यूक्रेन और रूस के बीच लड़ाई के पांच नतीजे क्या निकल सकते हैं?

    • Author, जेम्स लैंडेल
    • पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता

युद्ध के कोहरे में आगे का रास्ता देखना मुश्किल हो सकता है. जंग के मैदान से आ रही ख़बरें, देशों की बयानबाज़ियां, बेघर हो चुके लोगों की दुख-तकलीफ़ें, युद्ध के दौरान इस सबका शोर आपको घेरे रहता है.

तो ऐसे में कुछ वक़्त ठहरकर ये देखते हैं कि इस पूरे संकट के क्या संभावित समाधान हो सकते हैं जिन पर राजनेता और सैन्य योजनाकार विचार कर रहे हैं? कुछ समाधान ज़्यादा व्यावहारिक दिखते हैं तो कुछ की संभावनाएं कुछ कम हैं.

1. युद्ध जल्द ही ख़त्म हो जाए

इस संभावना में रूस अपने हमले तेज़ कर सकता है जिसके विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं. कीएव के चारों ओर बमबारी, मिसाइल हमले और साइबर हमले बढ़ सकते हैं. ऊर्जा, आपूर्ति और संचार के माध्यमों को काटा जा सकता है. हज़ारों लोग मारे जा सकते हैं.

ऐसी सूरत में पूरी बहादुरी दिखाने के बावजूद कुछ ही दिनों में कीएव रूस के नियंत्रण में आ सकता है. वहां रूस के नियंत्रण वाली एक कठपुतली सरकार का गठन कर दिया जाता है. यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की या तो हत्या कर दी जाती है या वो देश के पश्चिमी हिस्से में चले जाते हैं या निष्कासित सरकार बनाने के लिए देश छोड़कर भाग जाते हैं.

ऐसे में राष्ट्रपति पुतिन जीत की घोषणा करके अपनी कुछ सेना वापस बुला सकते हैं. लेकिन, यूक्रेन पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए कुछ सेना वहां छोड़ी जा सकती है. यूक्रेन से हज़ारों लोगों का पलायन जारी रहेगा. और यूक्रेन, बेलारूस की तरह रूस का एक सहयोगी राष्ट्र बन जाता है.

हालांकि, ऐसा होना असंभव भी नहीं है लेकिन यह कई अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. और कठपुतली सरकार न केवल अस्थिर होगी बल्कि बग़ावत की आशंका भी बनी रहेगी.

2. अगर युद्ध लंबा चला

इसकी संभावना अधिक है कि ये लड़ाई लंबी खिंच जाए. रूस की सेना यूक्रेन में फंस सकती है, सैनिकों का हौसला पस्त हो सकता है और आपूर्ति की समस्या आ सकती है.

रूस को कीएव जैसे शहरों पर कब्ज़ा करने में लंबा समय लग सकता है क्योंकि वहां रक्षक गलियों के स्तर तक संघर्ष करते हैं. ये लड़ाई 1990 में चेचन्या की राजधानी ग्रोज़्नी पर क़ब्ज़ा करने में रूस को लगे समय और क्रूर संघर्ष की याद दिलाती है.

रूस नियंत्रण में लिए शहरों पर अपना क़ब्ज़ा बरक़रार रखने में भी संघर्ष कर सकता है. जैसे-जैसे समय बीतेगा, यूक्रेन की सेना संगठित होगी और प्रभावशाली विद्रोह करेगी.

रूस को इतने बड़े इलाक़े में सेना भेजने में परेशानी आ सकती है. पश्चिमी देश यूक्रेन को हथियार देते रहेंगे. और फिर शायद कई साल बाद, संभवतः रूस में नए नेतृत्व के आने पर, रूस की सेना यूक्रेन छोड़कर चली जाए, ठीक वैसे ही जैसा अफ़ग़ानिस्तान में हुआ था. 1979 से लेकर 1989 तक सोवियत संघ अफ़ग़ान विद्रोहियों के साथ लड़ाई में जुटा रहा फिर उन्हें थक हार कर अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा.

3. यूरोप तक फैल सकता है युद्ध

इस युद्ध के यूक्रेन से बाहर भी फैलने की आशंका है. राष्ट्रपति पुतिन सोवियत काल के और हिस्सों पर कब्ज़ा करने के लिए मोल्डोवा और जॉर्जिया जैसे पूर्व सोवियत देशों में सेना भेज सकते हैं. ये देश नेटो का हिस्सा नहीं हैं. या हो सकता है कि ये एक ग़लत अनुमान भी हो.

पुतिन पश्चिमी देशों के यूक्रेन को हथियार देने को उकसावे की कार्रवाई भी मान सकते हैं. वो नेटो के सदस्य बाल्टिक देशों में सेना भेजने की धमकी दे सकते हैं ताकि कैलिनिनग्राद के रूसी तटीय क्षेत्र के साथ एक ज़मीनी कॉरिडोर बना सकें.

ये बहुत भयानक हो सकता है और इसमें नेटो के साथ युद्ध का ख़तरा है क्योंकि नेटो के अनुच्छेद 5 के अनुसार एक नेटो सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है.

अगर पुतिन को ये लगा कि अपने नेतृत्व को बचाने का ये एकमात्र तरीक़ा है तो वो ऐसा कर सकते हैं. हम जानते है कि वो लंबे समय से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को तोड़ना चाहते हैं. यही बात परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर लागू होती है. हालांकि, विशेषज्ञ के मुताबिक परमाणु हमले की बहुत कम आशंका है.

लेकिन पुतिन को अगर लगा कि ये उनके नेतृत्व को बचाने का एकमात्र तरीक़ा है तो वो जोखिम उठा सकते हैं. अगर उन्हें किसी तरह यूक्रेन में हार जैसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा तो वहां से आगे भी बढ़ सकते हैं. अब ये सबको पता है कि पुतिन लंबे समय से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ना चाहते हैं. ठीक यही तर्क परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर भी लागू किया जा सकता है. इस हफ़्ते अपनी न्यूक्लियर फोर्स को हाई अलर्ट पर रखा है.

हालांकि अधिकांश विश्लेषकों को फिलहाल उनके इस्तेमाल किए जाने को लेकर संदेह है. लेकिन यह याद दिलाता है कि रूसी सिद्धांत युद्ध के मैदान में परमाणु हथियारों के सामरिक इस्तेमाल की अनुमति देता है.

4. क्या हो सकता है कूटनीतिक समाधान?

सभी परिस्थितियों के बावजूद क्या ये हो सकता है कि अब भी एक संभावित कूटनीतिक हल निकले?

संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि, "लड़ाई चल रही है, लेकिन बातचीत का रास्ता हमेशा खुला होता है."

बातचीत चल रही है. फ़्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने पुतिन से फ़ोन पर बात की है. राजनयिकों का कहना है कि बातें रूस तक पहुंचाई जा रही हैं. और आश्चर्यजनक रूप से, बेलारूस की सीमा पर रूस और यूक्रेन के अधिकारियों की मुलाक़ात हुई है. शायद आगे कुछ और न हुआ हो. लेकिन लगता है कि, बातचीत के लिए तैयार होकर पुतिन ने कम-से-कम युद्ध-विराम की संभावनाओं को स्वीकार किया है.

अहम सवाल ये है कि क्या पश्चिम के राजनयिक एक 'ऑफ़ रैंप' का प्रस्ताव देंगे, यानी एक ऐसा तरीका जिसमें सभी पक्ष जंग के रास्ते से हट जाएं. राजनयिकों का कहना है कि यह महत्वपूर्ण है कि पुतिन को पता है कि पश्चिम के प्रतिबंधों को हटाने के लिए क्या करना होगा तो अपना चेहरा बचाने के लिए एक डील की संभावना बन सकती है.

अब इस संभावना पर विचार करें कि अगर यह युद्ध रूस के लिए बहुत ख़राब परिणाम वाला रहा तो तब क्या होगा. जैसे-जैसे युद्ध के मैदान से शव रूस पहुंचेंगे, देश के भीतर विरोध बढ़ता जाएगा. पुतिन को लग सकता है कि उन्होंने आफ़त गले मोल ले ली है. वो आंक सकते हैं कि युद्ध समाप्त करने के फ़ैसले की तुलना में इसे जारी रखना उनके नेतृत्व के लिए बड़ा ख़तरा बन सकता है. उसी दौरान चीन हस्तक्षेप कर सकता है, वो पुतिन पर हमला बंद कर समझौते की बात करने के लिए दबाव डाल सकता है. साथ ही वो कह सकता है कि जब तक वो ऐसा नहीं करेगा तब तक चीन तेल और गैस रूस से नहीं ख़रीदेगा. तब पुतिन को एक नया रास्ता तलाशने की ज़रूरत होगी.

इस बीच यूक्रेनी अधिकारी उनके देश में चल रही तबाही को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ज़िंदगियों की इस ख़ौफ़नाक तबाही से राजनीतिक समझौता बेहतर है. तो एक राजनयिक पहल से ये हल हो जाएगा.

दूसरी ओर मान लें कि यूक्रेन, क्राइमिया और डोनबास के कुछ हिस्सों पर रूस की संप्रभुता को स्वीकार कर लेता है. तो इसके बदले में, पुतिन यूक्रेन की आज़ादी और यूरोप के साथ उसके संबंधों को स्वीकार कर सकते हैं. ऐसी संभावना नहीं लगती है. लेकिन ऐसा होना असंभव भी नहीं है, यह परिदृश्य ख़ूनी संघर्ष के मलबे से उभर भी सकता है.

5. तो क्या पुतिन सत्ता से बेदख़ल होंगे?

और फिर पुतिन का क्या होगा? जब उन्होंने हमले का एलान किया था तब उन्होंने घोषणा की थी कि, "हम किसी भी परिणाम के लिए तैयार हैं."

लेकिन उस नतीजे से रास्ता सत्ता से उनकी बेदख़ली की ओर गया तो क्या होगा? सोच से परे यह ज़रूर लग सकता है. फिर भी दुनिया में जिस तेज़ी से बदलाव देखे जा रहे हैं तो ऐसी चीज़ों के बारे में भी सोचा जा सकता है.

किंग्स कॉलेज लंदन में वॉर स्टडीज़ के एमिरेट प्रोफ़ेसर सर लॉरेंस फ़्रीडमैन ने इसी हफ़्ते लिखा था, "ऐसा लगता है कि कीएव के साथ साथ मॉस्को के भी सत्ता में परिवर्तन होगा."

तो वे ऐसा कैसे कह सकते हैं? शायद, पुतिन ने एक विनाशकारी युद्ध का रास्ता अख़्तियार किया है. हज़ारों रूसी सैनिक मरते हैं. आर्थिक प्रतिबंध की मार झेलनी पड़ती है. पुतिन के समर्थकों की संख्या में बेतरतीब गिरावट आती है. संभव है कि विद्रोह का ख़तरा भी हो. वे विरोध को दबाने के लिए रूस की आंतरिक सुरक्षा का इस्तेमाल भी करें. लेकिन इससे चीज़ें ठीक होने की जगह और बिगड़ जाएं और पर्याप्त संख्या में रूसी सेना, राजनीति और आर्थिक जगत के शीर्ष लोग उनके ख़िलाफ़ हो गए.

पश्चिम ने पहले ही यह साफ़ कर दिया है कि पुतिन की जगह अगर कोई उदारवादी नेता सत्ता में आते हैं तो वो रूस पर से प्रतिबंधों को हटाएगा और सामान्य राजनयिक संबंधों को बहाल करेगा. तो तख़्तापलट भी हो सकता है. हालांकि अभी ये संभव नहीं है. लेकिन अगर उनके साथ के लोगों को ये लगने लगेगा कि पुतिन अब उनके हितों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं तो ऐसी संभावना अकल्पनीय भी नहीं है.

निष्कर्ष

उपरोक्त परिदृष्य अलग-अलग नहीं हैं- इनमें से कुछ को अगर जोड़ें तो कुछ अलग नतीजे आ सकते हैं. लेकिन जब ये लड़ाई चल रही है, तो दुनिया भी बदल गई है और चीज़ें पहले की स्थिति जैसी नहीं होंगी. रूस के संबंध बाकी देशों के साथ अलग होंगे. सुरक्षा को लेकर यूरोपीय नज़रिया बदल जाएगा. और हो सकता है कि उदारवादी अंतरराष्ट्रीय शासन पर आधारित देशों ने अब तक यह भी तय कर लिया हो कि उनके लिए बेहतर क्या है?

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