ञ टिम सैम्पल्स ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, ''हम उम्मीद कर सकते हैं कि रूस अपने वैकल्पिक नैरेटिव के साथ रहेगा. रूस ने अभी इस मामले की शिकायत विदेशी अदालतों में नहीं की है.''
रूस ने फ़रवरी में जब यूक्रेन पर हमला किया था और पश्चिमी देशों ने चौतरफ़ा प्रतिबंध लगाए थे तब डिफॉल्ट होने का ख़तरा ज़्यादा था. रूस को अमेरिकी बैंकों तक पहुँच से अलग कर दिया गया था. अमेरिकी सरकार के एक अधिकारी ने रूस के डिफॉल्ट वाली बात को कड़े प्रतिबंधों से जोड़ा है. जर्मनी में जी-7 की बैठक से अलग रिपोर्टरों को उस अधिकारी ने कहा था कि रूसी अर्थव्यवस्था पर नाटकीय असर पड़ रहा है.

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डिफॉल्ट कैसे हुआ?
इस डिफॉल्ट को असामान्य माना जा रहा है क्योंकि यह आर्थिक प्रतिबंधों और ट्रांजैक्शन को ब्लॉक करने से हुआ है न कि रूस की सरकार के पास पैसे नहीं होने की वजह से हुआ है. महीनों से युद्ध के बाद भी रूस की वित्तीय स्थिति बदतर नहीं हुई है.
रूस के पास अभी 600 अरब डॉलर फॉरेक्स और गोल्ड रिज़र्व है. हालांकि इसमें से आधे से ज़्यादा को विदेशों में रोककर रखा गया है. रूस तेल और गैस बेचकर अब भी नक़दी हासिल कर रहा है. इसके बावजूद डिफॉल्ट होना किसी भी देश की प्रतिष्ठा पर धब्बे की तरह देखा जाता है. इससे निवेशकों पर असर पड़ता है और नए क़र्ज़ों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
हाल के अतीत में ग्रीस और अर्जेंटीना डिफॉल्ट हुए हैं लेकिन रूस के इस डिफॉल्ट का असर अंतराष्ट्रीय बाज़ार पर कुछ ख़ास नहीं पड़ेगा. इसकी वजह यह भी है कि रूस की पहुँच अंतरराष्ट्रीय निवेशकों तक पहले ही टूट गई है और इसे डिफॉल्ट होने से ज़्यादा ख़तरनाक माना जाता है.
रूस के केंद्रीय बैंक की गवर्नर एलविरा नबिउलिना ने इस महीने कहा था कि डिफॉल्ट होने का कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा क्योंकि रूस कई स्तरों पर पहले से ही तमाम प्रतिबंधों को झेल रहा है. केंद्रीय बैंक को अभी चिंता महंगाई बढ़ने की है. रूस में अभी महंगाई दर 17 फ़ीसदी है.
बुधवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किया है कि भविष्य में डॉलर और यूरो में किए जाने विदेशी क़र्ज़ों का भुगतान रूसी वित्तीय संस्थानों के ज़रिए होगा. अब इस बात पर भी विचार किया जाएगा कि क्या उन क़र्ज़ों का भुगतान रूसी मुद्रा रूबल में किया जा सकता है. लेकिन ज़्यादातर बॉण्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का भुगतान रूबल में संभव नहीं होगा.

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रूस पर क़र्ज़
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल के अंत तक रूस के विदेशी मुद्रा क़र्ज़ 40 अरब डॉलर में विदेशी निवेशकों का हिस्सा क़रीब आधा है. ऐसे में कहा जा रहा है कि रूस पर भविष्य में डिफॉल्ट होने का ख़तरा कम नहीं हुआ है.
अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से देखें तो रूस पर बहुत ज़्यादा क़र्ज़ नहीं है. आईएमएफ़ के अनुसार, पिछले साल रूस का सरकारी क़र्ज़ उसकी जीडीपी का केवल 17 फ़ीसदी ही था. ऐसे मुट्ठी भर देश हैं, जिन पर यह क़र्ज़ उनकी जीडीपी का 25 फ़ीसदी है. अमेरिका जिसकी संपत्तियों की मांग वैश्विक निवेशकों में रहती है और कम जोखिम माना जाता है, उसका क़र्ज़ उसकी जीडीपी का 125 फ़ीसदी है.
यूक्रेन पर हमले के कारण रूसी में जिस आर्थिक तबाही की आशंका थी, वैसा कुछ होता नहीं दिख रहा है. रूस का चालू खाता सरप्लस में है. ऊर्जा निर्यात से राजस्व बढ़ा है. इसका नतीजा यह है कि रूसी मुद्रा रूबल पिछले सात सालों में सबसे ज़्यादा मज़बूत हुई है.
रूस प्रतिबंधों का असर कम कर रहा है. चीन और भारत रूसी तेल ख़रीद रहे हैं और इससे उसे वित्तीय मदद मिल रही है. रूस दोनों देशों को सस्ता तेल दे रहा है. चीन राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए अपनी तेल आपूर्ति का दायरा बढ़ा रहा है जबकि भारत रूसी तेल को रिफाइंड कर बेच रहा है. कहा जा रहा है कि भारत और चीन के कारण रूस को अलग-थलग करने की कोशिश नाकाम हो रही है.
यूक्रेन पर हमले के चार महीने हो गए हैं और रूसी तेल के निर्यात पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ा है. यूरोप के जाने के बाद रूसी तेल के ख़रीदार के तौर पर भारत और चीन सामने आए हैं.
मई महीने में भारत और चीन ने हर दिन रूस से 24 लाख बैरल तेल ख़रीदे हैं. यह रूसी निर्यात का आधा है. चीन और भारत को रूस अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की क़ीमत से 30 फ़ीसदी की छूट पर तेल दे रहा है.
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