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आर्कटिक क्षेत्र पर किसका नियंत्रण है, यहां से तेल और गैस के दोहन पर इतना विवाद क्यों है
- Author, टीम बीबीसी मुंडो
- पदनाम, .
दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की बड़े स्तर तलाश चल रही है.
हाल के महीनों में ये तलाश और तेज हुई है क्योंकि कई देश ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं.
इस तलाश में आर्कटिक क्षेत्र ऐसा इलाक़ा है जिस पर कई देशों की नज़रें टिकी हुई हैं. इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस का भंडार है.
लेकिन, ऊर्जा के इस स्रोत तक पहुंचना विवादों से घिरा है.
पर्यावरण को होने वाला नुकसान और क्षेत्रीय विवाद इसका मुख्य कारण हैं.
आर्कटिक में तेल और गैस के लिए ऊर्जा कंपनियों के ड्रिल करने को लेकर कोर्ट में केस भी चल रहा है.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के एक समूह ने यूरोपियन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स (ईसीएचआर) में नॉर्वे की सरकार पर मुक़दमा किया है क्योंकि नॉर्वे ने आर्कटिक में प्राकृतिक संसाधनों की निकासी की इजाजत दे दी है.
अब एक तरह से इस मामले पर निर्भर करता है कि भविष्य में इस इलाक़े से कितना प्राकृतिक संसाधन निकाला जा सकता है.
आर्कटिक पर किसका नियंत्रण और कितना संसाधन
यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के अनुमान के मुताबिक पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर स्थित आर्कटिक में 160 अरब बैरल तेल और 30 प्रतिशत प्राकृतिक गैस का अनदेखा स्रोत हो सकता है.
आर्कटिक में ज़मीन और पानी में हिस्सा रखने वाले देशों में नॉर्वे, रूस, स्वीडन, फिनलैंड, आईसलैंड, अमेरिका, कनाडा और डेनमार्क शामिल हैं.
जैसे कि आर्कटिक का अधिकतर हिस्सा पानी में है तो ऐसी कोई अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं है जो इसके आर्थिक विकास की सुरक्षा करती हो. जिस तरह दक्षिणी ध्रुव में अंटार्कटिका में है.
जलवायु परिवर्तन के कारण इस इलाक़े में बर्फ़ पिघलने लगी है. इससे यहां ड्रिल करना, जांच करना और संसाधन निकालना आसान हो गया है.
क्या है नॉर्वे का मामला
पश्चिमी यूरोप में नॉर्वे तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है. 2016 से ये देश आर्कटिक सर्कल में बेरिंट सागर में तेल और गैस का पता लगाने के लिए कई लाइसेंस दे चुका है.
नॉर्वे के छह युवाओं और दो पर्यावरण समूहों ग्रीनपीस नॉर्डिक और यंग फ्रेंड्स ऑफ़ द अर्थ ने साल 2021 में ईसीएचआर में नॉर्वे की सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ मुकदमा किया है.
पर्यवारण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ''जलवायु परिवर्तन के बीच एक और खुदाई की अनुमति देकर नॉर्वे बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहा है.''
उनका दावा है कि आर्कटिक में खुदाई करने से यहां बर्फ की चोटियां प्रदूषित हो जाएंगी और तेज़ी से पिघलने लगेंगी.
पर्यावरण कार्यकर्ता ईसीएचआर के अनुच्छेद 2 का हवाला देते हैं जो जीवन के अधिकार की सुरक्षा करता है. वहीं, अनुच्छेद 8 पारिवारिक जीवन और आवास के अधिकार की सुरक्षा करता है.
पर्यावरण कार्यकर्ता मिया चैंबरनलिन कहती हैं, ''इसकी शिकायत करके कम से कम इस बात की संभावना है कि बड़े स्तर पर तेल की निकासी को रोका जा सकता है.''
नॉर्वे पर मुक़दमा
उत्तरी नॉर्वे में स्वदेशी सामी लोग के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट लासे एरिकसन बीअर्न ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि इस ड्रिलिंग से वहां मौजूद मछलियों की आबादी और उनके रहने के तरीके को नुकसान पहुंच सकता है.
नॉर्वे की तीन कोर्ट इस मामले को खारिज कर चुकी हैं लेकिन ईसीएचआर इसे गंभीरता से ले रही है.
नॉर्वे को अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया था.
नॉर्वे ने 26 अप्रैल को अपना जवाब दिया था. उसका कहना था कि वो पहले जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में पहले ही अंतरराष्ट्रीय कोशिशों में सहयोग कर रहा है और 2050 तक उसने शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय है.
नॉर्वे का कहना है कि बिना भरोसेमंद वैकल्पिक स्रोत मिले देश के लिए तेल और गैस के उत्पादन को रोकना खतरनाक हो सकता है.
ईसीएचआर इस मामले को 'इम्पैक्ट केस' बनाने पर विचार कर रहा है जिसका मतलब है कि ये यूरोपीय संघ में अन्य मामलों के लिए नजीर बन सकता है.
हाल के सालों में पर्यावरण कार्यकर्ता सरकारों और कारोबारियों पर पर्यवारण हितैषी तरीक़े अपनाने का दबाव बनाने के लिए कोर्ट जा रहे हैं.
साल 2021 में डच कोर्ट ने रॉयल डच शैल से कहा था कि 2019 के मुकाबले 2030 तक कार्बन उत्सर्जन 45 प्रतिशत कम होना चाहिए. ये मामला फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ कोर्ट लेकर गया था.
तीन साल पहले कोलंबिया के सर्वोच्च न्यायलय ने सरकार को अमेज़न के जंगलों में पेड़ों की कटाई रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई करने का आदेश दिया था.
कोर्ट का कहना था कि इससे बच्चों के स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार प्रभावित होते हैं.
आर्कटिक में कौन खुदाई करता है
रूस की तेल कंपनियां एक दशक से भी ज़्यादा समय से आर्कटिक में खुदाई कर रही हैं.
दो साल पहले रूस के आर्कटिक क्षेत्र में एक बड़ा तेल रिसाव हुआ था.
अमेरिका उत्तरी अलास्का में तेल निकालने के लिए अपनी तेल कंपनियों को अनुमति देने पर विचार कर रहा है.
आकर्टिक में देशों के अधिकार
जिन देशों का आर्कटिक में अधिकार क्षेत्र है उन्हें अपने समुद्री किनारों के पास समुद्र के तल पर अधिकार है.
वो इस इलाक़े में तट से 370 किमी. तक विशेष आर्थिक गलियारे बना सकते हैं. इन इलाक़ों में उन्हें मछलियां पकड़ने, बुनियादी ढांचा बनाने और प्राकृतिक संसाधन निकालने का अधिकार है.
अगर इन देशों को लगता है कि पानी के अंदर उनकी ज़मीन और आगे जा रही है तो वो अपना इलाक़ा बढ़ा सकते हैं.
फिलहाल यहां 1721 किमी. तक समुद्र के अंदर फैले लमानोसो पहाड़ को लेकर कनाडा, रूस और ग्रीनलैंड के बीच विवाद चल रहा है.
ये तीनों देश इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जताते हैं. जो भी इस पर अधिकार पाने में सफल होता है वो उत्तरी धुव्र के पास समुद्र में 55000 वर्गमील का इलाक़े पर दावा कर सकता है.
साल 2007 में रूस ने उत्तरी धुव्रीय समुद्र के तल पर अपना झंडा लगाकर आकर्टिक में अपने पड़ोसी देशों की चिंताएं बढ़ा दी थीं.
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