रिकॉर्ड महँगाई, कमज़ोर रुपया और महँगा गेहूं- कैसे इससे पड़ेगा आपकी जेब पर असर

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बीते कुछ महीनों से सब्ज़ी, दूध, फल खाने पीने के ज़रूरी सामानों की क़ीमत आसमान छूती जा रही है. मंगलवार को सामने आए आँकड़े देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से परेशान करने वाले हैं. अप्रैल महीने में थोक महंगाई सूचकांक (डब्लूपीआई) 15.08% रहा जो नौ साल में सबसे अधिक है.

थोक मंहगाई सूचकांक बीते 13 महीनों से डबल डिजिट यानी दहाई की रफ़्तार पकड़े हुए है. ये दर बीते नौ साल में सबसे ऊंचे स्तर पर है.

लेकिन इसके मायने क्या हैं? इसका असर आपकी जेब पर कैसे होगा?

रिकॉर्ड स्तर पर थोक और खुदरा महँगाई

ये समझने के लिए आपको सबसे पहले समझना होगा कि थोक महँगाई सूचकांक या होल सेल प्राइस इंडेक्स क्या है और इसे कैसे तय करते हैं.

मुद्रास्फ़ीति या महँगाई का अर्थ होता है किसी भी वस्तु का दाम किस दर के साथ बढ़ रहा है. इसे मापने के दो मानक हैं- पहला साल दर साल और दूसरा महीना दर महीना.

लेकिन इस दर को दो स्तर पर तय किया जाता है. एक थोक बाज़ार में वस्तुओं की कीमत और दूसरा खुदरा बाज़ार में वस्तुओं की क़ीमत के आधार पर.

इन्हें ही थोक महँगाई सूचकांक और खुदरा महँगाई सूचकांक कहते हैं.

थोक मंहगाई सूचकांक

थोक महँगाई सूचकांक थोक बाज़ार में वस्तुओं की कीमत में होने वाले बदलाव को दर्शाता है. इसमें सिर्फ़ वस्तुओं की कीमत में हो रहे बदलाव को ही ध्यान में रखा जाता है और इसे तय करते समय सेवा की कीमत में आने वाले बदलावों को शामिल नहीं किया जाता.

वहीं रिटेल बाज़ार सूचकांक किसी भी वस्तु और सेवा के खुदरा बाज़ार में कीमत पर निर्भर करता है.

रिटेल बाज़ार में महँगाई दर आठ साल में सबसे ज़्यादा है. अप्रैल महीने में महँगाई दर 7.79 फ़ीसदी रही और वहीं मार्च में ये दर 6.95% थी.

थोक महँगाई दर के लिए आधार वर्ष 2011-12 है यानी इस साल को बेस ईयर या आधार वर्ष मान कर उसके आधार पर थोक महँगाई दर कितनी बढ़ी और कितनी घटी है इसकी गणना की जाती है. वहीं खुदरा महँगाई सूचकांक के लिए बेस ईयर 2012 है.

माना जा रहा है कि मंहगाई के पीछे बड़ा कारण रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध है. लेकिन इसका अलावा वक्त से पहले पड़ने वाला भीषण गर्मी भी इसकी एक मुख्य वजह है.

इस दोनों ही दरों में बढ़ोतरी का असर आपकी जेब पर सीधे पड़ता है. ये दर ही तय करती है कि रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए आपको कितने पैसे खर्च करने होंगे.

खुदरा मंहगाई सूचकांक

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की मंगलवार को आई रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की महँगाई दर काबू में करने में वक़्त लग सकता है.

यानी आपकी जेब पर जो दबाव पड़ रहा है वो आने वाले दिनों मे आपकी जेब को और हल्का ही करेगा.

रिपोर्ट ये भी कहती है कि तेज़ी से बढ़ती महँगाई को देखते हुए रिज़र्व बैंक अपनी मॉनेटरी बैठक में रेपो रेट फिर बढ़ाने वाली है. माना जा रहा है कि रेपो रेट महामारी के पहले के दौर जितना यानी 5.15 फ़ीसदी तय किया जा सकता है. जिसका मतलब है कि आने वाले समय में कार, होम और पर्सनल लोन महँगा हो जाएगा.

गेहूं-आटे की बढ़ती कीमत

भारत सरकार ने बीते सप्ताह भारत और पड़ोसी मुल्कों में फूड सिक्योरिटी का हवाला देते हुए गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने का फैसला किया है.

सरकार ने देश में गेहूं और आटे की बढ़ती कीमत को काबू करने के लिए ये क़दम उठाया है, हाल ही में गेहूं के निर्यात की मांग में ज़बरदस्त उछाल आया है और इस साल गेहूं की फ़सल कमज़ोर हुई है.

भारत ने 13 मई को तत्काल प्रभाव से सभी प्रकार के गेहूं के निर्यात को 'फ्री' से 'प्रोहेबिटेडट' श्रेणी में डाल दिया है.

गेहूं

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इस साल सरकार की गेहूं की खरीद 15 साल के सबसे निचले स्तर पर है. इस साल सरकार ने अब तक केवल 1.8 करोड़ टन गेहूं की ख़रीद की है वहीं साल 2021-22 में 4.3 करोड़ टन गेहूं की ख़रीद हुई थी.

इकोनॉमिक टाइम्स अख़बार से बात करते हुए विपणन सचिव बीवीआर सुब्रम्ण्यम ने कहा, "दुनिया में गेहूं की बढ़ती मांग और आने वाले वक्त में होने वाली संभावित कमी को देखते हुए अगर लोग अनाज का भंडारण करने लगते हैं, इसलिए ऐसा ना हो तो हमने निर्यात पर रोक लगाई है. इस फैसले से ये सुनिश्चित होगा कि भारत में ऐसा ना हो."

आधिकारिक डेटा के मुताबिक़, 8 मई तक एक किलो आटे कीमत 33 रुपये थी. बीते साल से तुलना करें तो यह कीमत 13% ज़्यादा है.

इसी महीने खाद्य सचिव सुधांशु पांडे ने कहा था कि कृषि मंत्रालय ने साल 2021-22 में गेहूं की पैदावार का अनुमान 11.1 करोड़ टन से घटा कर 10.5 करोड़ टन कर दिया है.

साल 2020-21 में गेहूं की पैदावार 10.9 करोड़ टन थी. जिसका मतलब है कि इस साल गेहूं की फसल बीते साल की तुलना में 6% कम हो सकती है.

इस साल गेहूं की फ़सल की खरीद सरकार की तरफ़ से काफ़ी कम की गई है.

सुधांशु पांडे के मुताबिक़ कम पैदावार और निजी एक्सपोर्टर्स की बेहतर कीमत पर खरीद के कारण साल 2022-23 व्यवसायिक साल में गेहूं की खरीद सरकार की ओर से 55% कम की गई है.

गेहूं

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जून तक चलने वाले गेहूं के इस सीज़न में अब तक गेहूं की खरीद सरकार की ओर से 1.7 करोड़ टन की गई है और इस सीज़न के आखिर पर 1.9 करोड़ हो जाएगी.

सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि निर्यात पर रोक इसलिए लगाई गई है ताकि देश में गेहूं की कमी ना होने पाए. सरकार का कहना है कि गेहूं की पैदावार में कमी का बहुत असर नहीं होगा क्योंकि गेहूं का भंडारण सरकार का पास है.

लेकिन फूड ग्रेन बुलेटिन के मुताबिक़ अप्रैल तक केंद्रीय भंडार में 1.8 करोड़ टन था जो बीते साल की इसी समयावधि के भंडारण से 30 फ़ीसदी तक कम है.

गेहूं की खरीद में जो कमी आई है उसका असर आटे की बढ़ती कीमत के ज़रिए तो नज़र आ ही रहा है इसके साथ ही सरकार की पीएम गरीब कल्याण योजना पर भी नज़र आ रहा है. इस योजना के तहत सरकार पांच किलो मुफ़्त अनाज गरीबों को सितंबर तक दे रही है.

हाल ही में सरकार ने इस योजना में गेहूं की जगह 55 लाख किलो चावल जोड़ दिया है यानी गेहूं की जगह चावल को रख दिया गया है, हालांकि सरकार ने इस क़दम के पीछे तर्क दिया कि वह गरीबों में पोषणयुक्त चावल (फोर्टिफ़ाइड राइस) के इस्तेमाल पर ज़ोर देना चाहती है.

अभी ही बाज़ार में गेहूं और आटा का दाम बढ़ रहा है. ये देखना होगा कि गेहूं के निर्यात पर रोक से इसकी कीमत कम होगी या नहीं.

रूपया और डॉलर

डॉलर के मुकाबले गिरता रुपया

मंगलवार को रुपया डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर जा पहुंचा है. एक डॉलर 77.69 रूपये के बराबर हो चुका है.

बीते कुछ महीनों में खबर आपको ये ख़बर अखबार और डिजिटल मीडिया पर आए दिन नज़र आती होगी कि रुपया लागातार डॉलर के मुकाबले गिरता जा रहा है, लेकिन इसका मतलब आपके लिए क्या है और कैसे अमेरिका की मुद्रा की कीमत का बढ़ना आपकी जेब पर असर डालता है?

इसका बेहद आसान जवाब है विदेश से आने वाली चीज़ों के लिए आपको ज़्यादा पैसे देने होंगे.

लगभग 85 फ़ीसदी अंतराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है. कच्चे तेल से लेकर अंतराष्ट्रीय कर्ज़ तक सारे लेनदेन डॉलर में ही होते हैं.

गिरते रुपये का सबसे बड़ा असर यह है कि आयात अधिक महंगा हो जाता है और निर्यात सस्ता हो जाता है. इसकी वजह ये है कि आयात की समान मात्रा का भुगतान करने में अधिक रुपये लगते हैं और निर्यात की समान मात्रा का भुगतान करने के लिए खरीददार को कम डॉलर लगते हैं.

इसलिए रुपये के मुकाबले डॉलर महंगा होता है तो उसका असर हर उस शख़्स पर होता है जो निर्यात की जा रही वस्तुएं खरीदता है.

(कॉपीः कीर्ति दुबे)

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