रूस और यूक्रेन युद्ध की वो कहानी जिसे अमेरिका और पश्चिम नहीं सुन रहे

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, फ्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी सुरक्षा संवाददाता
"यूक्रेन और उसके सहयोगी देश, जिनमें ब्रिटेन भी शामिल है, रूस को पिछले एक हज़ार साल से धमका रहे हैं, वो नेटो को हमारी सीमाओं के क़रीब लाने की धमकी दे रहे हैं, हमारी संस्कृति को खारिज करना चाहते हैं, वो हमें कई सालों से डराते रहे हैं."
रूस की संसद (डूमा) के सदस्य और रूस में प्रभावशाली टीवी होस्ट येवगेनी पोपोव ने ये बात बीबीसी के यूक्रेनकास्ट कार्यक्रम में 19 अप्रैल को कही.
उन्होंने कहा, "ज़ाहिर तौर पर यूक्रेन को लेकर नेटो की योजनाएं रूस के नागरिकों के लिए ख़तरा हैं."
उनके ये विचार ना सिर्फ़ हैरान करने वाले, बल्कि शिक्षाप्रद भी हैं क्योंकि रूस ने उससे बिलकुल अलग नज़रिया पेश किया है जो पश्चिमी देशों में देखा जाता है.
यूरोपीय और पश्चिमी देशों के लोगों के लिए ये घोषणाएं कल्पना से परे लगती हैं, यहां तक कि इन्हें सावधानीपूर्वक जुटाए गए सबूतों का अपमान भी माना जा सकता है.
हालांकि ये ऐसे विचार हैं जिन्हें ना सिर्फ़ रूस समर्थक बल्कि रूस और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले बहुत से लोग सही मानते हैं.
रूस ने जब 24 फ़रवरी 2022 को यूक्रेन पर हमला बोला तो संयुक्त राष्ट्र ने निंदा प्रस्ताव पर आपात मतदान कराया जिसमें संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 141 ने रूस के विरोध में वोट किया.
लेकिन कई प्रमुख देश इस मतदान से अनुपस्थित रहे इनमें भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका भी शामिल थे.
ऐसे में अगर पश्चिमी नेता ये सोचते हैं कि पूरी दुनिया नेटो के नज़रिए का समर्थन करती है तो ये एक भ्रम ही होगा.
नेटा का विचार है कि यूक्रेन में युद्ध के लिए रूस ही पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं.
ऐसे में कई देश रूस के आक्रमण को लेकर तटस्थ क्यों हैं?
इसके कई कारण हैं, इनमें सीधे तौर पर सैन्य और आर्थिक हित, पश्चिमी देशों पर दोगले मापदंडों के आरोपों से लेकर यूरोप का उपनिवेशिक इतिहास तक शामिल हैं. कोई एक कारण सभी देशों पर लागू नहीं हैं. हर देश के रूस की सार्वजनिक तौर पर आलोचना ना करने और पुतिन को अलग-थलग ना करने के अपने ख़ास कारण हो सकते हैं.
सहयोग की कोई सीमा नहीं
सबसे पहले चीन की बात करते हैं. ये दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश है जहां 140 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं. यहां की अधिकतर आबादी को समाचार सरकार के नियंत्रण वाले मीडिया से वैसे ही मिलते हैं, जिस तरह से रूस के अधिकतर लोगों को ख़बरें मिलती हैं.
24 फ़रवरी को यूक्रेन पर आक्रमण शुरू होने से पहले ही चीन में शीतकालीन ओलंपिक के दौरान राष्ट्रपति पुतिन हाई प्रोफ़ाइल मेहमान थे.
पुतिन की यात्रा के बाद चीन की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया था कि दोनों देशों के बीच सहयोग की कोई सीमा नहीं है.
ऐसे में सवाल उठा कि क्या पुतिन ने अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग को पहले ही बता दिया था कि वो यूक्रेन पर बड़ा हमला करने जा रहे हैं?
चीन का कहना है कि ऐसा बिलकुल भी नहीं है, लेकिन ये कल्पना करना मुश्किल है कि रूस ने चीन को इस बारे में संकेत नहीं दिए होंगे. चीन रूस का अहम पड़ोसी और सहयोगी देश है.

इमेज स्रोत, Getty Images
हो सकता है कि भविष्य में एक समय ऐसा आए जब चीन और रूस एक दूसरे के रणनीतिक प्रतिद्वंदी हों, लेकिन आज वो सहयोगी देश हैं और नेटो, पश्चिमी देशों और उनके लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ उनके हित साझा हैं.
चीन पहले ही दक्षिण चीन सागर में अपने सैन्य विस्तार को लेकर अमेरिका से टकरा चुका है. चीन वीगर मुसलमानों के साथ बर्ताव और हांगकांग में लोकतंत्र के हनन को लेकर पश्चिमी सरकारों से भी टकरा चुका है.
चीन ये भी ज़ोर देकर कहता रहा है कि अगर ताइवान को वापस हासिल करने के लिए ताक़त का भी इस्तेमाल करना पड़ा तो वो करेगा.
ऐसे में नेटो चीन और रूस का साझा दुश्मन है. दोनों देशों की सरकारों के विचार वहां की जनता तक भी फैलते हैं जिसके नतीजे में यूक्रेन पर आक्रमण और कथित युद्ध अपराधों को लेकर पश्चिमी के आलोचनात्मक नज़रिए को साझा नहीं करते.
भारत और पाकिस्तान के रूस को नाराज़ ना करने के अपने-अपने कारण हैं. भारत अपने अधिकतर हथियार रूस से ही ख़रीदता है और हाल ही में हिमालय क्षेत्र में चीन के साथ हिंसक टकराव के बाद भारत को ये लगता है कि एक दिन उसे सहयोगी और रक्षक के रूप में रूस की ज़रूरत पड़ सकती है.
पाकिस्तान के हाल ही में पद से हटाए गए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रखर आलोचक रहे हैं.पाकिस्तान भी रूस से हथियार ख़रीदता है और उसे मध्य एशिया में व्यापारिक रास्ते बनाए रखने के लिए भी रूस की ज़रूरत है.
पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान 24 फ़रवरी को अपनी पूर्व निर्धारित यात्रा पर पुतिन से मिलने मास्को पहुंचे थे. इसी दिन रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था.
संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन पर आक्रमण के निंदा प्रस्ताव के दौरान भारत और पाकिस्तान दोनों ही अनुपस्थित रहे थे.
दोगलापन और दोहरे मापदंड
फिर कई देशों का ये आरोप है, जिनमें अधिकतर मुस्लिम देश शामिल हैं कि दुनिया के सबसे ताक़तवर देश अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देश दोहरे मापदंड अपनाते हैं.
2003 में अमेरिका और ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के अधिकतर देशों की राय को दरकिनार करके इराक़ पर हमला कर दिया था. संदिग्ध आधार पर किए गए इस हमले के बाद सालों तक इराक़ में हिंसा जारी रही.
अमेरिका और ब्रिटेन पर यमन में जारी गृहयुद्ध को और लंबा खींचने का आरोप भी लगा है. उन्होंने सऊदी अरब की वायुसेना को हथियार दिए हैं जो यमन में अधिकारिक सरकार के समर्थन में हूती विद्रोहियों पर हवाई हमले कर रही है.
वहीं अफ़्रीका के कई देशों, में अन्य ऐतिहासिक कारण हैं. सोवियत संघ के समय में रूस ने अफ़्रीका में सहारा से लेकर केप तक हथियार भेजे क्योंकि वह पश्चिमी देशों और अमेरिका के प्रभाव को कम करना चाहता था.
कई जगहों पर 19वीं और 20वीं सदी के यूरोपीय उपनिवेशकाल की यादें अभी तक ताज़ा हैं और स्थानीय लोगों की भावनाओं को प्रभावित करती हैं.
फ्रांस, जिसने साल 2013 में अपने पूर्व उपनिवेश माली में अल क़ायदा के बढ़ते प्रभाव को रोकन के लिए सैनिक भेजे थे, यहां बहुत लोकप्रिय नहीं है.
अब फ्रांस के अधिकतर सैनिक लौट चुके हैं और यहां रूस समर्थक वागनर ग्रुप के निजी लड़ाकों ने उनकी जगह ले ली है.

इमेज स्रोत, Getty Images
और मध्य पूर्व यहां कहां खड़ा है ?
इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि सीरिया, उत्तर कोरिया, बेलारूस और इरीट्रिया रूस के साथ खड़े रहे हैं.
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद अपनी सत्ता चलाए रखने के लिए रूस पर निर्भर हैं. 2015 में सीरिया इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के हाथ में जाते-जाते बचा था.
वहीं पश्चिमी देशों के पुराने सहयोगी सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने संयुक्त राष्ट्र में तो निंदा प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन वो रूस के ख़िलाफ़ खुलकर बोलने से बचते रहे हैं.
संयुक्त अरब अमीरात के क्राउन प्रिंस और शासक प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायेद के पुतिन के साथ अच्छे रिश्ते हैं. मास्को में उनके पूर्व राजदूत पुतिन के साथ शिकार तक खेलने जा चुके हैं.
यहां ये भी याद किया जाना चाहिए कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के बीच बहुत गर्मजोशी वाले रिश्ते नहीं हैं.
रिपोर्टों के मुताबिक दोनों एक दूसरे को इतना नापसंद करते हैं कि वो एक दूसरे का फोन तक नहीं उठाते हैं.
इससे पहले जब पश्चिमी देशों के पत्रकार जमाल खाशोग्गी की हत्या का आरोप सऊदी क्राउन पर लगाने के कुछ सप्ताह बाद 2018 में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान दुनिया के नेता ब्यूनस आयर्स में मिले थे तब अधिकतर पश्चिमी नेताओं ने क्राउन प्रिंस से मिलने में गर्मजोशी नहीं दिखाई थी.
वहीं पुतिन ने उन्हें देखकर हाई-फाई किया था. ये कोई ऐसी बात नहीं है जिसे सऊदी के नेता जल्दबाज़ी में भूल गए होंगे.
इसका ये मतलब नहीं है कि बेलारूस के अलावा यहां जिन देशों का नाम लिया गया है वो यूक्रेन पर हमले का सक्रिय समर्थन करते हैं.
2 मार्च को संयुक्त राष्ट्र में हुए मतदान के दौरान सिर्फ़ पांच देशों ने ही रूस का समर्थन किया था. इनमें से एक स्वयं रूस था.
लेकिन इसका ये मतलब ज़रूर है कि कई कारणों की वजह से पश्चिमी देश ये नहीं सोच सकते हैं कि पुतिन को लेकर जो उनकी राय है वो ही दुनिया के बाक़ी देशों की भी है.
ना ही प्रतिबंधों, या पश्चिमी देशों के खुलकर रूस का मुक़ाबला करने या यूक्रेन को अधिक मारक हथियार देने को लेकर बाकी दुनिया की राय पश्चिमी देशों जैसी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)




















