तुर्की को स्वीडन और फ़िनलैंड के नेटो में शामिल होने पर क्यों है एतराज़

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स्वीडन और फ़िनलैंड ने आख़िरकार घोषणा कर दी है कि वो नेटो की सदस्यता के लिए आवेदन करेंगे लेकिन इससे तुर्की की भौहें तन गई हैं.
यूक्रेन पर हमले के बाद रूस ने स्वीडन और फ़िनलैंड को नेटो में शामिल होने को लेकर चेतावनी दी थी लेकिन दोनों देशों ने इस ऐतिहासिक फ़ैसले को लेने में बिलकुल भी देर नहीं की है.
यूक्रेन पर रूस के हमले की सबसे बड़ी वजहों में से एक नेटो में उसके शामिल होने की इच्छा भी रही है.
इस पूरे घटनाक्रम के बीच तुर्की भी काफ़ी अहम मुल्क बन रहा है जिसने कई बार रूस और यूक्रेन के बीच बातचीत कराई है लेकिन इस नए घटनाक्रम में तुर्की ने फ़िनलैंड और स्वीडन की आलोचना की है.
तुर्की ने साफ़ कर दिया है कि वो नेटो में फ़िनलैंड और स्वीडन को शामिल करने से पहले अपनी चिंताओं को दूर करना चाहता है.
ग़ौरतलब है कि नेटो में तुर्की भी एक अहम किरदार अदा करता है और कई बड़ी फ़ौजों में से एक फ़ौज उसके देश की भी है.

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तुर्की को क्या है आपत्ति
नेटो के सदस्य तुर्की के आरोप हैं कि ये दोनों देश कुर्दिस्तान वर्किंग पार्टी (पीकेके) का समर्थन करते रहे हैं जो कि कई दशकों से तुर्की की सरकार के ख़िलाफ़ हथियारबंद संघर्ष छेड़े हुए हैं.
रविवार को तुर्की के विदेश मंत्री मेवलूत चेवूशोगलू ने कहा कि स्वीडन और फ़िनलैंड को अपने देशों में तुरंत आतंकवाद का समर्थन बंद कर देना चाहिए और सुरक्षा गारंटी देते हुए तुर्की पर से निर्यात प्रतिबंध हटा देना चाहिए.
हालांकि, उन्होंने यह भी साफ़ किया कि तुर्की किसी को धमकी नहीं दे रहा है या वो नेटो में अपनी ताक़त का इस्तेमाल कर रहा है.
वहीं, नेटो के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका ने कह दिया है कि उनके पास स्वीडन और फ़िनलैंड को लेकर समर्थन है.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि नेटो में दोनों देशों का लगभग हर कोई समर्थन कर रहा है और उनकी तुर्की के विदेश मंत्री के साथ भी बातचीत हुई है.

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उन्होंने कहा, "अगर वो इसमें शामिल होने को चुनते हैं तो मुझे पूरा भरोसा है कि हम इस पर एक आम सहमति पर पहुंच जाएंगे."
तुर्की के मीडिया के अनुसार, फ़िनलैंड के राष्ट्रपति सौनी नीनिस्तो कह चुके हैं कि वो तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं.
नीनिस्तो ने कहा कि वो तुर्की के बदलते रवैये को लेकर थोड़ा सा अस्पष्ट हैं.
उन्होंने कहा, "हम अभी जो चाहते हों वो बिलकुल साफ़ है. मैं राष्ट्रपति अर्दोआन के साथ नई चर्चा के लिए तैयार हूं, उन्होंने जो चिंताएं ज़ाहिर की हैं उन पर चर्चा के लिए तैयार हूं."
उन्होंने अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन से कहा कि उन्हें लगता है कि इस मसले पर बहुत अधिक चर्चा होगी और वो इसको लेकर बिलकुल भी चिंतित नहीं हैं.
स्वीडन की प्रधानमंत्री सना मारिन और फ़िनलैंड के राष्ट्रपति सौनी नीनिस्तो

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नेटो और अमेरिका को है उम्मीद
इसके साथ ही तुर्की के विदेश मंत्री मेवलूत चेवूशोगलू ने कहा है कि उन्होंने स्वीडन और फ़िनलैंड के विदेश मंत्रियों के साथ बर्लिन में मुलाक़ात की थी जो कि काफ़ी मददगार रही थी.
तुर्की के विदेश मंत्री ने साथ ही यह भी कहा कि वो इस गठबंधन की उस नीति का विरोध नहीं करता है जो सभी यूरोपीय देशों को इस संगठन में आवेदन करने की छूट देती है.
अमेरिका और नेटो ने रविवार को कहा था कि वो इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि तुर्की फ़िनलैंड और स्वीडन को नेटो में शामिल होने पर रोक नहीं लगाएगा.
नेटो के महासचिव जेन्स स्टोलेनबर्ग का कहना है कि उन्हें इस बात का भरोसा है कि कुर्द समूहों को समर्थन देने की तुर्की की चिंताओं को स्वीडन और फ़िनलैंड देखेगा.
स्वीडन और फ़िनलैंड में कुर्द समुदाय रहता है और स्वीडन में तो कई सांसद कुर्द मूल के हैं. हालांकि, तुर्की ऐसे कोई सुबूत मुहैया नहीं करा सका है जो इस समुदाय के पीकेके के साथ संबंध को दिखाता हो.
नेटो संगठन में किसी को भी शामिल करने के लिए सभी 30 सदस्य देशों और उसकी संसद की अनुमति लेना अनिवार्य होता है.
तुर्की बीते 70 सालों से नेटो का सदस्य है और उस पर फ़िनलैंड और स्वीडन को शामिल करने का अत्यंत दबाव भी हो सकता है क्योंकि नेटो के राजनयिकों का मानना है कि इस बड़े गठबंधन में फ़िनलैंड और स्वीडन को शामिल करने से बाल्टिक सागर में उसे मज़बूती देगा.

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नेटो क्या है?
नॉर्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो 1949 में बना एक सैन्य गठबंधन है जिसमें शुरुआत में 12 देश थे जिनमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल थे.
इस संगठन का मूल सिद्धांत ये है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो बाकी देश उसकी मदद के लिए आगे आएंगे.
यह यूरोपीय देशों का एक सैन्य गठबंधन है और इसमें भौगोलिक स्थिति के हिसाब से सामरिक शक्ति को बढ़ाने के लिए सदस्य जोड़े जाते रहे हैं अपनी भौगोलिक स्थिति और कूटनीतिक कारणों से भारत नेटो का सदस्य नहीं है. दरअसल नेटो में कोई भी एशियाई देश सदस्य नहीं है.
इसका मूल मक़सद दूसरे विश्व युद्ध के बाद रूस के यूरोप में विस्तार को रोकना था. 1955 में सोवियत रूस ने नेटो के जवाब में पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देशों के साथ मिलकर अपना अलग सैन्य गठबंधन खड़ा किया था जिसे वॉरसा पैक्ट नाम दिया गया था.

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लेकिन 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद वॉरसा पैक्ट का हिस्सा रहे कई देशों ने दल बदल लिया और वो नेटो में शामिल हो गए. नेटो गठबंधन में अब 30 सदस्य देश हैं.
स्वीडन और फ़िनलैंड कभी भी नेटो के सदस्य नहीं रहे हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्वीडन तटस्थ रहा था और दो सदी से अधिक समय से वो किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं हो रहा था.
फ़िनलैंड की रूस के साथ 1,300 किलोमीटर लंबी सीमा है और अभी तक वो नेटो से बाहर था कि ताकि वो पूर्व में अपने पड़ोसी रूस को नाराज़ न करे.
स्वीडन के सत्ताधारी दल सोशल डेमोक्रेट्स ने कहा है कि वो सदस्यता की दिशा में काम करेगा. हालांकि उसने यह भी कहा है कि वो परमाणु हथियारों की तैनाती और नेटो बेस बनाने का विरोध करेगा.
कॉपी - मोहम्मद शाहिद
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