रूस की करेंसी रूबल ने कैसे पाबंदियों के बावजूद किया डॉलर का मुक़ाबला

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- Author, क्रिस्टीना जे. ऑर्गाज़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
रूस की मुद्रा रूबल तमाम प्रतिबंधों और चुनौतियों के बावजूद इस साल डॉलर के मुक़ाबले दुनिया की सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है.
यूक्रेन पर हमले के बाद रूस आधुनिक इतिहास के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है.
लेकिन रूबल को मजबूत से होने से पश्चिमी देशों की ये कार्रवाई भी नहीं रोक पाई.
दो महीने पहले ये ऐसी बात थी जिसकी कल्पना करना मुश्किल था. डॉलर के सामने रूबल की हैसियत गिरकर एक सेंट से भी कम हो गई थी.
लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ, और करेंसी मार्केट पर नज़र रखने वाले चौंक गए.
वो सात मार्च की तारीख़ थी. डॉलर के मुक़ाबले रूबल ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी.
तब एक डॉलर के मुक़ाबले रूबल 0.007 पर था. तब से डॉलर के मुक़ाबले रूबल की स्थिति में लगभग 15 फ़ीसदी सुधार हुआ है और अब ये 0.016 पर ट्रेड कर रहा है.

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रूस-यूक्रेन युद्ध
विश्लेषक इसकी वजह बताते हैं कि यूक्रेन पर हमले की शुरुआत के बाद से ही क्रेमलिन ने करेंसी के प्रवाह पर नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठाए थे.
लोगों में इसे लेकर एक तरह के डर का माहौल था और एटीएम मशीनों के बाहर नकदी निकालने के लिए लंबी-लंबी कतारें देखी गईं.
रूस ने अपने लोगों पर विदेशी मुद्रा खरीदने के लिए रूबल खर्च करने पर रोक लगा दी.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने रूस के इस कदम को चालाकी करार दिया.
रूस के इन कदमों की वजहों से उसके विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा फ्रीज़ हो गया.
ये ऐसे वक़्त में हुआ जब उसे इन संसाधनों की सख़्त ज़रूरत थी ताकि देश से बाहर जा रही पूंजी और यूक्रेन पर सैनिक हमले के खर्च की भरपाई की जा सके.
ये जंग उम्मीद से ज़्यादा लंबी खिंचने वाली थी.

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तुर्की और अर्जेंटीना का मामला
रूबल की इस रिकवरी में जो बात सामान्य नहीं लगती है वो तुर्की या अर्जेंटीना जैसे देशों का उदाहरण है.
एक वक़्त में अर्जेंटीना और तुर्की जैसे देशों को भी ऐसे ही कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
लेकिन उनके यहां रूस जैसे नतीज़े नहीं मिले थे. लीरा और पेसो दोनों ही मुद्राओं की हालत ख़राब हो गई थी.
दोनों ही मुद्राएं रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गईं और आज भी उबरने के लिए संघर्ष कर रही हैं.
रूस को जैसे ही ये एहसास हुआ कि अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां लगने वाली हैं, उसने फौरन कदम उठाने शुरू कर दिए.
रूस की नई पीढ़ी के लिए ये सबकुछ नया था. ख़ासकर उन लोगों के लिए जिन्होंने सोवियत संघ के ज़माने का मुश्किल दौर नहीं देखा था.

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वित्तीय फर्म 'ईटोरो' में वैश्विक बाज़ार मामलों के जानकार बेन लैडलर बीबीसी मुंडो से कहते हैं, "रूस के केंद्रीय बैंक को पश्चिमी देशों की पाबंदियों के जवाब में ब्याज दरें बढ़ानी पड़ी और पूंजी के प्रवाह पर नियंत्रण भी सख़्त करना पड़ा."
"रूस में ब्याज़ दरें दोगुनी से भी ज़्यादा बढ़ाकर 20 फ़ीसदी कर दी गई हैं. रूस के निर्यातकों को ये आदेश दिया गया है कि विदेशों से होने वाली आमदनी का 80 फ़ीसदी हिस्सा उन्हें रूबल में बदलना होगा. और गिने चुने लोगों को ही अपना पैसा विदेश भेजने के लिए इजाजत दी गई है और बाहर भेजे जाने वाली इस रकम की भी एक निश्चित हद होगी."
पश्चिमी देशों ने रूस पर जो पाबंदी लगाई है, उसके तहत विदेशों में रूस के बैंक ख़ातों को फ्रीज़ कर दिया गया है.
अपनी करेंसी को सुरक्षित करने के लिए रूस ने एक और कदम उठाया. रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले यूरोपीय संघ के देशों से मांग की गई कि वो डॉलर या यूरो के बजाय बिल का भुगतान रूबल में करें.
यूरोप से बदला लेने का तरीका
यूरोप के देश रूस से आने वाली गैस पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते हैं. यूरोपीय संघ इस योजना पर काम कर रहा है कि किस तरह से एनर्जी सप्लाई के वैकल्पिक तरीके खोजें जाएं.
लेकिन रूस से गैस खरीदना बंद करने में भी यूरोप को सालों लग जाएंगे. रूस की सरकारी कंपनी गैज़प्रोम के सबसे बड़े खरीदारों में से एक जर्मनी ने पहले ही रूबल में भुगतान को लेकर अपनी रज़ामंदी दे दी है. और रूस को ये सहूलियत देने वालों में जर्मनी यूरोप का अकेला देश नहीं है.
वित्तीय फर्म स्कोप रेटिग्ंस के सीनियर एनालिस्ट लेवोन केमरयान बताते हैं, "रूस ने यूरोपीय संघ से बदला लेने के लिए रणनीतिक तरीका अपनाया है. उसने यूरोप को नैचुरल गैस सप्लाई करने मुख्य स्रोत की अपनी हैसियत का पूरा फायदा उठाया. यूक्रेन पर हमले से पहले यूरोप अपनी ज़रूरत का 40 फ़ीसदी गैस रूस से खरीद रहा था."
और आख़िर में तेल-गैस की महंगी क़ीमत से भी रूस को काफी मदद मिली.
तेल-गैस महंगा होने का मतलब था कि रूस के खरीदारों को प्रति बैरल तेल के लिए ज़्यादा डॉलर चुकाना पड़ता और इसका मतलब था कि खरीदारों को ज़्यादा रूबल की ज़रूरत पड़ने वाली थी.
फौरी उपाय
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि कड़े मौद्रिक उपायों, ऊंची ब्याज़ दरों और तेल-गैस की महंगी क़ीमतों से रूस को केवल फौरी राहत ही मिलने वाली है. रूस की अर्थव्यवस्था के लिए एक बुरे साल में इन कदमों से हालात और बिगड़ने की रफ़्तार बस थोड़ी सुस्त हुई है.
ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स में रूसी अर्थव्यवस्था के जानकार स्कॉट जॉनसन कहते हैं, "रूस के भीतर रूबल अचानक से महंगा हो गया है. इससे निर्यातकों और कुछ घरेलू उत्पादकों के लिए परेशानियां बढ़ गई हैं. इसका मतलब ये भी है कि बजट के लिए रूस के पास कम आमदनी होगी."
रूबल जिस तरह से मजबूत हुआ है, उससे ये सवाल उठने लगे हैं कि पश्चिमी देशों ने रूस पर जो आर्थिक पाबंदियां लगाई हैं, वो कारगर भी हो पा रही हैं या नहीं?
स्कॉट जॉनसन का कहना है, "रूस के बाहर लोगों को ऐसा लग रहा है कि रूबल मजबूत हो रहा है और प्रतिबंधों का वैसा असर नहीं हो रहा है जैसा कि सोचा गया था. लेकिन ये बात पूरी तरह से सच नहीं है."
"रूबल की मजबूती की बड़ी वजह निर्यात से होने वाली आमदनी को घरेलू मुद्रा में बदलने की शर्त और मौद्रिक प्रवाह पर लगाए गए अन्य किस्म के नियंत्रण हैं. इसी तरीके से विदेशों से आने वाली नकदी के प्रवाह को नियंत्रित किया गया है."
वो कहते हैं, "रूबल भुगतान संतुलन की सही तस्वीर पेश करता है लेकिन ये अर्थव्यवस्था की स्थिति को बयान नहीं करता है जहां तस्वीर धुंधली दिखाई दे रही है."
स्कॉट जॉनसन की दलीलों से बेन लैडलर भी सहमत हैं. वे कहते हैं, "मुमकिन है कि रूबल का उफान अब थम जाए. रूबल के मज़बूत होने ने रूस के निर्यात को कम प्रतिस्पर्धी बना दिया है और कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसके कर्ज़ अदायगी में डिफॉल्ट के ख़तरे को बढ़ा दिया है."
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