पुतिन की धमकी के बावजूद नेटो में क्यों जाना चाहता है फ़िनलैंड

    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

रविवार को हुईं अहम घोषणाएं

  • साउली निनिस्तो ने पुष्टि कर दी है कि उनका देश औपचारिक तौर पर नेटो की सदस्यता के लिए आवेदन करेगा.
  • फ़िनलैंड की प्रधानमंत्री सना मरीन ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि देश की संसद अगले कुछ दिनों में ही नेटो में शामिल होने के लिए आवेदन करने के फ़ैसले की पुष्टि कर देगी.
  • नेटो महासचिव जेन्स स्टोलटेनबर्ग ने कहा कि अगर फ़िनलैंड और स्वीडन नेटो में शामिल होने का फ़ैसला करते हैं, तो यह ऐतिहासिक होगा.
  • जर्मन विदेश मंत्री ने कहा- "स्वीडन, फ़िनलैंड: अगर आप तैयार हैं, तो हम भी तैयार हैं."
  • अमेरिका के विदेश मंत्री ने कहा, "अमेरिका, फ़िनलैंड और स्वीडन के इस फ़ैसले का पूर्णतौर पर समर्थन करता है."

तटस्थ रहने वाले फ़िनलैंड ने अब क्यों लिया है ये फ़ैसला

फिनलैंड रूस के साथ 1340 किलोमीटर लम्बी सीमा साझा करता है, ऐसे में उसकी स्थिति भौगोलिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है.

फ़िनलैंड ने 1917 में स्वतंत्रता की घोषणा की थी. उससे पहले फ़िनलैंड का अधिकतर हिस्सा, रूस के अधीन थे. फ़िनलैंड द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ चुका है. स्वीडन ने पिछले 200 सालों में कोई युद्ध नहीं लड़ा है. उसकी विदेश नीति लोकतंत्र समर्थन और परमाणु निरस्त्रीकरण पर केंद्रित रही है.

इस साल जनवरी महीन में जब रूसी सेना यूक्रेन से लगी सीमा के पास जमा हो रही थी तो फ़िनलैंड की प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनके देश के नेटो से जुड़ने की संभावना बहुत कम है.

लेकिन, रूस के यूक्रेन पर हमला करने के बाद से फ़िनलैंड के पहले के और अभी के विचार में बड़ा बदलाव आया और ये फ़ैसला उसी का नतीजा है.

नेटो के लिए आवेदन करने को फ़िनलैंड एक 'ज़रूरत' के तौर पर परिभाषित करता है. फ़िनलैंड की यूरोप मामलों की मंत्री टित्ति टपरेनेन ने कहा कि यूक्रेन पर रूस के हमले ने सब कुछ बदल दिया है.

लेकिन इस अहम घोषणा के एक दिन पहले ही रूस के राष्ट्रपति ने फ़िनलैंड के राष्ट्रपति से बात की थी. इस बातचीत के दौरान पुतिन ने उन्हें यह भी आश्वासन दिया था कि फ़िनलैंड की सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है.

फिर फ़िनलैंड ने यह क़दम क्यों उठाया?

इस सवाल के जवाब में किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "यूक्रेन को लेकर जिस तरह का रुख़ रूस ने अपनाया है इससे बहुत ही कम देश ऐसे बचे हैं, उसके बहुत कम ही पड़ोसी देश बचे हैं जो रूस की किसी भी बात पर विश्वास करें."

वह आगे कहते हैं, "क्योंकि रूस ने यूक्रेन के बारे में भी ऐसा कहा था कि वह रणनीतिक समाधान चाहते हैं लेकिन उसने हमला कर दिया. इस संदर्भ में रूस के तमाम पड़ोसी देशों और यूरोपीय संघ को रूस के साथ अपनी विदेश नीति बदलनी होगी. जिस तरह रूस का रवैया रहा है उसके बयान पर विश्वास करने को लेकर डर भी है, संदेह भी है और अविश्वास भी है."

हर्ष पंत की इस बात का समर्थन रूस की वो धमकियां भी करती हैं जिसमें उसने फ़िनलैंड को नेटो में शामिल होने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी.

विदेश मामलों के जानकार मनोज जोशी का मानना है कि फ़िनलैंड और रूस का पुराना रिश्ता रहा है. जिस तरह यूक्रेन पर हमला हुआ है बेशक फ़िनलैंड उससे डरा हुआ है. दूसरी बात ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी है कि अतीत में रूस ने फ़िनलैंड का बहुत हिस्सा हड़प लिया था. साथ ही बाल्टिक रिपब्लिक की भी बात हो रही थी, हो सकता है फ़िनलैंड को इन बातों से आशंका हो और इसीलिए उसने यह क़दम उठाया हो.

रूस ने चेतावनी दी थी कि अगर स्वीडन और फ़िनलैंड नेटो में शामिल हुए तो रूस यूरोप के बाहरी इलाक़े में परमाणु हथियार और हाइपरसोनिक मिसाइल तैनात कर देगा. रूस ने धमकी देते हुए कहा था कि फ़िनलैंड का यह क़दम निश्चित तौर पर द्विपक्षीय रिश्तों को नुक़सान पहुँचाएगा. इसके साथ ही उत्तरी यूरोप में सुरक्षा और स्थायित्व की स्थिति भी प्रभावित होगी.

फ़िनलैंड के इस फ़ैसले से क्या कुछ बदलेगा

कुछ मामलों में तो कुछ भी नहीं.

स्वीडन और फ़िनलैंड 1994 से नेटो के आधिकारिक पार्टनर हैं. हांलाकि ये पूर्ण सदस्यता से अलग है. दोनों ही देशों ने शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से कई नेटो मिशन में भाग भी लिया है.

इस आवेदन के बाद नेटो में औपचारिक रूप से शामिल होने के बाद एक बड़ा बदलाव नेटो के "अनुच्छेद 5" के अनुप्रयोग को लेकर होगा. जिसके तहत एक सदस्य देश पर अगर कोई हमला होता है तो उसे सभी सदस्यों पर हमले के रूप में देखा जाता है. साथ ही पहली बार, फ़िनलैंड और स्वीडन को परमाणु देशों से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी.

विदेश मामलों के जानकार मनोज जोशी कहते हैं, "फ़िनलैंड पहले भी नेटो की बैठकों में शामिल होता रहा है लेकिन आवेदन करके औपचारिक तरीके से शामिल होने का मकसद सिर्फ़ आर्टिकल-5 के तहत वो आश्वासन हासिल करना है कि अगर रूस या कोई देश उस पर हमला करे तो उसके लिए लड़ने वाला कोई हो."

"नेटो का सदस्य बनकर उसे इसकी गारंटी मिल जाएगी."

रूस की सामरिक हार और बढ़ती चुनौती

रूस की तमाम धमकियों के बीच फ़िनलैंड ने नेटो की औपचारिक सदस्यता की दिशा में क़दम बढ़ा दिया है. तो क्या इसे रूस के घटते प्रभाव के रूप में देखा जाए?

हर्ष पंत कहते हैं, "एक तरह से मुझे लगता है कि यह रूस की एक बहुत बड़ी सामरिक हार है. क्योंकि जिस तरह यूक्रेन के साथ युद्ध छिड़ा हुआ है और जो विवाद है, उसका एक बड़ा कारण रूस ने यही दिया था, कि अगर यूक्रेन नेटो में शामिल हो जाता है तो वह रूस की सीमाओं के क़रीब आ जाएगा. तो अब जबकि फ़िनलैंड और स्वीडन जैसे देश, जिन्होंने अभी तक फॉर्मली नेटो को ज्वाइन नहीं किया था, और ना ही उनकी कोई मंशा थी कि वो ज्वाइन करेंगे. ऐसे में जिन कारणों से रूस ने यूक्रेन पर हमला शुरू किया था अब वो दूसरे तरह से उसके सामने आ चुका है. एक तरह से यह रूस ने अपनी समस्या को और बढ़ा दिया है."

हर्ष पंत कहते हैं कि रूस के लिए बड़ा ख़तरा है. रूस के लिए फ़िनलैंड और स्वीडन अभी तक बफ़र देश थे लेकिन अब जबकि फ़िनलैंड ने आवेदन करने का मन पक्का कर लिया है तो नेटो गठबंधन फ़िनलैंड की रक्षा के लिए खड़ा रहेगा.

मनोज जोशी मानते हैं, "रूस के लिए इससे चुनौती तो बढ़ेगी लेकिन ये उसकी अपनी ग़लती ही है. फ़िनलैंड, रूस से एक लंबी सीमा साझा करता है और अब जब फ़िनलैंड नेटो में शामिल होने की ओर क़दम बढ़ा रहा है तो रूस के लिए चुनौती तो है ही. नेटो के इतने क़रीब आ जाने से रूस के लिए तनाव तो होगा ही लेकिन कुछ भी इतना ताबड़-तोड़ नहीं होगा. रूस मिसाइल से घबराता है और अगर फ़िनलैंड से मिसाइल दागी जाएंगी तो रूस के लिए चुनौती होगी ही."

यूरोप की भूमिका

फ़िनलैंड की आवेदन करने की घोषणा के बाद से जर्मनी, अमेरिका समेत कई देशों ने उनका स्वागत किया है. यूरोप जिस तरह से फ़िनलैंड की नेटो में भागीदारी को लेकर अति-सक्रिय बना हुआ है उससे क्या संकेत मिलते हैं?

इस सवाल के जवाब में हर्ष पंत कहते हैं कि यूरोप को लगता है कि उन्हें रूस को यह दिखाना ज़रूरी है कि वे एक साथ खड़े हैं और फ़िनलैंड को लेकर यूरोप की प्रतिक्रिया भी इसी का रूप है.

वह कहते हैं, "यूरोप को लगता है कि अगर उन्होंने रूस को यह संदेश नहीं दिया कि वे साथ हैं तो रूस ये समझ सकता है कि यूरोपीय देशों में कमज़ोरी है और वे एकजुट नहीं है. पश्चिमी देश यह संदेश देना चाहते हैं कि यूक्रेन पर हमले के बाद पश्चिमी देश कमज़ोर पड़ जाएंगे, नरम रवैया अपनाएंगे तो ऐसा नहीं है. उसका विपरीत असर होगा और इसीलिए यूरोप भी फ़िनलैंड को लेकर इतनी तेज़ी दिखा रहे हैं. वे संदेश देना चाहते हैं कि यूरोपीय देशों को कमज़ोर समझने की ग़लती रूस ना करे."

जर्मन विदेश मंत्री ने भी अपने बयान में ऐसा ही कुछ कहा था. उन्होंने कहा- "स्वीडन, फ़िनलैंड: अगर आप तैयार हैं, तो हम भी तैयार हैं."

मनोज जोशी कहते हैं कि दूर से देखने पर भले ये लगता हो कि ये क़दम यूरोप के बढ़ावे का नतीजा है लेकिन ये पूरी तरह से फ़िनलैंड का फ़ैसला है.

क्या रूस-यूक्रेन पर पड़ेगा कोई असर

24 फ़रवरी से यूक्रेन पर शुरू हुआ रूस का हमला अभी भी जारी है. लाखों लोग यूक्रेन से पलायन कर चुके हैं. हज़ारों की संख्या में दोनों ओर के सैनिक मारे जा चुके हैं. शहर के शहर तबाह हो चुके हैं लेकिन युद्ध जारी है. रूस यूक्रेन के मारियुपोल जैसे कई कई अहम शहरों पर कब्ज़े का दावा करता है तो यूक्रेन का कहना है कि उसने कई इलाक़ों को दोबारा हासिल कर लिया है.

लेकिन फिलहाल युद्ध समाप्त होता नहीं दिख रहा.

लेकिन अब जबकि फ़िनलैंड नेटो में शामिल होने के लिए आवेदन करने जा रहा है तो क्या रूस अपने क़दम पीछे खींचेंगा क्योंकि जिस प्रयोजन से यह युद्ध शुरू हुआ था, वो तो फ़ेल होता दिख रहा है.

इस पर हर्ष पंत कहते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध पर इसका सीधा असर तो पड़ता नहीं दिख रहा है लेकिन ये ज़रूर है कि इस बात से रूस को एकबार फिर यह संदेश जाएगा कि जो उसके पड़ोसी देश हैं, उसके लिए किस बारे में सोच रहे हैं. रूस को यह भी समझ आएगा कि जो उसके पड़ोसी न्यूट्रल रहे हैं अगर वो अपनी विदेश नीति पर दोबारा सोच रह हैं.

वह कहते हैं, "ऐसे देश जो दशकों तक न्यूट्रल रहे हैं तो इसका असर रूस पर ज़रूर होगा. रही बात युद्ध की तो रूस ने अपने आपको इतना आगे बढ़ा दिया है कि अब युद्ध को जारी रखने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. क्योंकि इसका सीधा असर पुतिन और उनकी इमेज पर होगा."

फिलहाल पुतिन के पास अब आगे बढ़ने के अलावा बहुत कम विकल्प हैं और वो सिर्फ़ यूक्रेन में ही आगे नहीं बढ़ेंगे बल्की उसकी सीमाओं से बाहर भी निकल सकते हैं. मौजूदा परिस्थिति में संकट का गहराना निहित है और यूरोप अपने हाल के इतिहास के सबसे ख़तरनाक़ मोड़ पर खड़ा है.

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