यूक्रेन: रूस को क्या उम्मीद के मुताबिक मिल रही है कामयाबी?

    • Author, जोनाथन बील
    • पदनाम, रक्षा संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

इतिहास गवाह है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है लेकिन समाप्त करना बहुत मुश्किल.

अमेरिका के 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण और 2003 में इराक़ पर आक्रमण को लेकर ये निश्चित तौर पर सच है. हो सकता है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के यूक्रेन पर हमले को लेकर भी ये सच हो जाए.

एक पुरानी कहावत है कि जब दुश्मन से सामना होता है तो सेना की योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं. यूक्रेन में रूस की सेनाओं पर ये कहावत सही साबित होती दिख रही है.

रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट में यूरोपीय सुरक्षा के विशेषज्ञ एड अर्नाल्ड रूस के हमले पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, "इसके नतीजे रूस के लिए निराशाजनक हैं और ये उम्मीद के मुताबिक बहुत धीमा है."

वो इसके कई कारण बताते हैं. उनके मुताबिक सेना जब आक्रमण करती है तो वो शुरूआत में अपनी पूरी शक्ति लगा देती है. लेकिन यूक्रेन में रूस ने अभी ऐसा नहीं किया है. यूक्रेन की घेराबंदी में रूस के 150000 से 190000 तक सैनिक थे लेकिन इन सभी को अभी यूक्रेन के भीतर नहीं भेजा गया है.

ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि आक्रमण के अगले चरण में रूस को उनकी ज़रूरत पड़े. सेनाओं के लिए अपनी योजनाओं में परिवर्तन के लिए रिज़र्व सैनिक रखना सामान्य बात है.

रणनीति बदल सकता है रूस?

पश्चिमी देशों के आंकलन के मुताबिक रूस ने शुरुआती हमले में यूक्रेन की घेराबंदी करने वाली आधी सेना का इस्तेमाल किया है.

रूस ने कई दिशाओं से हमला किया है और इससे आक्रमण और भी जटिल हो गया है.

रूस ने अभी तक अपने तोपखाने और हवाई हमलों का इस्तेमाल भी उस तीव्रता से नहीं किया है जिसकी आशंका ज़ाहिर की गई थी.

अर्नाल्ड कहते हैं, "यहां सबसे महत्वपूर्ण ये है कि उन्हें यूक्रेन से ज़बरदस्त मुक़ाबला मिल रहा है, उन्होंने इसकी उम्मीद नहीं की होगी."

हालांकि अर्नाल्ड का मानना है कि रूस के सैन्य कमांडर जल्द ही अपनी रणनीति में बदलाव कर सकते हैं.

ब्रिटेन के पूर्व सैन्य कमांडर जनरल रिचर्ड बैरन्स कहते हैं कि अभी भी ये प्रतीत हो रहा है कि रूस अपने सैन्य लक्ष्यों को जल्द ही सुरक्षित कर लेगा.

जनरल बैरन्स कहते हैं कि ये स्पष्ट हो गया है कि रूस की सेना का शुरुआती लक्ष्य यूक्रेन की सेना को तोड़ना है. केंद्रीय सरकार को हटाकर यूक्रेन को रूस में मिलाना है.

इन लक्ष्यों में से कुछ की तरफ़ रूस ने प्रगति हासिल कर ली है. रूस की सेना दक्षिण की तरफ़ से यूक्रेन के भीतर घुस गई है.

रूस की सेनाओं ने अब क्राइमिया के रास्ते यूक्रेन के भीतर ज़मीनी रास्ता बना लिया है. याद रहे कि रूस ने साल 2014 में क्राइमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

मोर्चे पर डटे यूक्रेन के सैनिक

एड अर्नाल्ड मानते हैं कि ये कोई बड़ा लक्ष्य नहीं है. हालांकि यहां से रूस की सेना पूर्व में रक्षात्मक कार्रवाइयों में लगी यूक्रेन की सेना की घेराबंदी कर सकती हैं.

यूक्रेन के सबसे प्रशिक्षित और आक्रामक बल यहां रक्षात्मक पंक्ति बनाए हुए हैं. यहां ये सैन्य बल पिछले आठ सालों से रूस समर्थक अलगाववादियों का मुक़ाबला कर रहे हैं.

अभी तक इन बलों ने बहादुरी दिखाई है और वो रूस के आक्रमण को रोकने में कामयाब रहे हैं. रूस की सेना अलगावादियों के नियंत्रण वाले इलाक़े डोनेत्स्क और लोहांस्क से आगे नहीं बढ़ सकी है.

लेकिन यदि क्राइमिया की तरफ़ से आने वाली रूस की सेना ने भी उनकी घेराबंदी कर ली तो उनके लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाएंगे.

एक तथ्य ये भी है कि यूक्रेन की सेना के अधिकांश बल अपने मोर्चों पर डटे हैं और लड़ाई में शामिल हैं और उनके लिए अपनी स्थिति में बदलाव करना मुश्किल हो जाएगे.

क्या है रूस का इरादा?

रूस की सेनाओं ने कीएव की तरफ़ बढ़ने में भी प्रगति हासिल की है. राजधानी पर क़ब्ज़ा करना रूस की सेना का एक अहम लक्ष्य है. सिर्फ इसलिए ही नहीं कि ये सरकार का मुख्यालय है और यहां से ही रूस के ख़िलाफ़ प्रतिरोध का नेतृत्व किया जा रहा है.

राष्ट्रपति पुतिन चाहते हैं कि वो लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति वोलोदोमीर ज़ेलेंस्की को पद से हटा दें और अपने इशारों पर चलने वाली सत्ता यूक्रेन में स्थापित कर दें.

अर्नाल्ड कहते हैं कि रूस को यूक्रेन में अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए राजधानी कीएव पर नियंत्रण करना ज़रूरी है. इसके बिना यूक्रेन में रूस के लक्ष्य हासिल नहीं होंगे.

अब सवाल ये है कि रूस के लिए ऐसा करना कितना आसान होगा? रूस की सेनाओं कीएव की घेराबंदी करने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन जितना भीतर वो जाएंगी, उतना कड़ा मुक़ाबला उन्हें करना होगा. यूक्रेन के लोगों ने रूस का मुक़ाबला करने के लिए कमर कस ली है.

आशंका है कि यूक्रेन की सड़कों पर लड़ाई छिड़ सकती है. ऐसा हो भी रहा है.

जब-जब शहरी क्षेत्र में युद्ध होता है, रक्षात्मक पक्ष को फ़ायदा मिलता है. हमलावर सेनाओं के लिए शहर की सड़कों पर आवागमन आसान नहीं होगा. शहर की इमारतें यूक्रेनी सेना की रक्षा चौकियां बन जाएंगी.

पुतिन के लिए आगे की राह कितनी आसान?

आम नागरिक भी रूस की सेना के विरोध का हिस्सा बन सकते हैं और रूस की सेना आम नागरिकों को भी संभावित निशाना समझ सकती है.

शहरी क्षेत्र में लड़ाई किसी भी आक्रामक सेना के लिए सबसे मुश्किल होती है. जैसे-जैसे वो आगे बढ़ती है उसका नुकसान और ज़रूरतें बढ़ती जाती हैं.

डनाइपर नदी पूर्वी और पश्चिमी यूक्रेन के बीच एक प्राकृतिक बाधा है. एड अर्नाल्ड मानते हैं कि ये रूस की सेना की बढ़त की सीमा भी निर्धारित कर सकती है.

अर्नाल्ड मानते हैं कि यदि रूस ने कीएव और देश के बाकी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया तो पश्चिम की तरफ़ बढ़ने का रूसी सेना को बहुत अधिक फ़ायदा नहीं होगा.

राष्ट्रपति पुतिन ये उम्मीद कर रहे होंगे कि कीएव पर क़ब्ज़े और यूक्रेनी सेना के पतन के साथ ही यूक्रेन में उनका विरोध भी दब जाएगा.

आक्रमण के लिए एक लाख 90 हज़ार सैनिक पर्याप्त हो सकते हैं लेकिन यूरोप के दूसरे सबसे बड़े देश पर क़ब्ज़ा बरक़रार रखने के लिए नाकाफ़ी साबित हो सकते हैं. यूक्रेन इलाक़े के मामले में फ्रांस से भी बड़ा है.

इराक़ में ब्रितानी बलों का नेतृत्व करने वाले जनरल बैरन्स कहते हैं कि यदि पुतिन एक लाख 50 हज़ार सैनिकों के दम पर यूक्रेन पर नियंत्रण करना चाहते हैं तो ये तभी संभव है जब उन्हें स्थानीय आबादी का भी समर्थन मिले.

वो कहते हैं कि देश के पूर्व में कुछ आबादी रूस की समर्थक है लेकिन रूस की स्थापित कोई भी सरकार चार करोड़ की आबादी पर शासन आसानी से नहीं कर पाएगी.

जनरल बैरन्स मानते हैं कि रूस की सेना के पास यूक्रेन को हरा देने की ताक़त है. हो सकता है कि यूक्रेन में ज़बरदस्त प्रतिरोध हो. लेकिन यदि राष्ट्रपति पुतिन ये सोच रहे हैं कि वो यूक्रेन पर शासन कर पाएंगे तो ये उनकी भूल हो सकती है.

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