रूस-यूक्रेन युद्ध : इन बातों से तय होगा किस तरफ झुकेगा पलड़ा

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    • Author, जोनाथन बील
    • पदनाम, रक्षा संवाददाता,बीबीसी न्यूज़

यूक्रेन में रूस का अभियान दिनों दिन थकाने वाला साबित हो रहा है. तबाही और बर्बादी की तस्वीरें सामने आ रही हैं.

युद्ध की शुरुआत को करीब तीन महीने हो चुके हैं. रूस और यूक्रेन दोनों एक दूसरे को थकाने में लगे हैं. दोनों ने हाल के दिनों में अपनी बढ़त का एलान किया है लेकिन सच ये है कि नुक़सान दोनों पक्षों को हुआ है.

मोटे तौर पर रूस को बढ़त हासिल है क्योंकि उसकी सैनिक ताक़त काफी ज्यादा है. लेकिन रूस ने जैसी योजना बनाई थी, उस हिसाब वह फौरी जीत हासिल करने में नाकाम रहा है. यहां हम कुछ हालातों पर गौर करेंगे, जो युद्ध का पलड़ा किसी भी तरफ झुका सकते हैं.

हार और जीत

उत्तर में जवाबी हमले के जरिए यूक्रेन रूस को खारकीएव से दूर रखने में सफल हुआ लेकिन दक्षिण में रूस का पलड़ा भारी था. अब रूस ने मारियुपोल पर फतह हासिल कर बढ़त बना ली है. खारकीएव और मारियुपोल दोनों जगह की लड़ाइयों में बड़ी तादाद में सैनिक और नागरिक मारे गए. लेकिन दोनों जगह की जीत किसी एक पक्ष में निर्णायक साबित होती नहीं दिखती.

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मारियुपोल और खारकीएव में जो हुआ है वह इस जंग के अब तक के उतार-चढ़ाव को दिखाता है. अब उत्तर में महंगी हार और जीत का पैटर्न दोहराया जा रहा है.

रूस को डोनबास में थोड़ी ही लेकिन बढ़त मिल रही है. अब वहां उसने अपना फोकस और मजबूत किया है. लेकिन उसे वहां नुकसान भी हुआ है. सिवरस्की डोनेट्स नदी को पार करते हुए रूस की दर्जनों हथियारबंद गाड़ियों को नुकसान पहुंचा है.

रूस के पास हैं ज़्यादा हथियार

पूर्वी हिस्से में रूस और यूक्रेन दोनों ओर से तोपों का खूब इस्तेमाल हो रहा है . इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटजिक स्टडीज में ब्रिटिश आर्मी के पूर्व ब्रिगेडियर बेन बेरी कहते हैं कि डोनबास की लड़ाई में ये हालात बने रहेंगे.

उनका कहना है कि तोपों से होने वाली ये लड़ाई हफ्तों और महीनों तक दोनों ओर जनहानि की वजह बनी रहेगी. पश्चिमी अधिकारियों ने रूसी पक्ष को हुए अच्छे-खासे नुकसान का ज़िक्र किया है . लेकिन वो यूक्रेनी पक्ष को हुए नुक़सान को बताने में हिचक रहे हैं.

पश्चिमी देशों की मदद के बावजूद यूक्रेन के पास हथियारों की कमी बनी है. फिलहाल उसे यूएस एम 777 तोपें मिल रही हैं. उसे काउंटर-आर्टिलरी रडार सिस्टम भी मिल रहा है ताकि रूसी आर्टिलरी लाइन को खोज कर उस पर हमला किया जाए. लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है यूक्रेन के पास अब भी रूस की तुलना में हथियार कम हैं.

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दांवपेंच

रूसी सैनिक अपने इलाकों की रक्षा में जुटी यूक्रेनी सेनाओं पर तोप से खूब गोले बरसा रहे हैं. उन पर रॉकेटों से भी हमला हो रहा है. रूस इस वक्त दो तरफ से हमला कर रहा है. उत्तर में आइजम और पश्चिम में सेवेरदोनेत्स्क से. हालांकि उसे दोनों ओर आगे बढ़ने में थोड़ी ही सफलता मिली है.

ब्रिगेडियर बेरी का कहना है, "ऐसा लगता है कि रूस यूक्रेनी सैनिकों को वहां मारना चाहता है, जहां वो सबसे बुरी हालत में फंसे हों. यहां पर उन पर तोपों से धुंआधार हमला हो सकता है."

सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि इससे यूक्रेन के सैनिकों को भारी नुकसान हो सकता है लेकिन यूक्रेन अभी भी रूसी सैनिकों को रोकने के लिए डोनबास के शहरी इलाकों का इस्तेमाल कर सकता है. शहरों में लड़ाइयां यूक्रेन की सेना के लिए मददगार रही हैं.

रूसी सेना एक बार फिर मारियुपोल की ही तरह यूक्रेनी सेना के विरोध को कुचलने के लिए पूरा जोर लगाएगी. इसके लिए ये अपनी पहले से ही आजमाई रणनीति के मुताबिक चलेगी. यानी तोपों का जबरदस्त इस्तेमाल. यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदोमीर जेलेंस्की ने पहले ही कहा था कि रूसी हमले में पूर्वी डोनबास पूरी तरह ध्वस्त हो गया है और वहां जिंदगी नरक बन गई है.

रूस के लिए कठिन चुनौती

हालांकि सैन्य विशेषज्ञों का ये मानना है कि पूर्वी इलाके में रूस के पास अहम बढ़त बनाने लिए सैनिकों की कमी है. अगर खारकीएव और मारियुपोल के सैनिकों को लाकर यहां फिर तैनात किया जाए तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला.

रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट के जैक वैटलिंग का कहना है कि रूस के पास अभी भी सैनिकों की कमी है. खास कर पैदल सेना में. रूस ने बुरी तरह घायल यूनिटों को फिर से व्यवस्थित और खड़ा करने की कोशिश की है. इन यूनिटों को 'फ्रैंक्स्टिन फोर्सेज' कहा जाता है.

रूस की सेना में तालमेल और हौसले की कमी दिख रही है. उससे उसका प्रदर्शन खराब होता जा रहा है. ब्रिटेन की मिलिट्री इंटेलिजेंस के हालिया आकलन में कहा गया है कि रूसी कमांडर जल्दी नतीजे पाने में नाकाम रहे हैं. इसलिए वे एक बार सेना को इस तरह व्यवस्थित करना चाहते हैं ताकि ज्यादा तीखे वार कर अंदर घुसा जा सके.

लेकिन मंत्रालय का कहना है कि इससे सैनिक यूनिट छोड़ कर भाग सकते हैं. यह भी दावा किया जा रहा है हमलावर सैनिकों में रूस एक तिहाई को खो चुका है. साथ ही बड़ी तादाद में उसके सैनिक साजो सामान भी नष्ट हुए हैं.

वैल्टिंग कहते हैं कि रूस इन कमियों को पूरा कर रहा है. वह चालीस से ज्यादा उम्र के सैनिकों को मोर्चे पर लगाने और थोड़ी अवधि के लिए अधिकारियों की भर्ती की कोशिश में लगा है.

यूक्रेन के सामने इसकी सप्लाई लाइन की कमजोरियां भी उजागर हो चुकी है. लेकिन सेना को फिर से व्यवस्थित करने और इसकी ट्रेनिंग कराने में वक्त लगता है. दूसरी ओर यूक्रेन की इस मामले में क्षमता कमजोर लग रही है क्योंकि इसके ज्यादातर सैनिक मोर्चे पर लगे हुए हैं.

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लंबी लड़ाई

किसी को भी नहीं लग रहा है कि यह जंग जल्दी खत्म हो जाएगी. अभी भी बहुत कुछ होना है. रूस आगे बढ़ रहा है लेकिन बहुत धीमे-धीमे. लेकिन इस लड़ाई का नतीजा सिर्फ सैनिक ताकत पर निर्भर नहीं करेगा.

वैल्टिंग कहते हैं रूस यूक्रेन को नुकसान पहुंचाने के लिए आर्थिक और राजनीतिक ताकत का भी इस्तेमाल कर रहा है. पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से रूस को तो आर्थिक नुकसान पहुंचा है. लेकिन यूक्रेन को ज्यादा नुकसान हुआ है.

रूस की जीडीपी में अगले साल 12 फीसदी की गिरावट की आशंका है. लेकिन यूक्रेन की जीडीपी में 50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है. रूस की ओर से काला सागर का रास्ता रोक लिए जाने से यूक्रेन को बहुत ज्यादा नुकसान होगा.

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वैल्टिंग कहते हैं यूक्रेन के लिए पश्चिमी देशों की लगातार आर्थिक और सैन्य मदद काफी महत्वपूर्ण साबित होगी. सवाल ये है कि अगर लड़ाई लंबी चली तो क्या आगे चल कर लोग इसे लेकर उदासीन हो जाएंगे जैसा 2014 में क्राइमिया में हुआ था.

पश्चिमी देशों को भी अब अपनी घरेलू चिंताओं और चुनौतियों पर ध्यान देना है. इन देशों में महंगाई तेजी से बढ़ रही है. तेल और गैस के बढ़ते दाम से जीवन-यापन लगातार महंगा होता जा रहा है. युद्ध इसकी एक अहम वजह रहा है.

सर्दियों के आते ही रूस और यूक्रेन दोनों सेनाओं के लिए लड़ना और कठिन हो जाएगा. इसके साथ दुनिया के लिए आर्थिक संकट को झेलना भी और मुश्किल होता जाएगा.

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