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रोबोट पनडुब्बियां बर्फ़ीले समंदर में क्यों भेज रहा रूस?
- Author, डेविड हैम्बलिंग
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
आर्कटिक महासागर दुनिया के पांच महासागरों में सबसे छोटा है. इसका पानी बेहद सर्द है. आर्कटिक महासागर के एक बड़े हिस्से में पूरे साल बर्फ़ जमी रहती है. कई किलोमीटर गहरी और मोटी बर्फ़ की परत की वजह से आर्कटिक को दुनिया का सबसे ख़तरनाक महासागर कहा जाता है.
मगर, बर्फ़ और बर्फ़ीले पानी के तले इस महासागर की गहराई में बहुत बड़ा क़ुदरती ख़ज़ाना छिपा हुआ है. इंसान अब तक वहां नहीं पहुंचा है.
कहा जाता है कि आर्कटिक महासागर की गहराई में अरबों बैरल कच्चे तेल के भंडार हैं. यहां पर भारी तादाद में नेचुरल गैस भी है. एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ यहां दुनिया का 16 से 26 फ़ीसद तेल और गैस का भंडार है.
ज़ाहिर है, इतनी बड़ी तादाद में तेल और गैस जहां भी मिलेंगे, वहां पर पहले पहुंचने और इस ख़ज़ाने को अपना बनाने की रेस तो लगेगी ही.
रूस का प्रोजेक्ट आइसबर्ग
तो, जनाब ये रेस बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है. और, इस रेस का सबसे बड़ा खिलाड़ी है रूस.
रूस की सीमा का बड़ा हिस्सा आर्कटिक महासागर से लगा हुआ है. ज़ार के साम्राज्य के दौर से ही आर्कटिक महासागर के आस-पास के इलाक़ों पर रूस का क़ब्ज़ा रहा है. अब जबकि आर्कटिक में तेल और गैस के बड़े भंडारों की बात सामने आई है, तो रूस ने आर्कटिक महासागर पर अपना हक़ ताक़तवर तरीक़े से जताना शुरू किया है.
आर्कटिक महासागर से तेल और गैस निकालने का काम रूस काफ़ी दिनों से कर रहा है. हर साल आर्कटिक से 55 लाख टन तेल रूस निकाल रहा है. अब रूस नई-नई तकनीकों की मदद से इस काम को और तेज़ करने में जुटा हुआ है. वैसे तो आर्कटिक पर रूस के अलावा कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे और अमरीका भी हक़ जताते रहे हैं.
लेकिन, रूस इलाक़े का सबसे ताक़तवर मुल्क़ है. इसीलिए वो आर्कटिक पर सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी भी चाहता है. 2007 में रूस ने उत्तरी ध्रुव से क़रीब 14 हज़ार फुट की गहराई में दो पनडुब्बियां भेजकर वहां टाइटैनियम से बना अपना एक झंडा लगाया था, ताकि इस इलाक़े पर हक़ जता सके.
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निर्देश पर रूस ने शुरू किया है प्रोजेक्ट आइसबर्ग. इसके तहत हाई लेवल तकनीक से तैयार मशीनें आर्कटिक महासागर की गहराई में भेजी जाएंगी. जो ख़ुद से चलेंगी. तेल और गैस निकालेंगी.
असल में रूस दुनिया को जो सामान निर्यात करता है, उसका 68 फ़ीसद हिस्सा तेल और गैस है. अर्थव्यवस्था को मज़बूत रखने के लिए रूस तेल और गैस पर निर्भर है. इसीलिए वो आर्कटिक में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है.
रूस के सैन्य अड्डे
आर्कटिक महासागर में पिछले कुछ सालों में रूस ने कई सैनिक अड्डे बसाए हैं. हाल ही में रूस की सेना ने फिनलैंड के क़रीब नया सैनिक अड्डा खोला.
अब वो नई-नई तकनीक की मदद से आर्कटिक की गहराइयों में जाकर तेल और गैस निकालने में जुट गया है. हालांकि ये काम इतना आसान नहीं. आर्कटिक महासागर की गहराई कई जगह पर पांच किलोमीटर से भी ज़्यादा है. महासागर के एक बड़े हिस्से पर पूरे साल बर्फ़ जमी रहती है. ये दुनिया का वो इलाक़ा है, जहां इंसानों का लंबे वक़्त तक रहना मुश्किल है. जहां सांसें ही नहीं, दिल की धड़कनें भी जम जाती हैं.
रूस की संस्था फाउंडेशन ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ आर्कटिक महासागर से तेल निकालने के लिए नई तकनीक विकसित कर रही है.
इसमें सबसे अहम हैं, रोबोटिक पनडुब्बियां. यानी वो पनडुब्बियां जो ख़ुद से चलती हैं. जिन्हें रिमोट से कंट्रोल किया जा सकता है. हालांकि, कुछ लोगों को ये लगता है कि प्रोजेक्ट आइसबर्ग की आड़ में रूस नई सैन्य तकनीक को आर्कटिक में तैनात कर रहा है.
क्या है प्रोजेक्ट
प्रोजेक्ट आइसबर्ग की सबसे अहम कड़ी का नाम है, बेलगोरोड. ये 182 मीटर लंबी एक एटमी पनडुब्बी है, जो कि अभी बनाई जा रही है. तैयार होने पर ये पनडुब्बी दुनिया की सबसे बड़ी न्यूक्लियर सबमरीन होगी. ये पनडुब्बी पानी के अंदर तेल और गैस के भंडार की तलाश कर सकेगी. यही नहीं ये पानी के भीतर संचार के लिए तार बिछा सकेगी. इसके अलावा, ये छोटी पनडुब्बियों के लिए पावर हाउस का भी काम करेगी.
प्रोजेक्ट आइसबर्ग से जुड़े वादिम कोज़यूलिन कहते हैं कि इस पनडुब्बी के लिए ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है, जो इससे पहले देखी-सुनी नहीं गई.
प्रोजेक्ट आइसबर्ग के तहत पानी के अंदर एटमी प्लांट लगाने की भी तैयारी है. इनका मक़सद, आर्कटिक महासागर में काम करने वाली पनडुब्बियों को रिचार्ज करना यानी ईंधन मुहैया कराना होगा. यहां पर आकर आटोमैटिक पनडुब्बियां अपने आप को रिचार्ज कर सकेंगी. फिलहाल 24 मेगावाट का एक पावर हाउस समंदर के भीतर बनाने की तैयारी है. ये पावर हाउस क़रीब 25 साल काम करेंगे. रूस ऐसे कई पावर हाउस आर्कटिक महासागर की गहराई में लगाना चाहता है. ये पावर हाउस अपने आप काम करेंगे. साल में एक बार इंजीनियर और मेकैनिक जाकर मरम्मत और रख-रखाव का काम करेंगे.
एटमी पनडुब्बियां हुईं हादसे का शिकार
रूस के इस मेगाप्लान को लेकर आशंकाएं भी जताई जा रही हैं. इसकी वजह हैं रूस में हुए हादसे. 1961 से लेकर अब तक रूस कई एटमी पनडुब्बियां हादसों में गंवा चुका है. डिज़ाइन में गड़बड़ी की वजह से सोवियत संघ के ज़माने से अब तक क़रीब 14 पनडुब्बियां हादसों की वजह से तबाह हो चुकी हैं. इन पर हॉलीवुड में एक फ़िल्म भी बनी थी जिसका नाम था द विडोमेकर.
हालांकि, रूस की कंपनी निकिएट का कहना है कि जब इन पनडुब्बियों को मशीनें ही चलाएंगी तो हादसे में किसी के मारे जाने का डर ही नहीं है. क्योंकि ग़लतियां करने के लिए वहां इंसान होंगे ही नहीं. ब्रिटेन के एक्सपर्ट विलियम नटाल इस बात से सहमति जताते हैं.
वहीं, ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एटमी विशेषज्ञ यूजीन श्वागेरस कहते हैं कि आज दुनिया भर में एटमी प्लांट ज़्यादातर मशीनों की मदद से ही चलते हैं. इनमें इंसानी दखल बहुत कम होता है. इंसान अब ऐसे एटमी प्लांट में सिर्फ़ निगरानी का काम करते हैं. ऐसे में रूस अगर समुद्र के अंदर ख़ुद से चलने वाले एटमी प्लांट लगाने की तैयारी में है, तो ये काम बहुत मुश्किल नहीं है.
उम्मीद की जा रही है कि पानी के भीतर काम करने वाला पहला एटमी रिएक्टर 2020 तक काम करना शुरू कर देगा. ख़ुद से चलने वाली पनडुब्बियां भी तब तक काम करने लगेंगी.
प्रोजेक्ट आइसबर्ग के तहत रूस छोटे-छोटे रोबोट भी बना रहा है, जो पानी के भीतर जाकर पनडुब्बियों की मरम्मत कर सकेंगे. दो टन भारी और छह मीटर लंबे ये टॉरपीडो जैसे रोबोट इन दिनों काला सागर में टेस्ट किए जा रहे हैं. 2009 में ऐसे टॉरपीडो की मदद से महासागर में गिरे रूसी विमान का मलबा निकाला गया था. ये विमान जापान और रूस की सीमा के पास हादसे का शिकार हुआ था.
हालांकि, इन टॉरपीडो की मदद से समुद्र के भीतर ड्रिलिंग का काम अब तक नहीं किया गया है. लेकिन रूसी कंपनी रुबिन सेंट्रल डिज़ाइन ब्यूरो के इगोर विलनिट का कहना है कि वो बहुत जल्द ऐसी टॉरपीडो तैयार कर लेंगे जो समुद्र की गहराई में खुदाई कर सकेंगे.
बर्फ़ पिघलने से रूस को लाभ
जहां ग्लोबल वार्मिंग दुनिया के लिए बड़ी मुश्किल का सबब है. वहीं ये रूस के लिए अच्छी ख़बर है. धरती के बढ़ते तापमान की वजह से आर्कटिक की बर्फ़ पिघल रही है. इससे आर्कटिक महासागर से तेल निकालने का रूस का मिशन आसान हो जाएगा.
हालांकि, रूस का दावा है कि आर्कटिक महासागर में उसके मिशन अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाएंगे. मगर रूस की हरकतें इसके उलट इशारा करती हैं. रूस ने पिछले कुछ सालों में सोवियत संघ के दौर के क़रीब 50 सैनिक अड्डों को फिर से चालू कर दिया है. रूस की सेना में नई आर्कटिक ब्रिगेड की भर्ती की जा रही है. ध्रुवीय इलाक़ों में काम आने वाली फौजी गाड़ियों की रूस ने हाल ही में नुमाइश की थी. इसके लिए दुनिया भर से पत्रकारों को बुलाया गया था.
प्रोजेक्ट आइसबर्ग की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि रूस के पास दूसरे देशों की तकनीक हासिल करने का ज़रिया नहीं है. पश्चिमी देशों ने उस पर पाबंदी लगाई हुई है. अब वो ख़ुद ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है जिससे पानी में, समुद्र की गहराई में खुदाई करके तेल निकाला जा सके. इस तकनीक का हमेशा जमे रहने वाले लैप्टेव सागर में परीक्षण किया जा रहा है.
जानकार मानते हैं कि आर्कटिक से तेल निकालने का रूस का प्रोजेक्ट आइसबर्ग महज़ एक पर्दा है. असल में राज़ की बात ये है कि रूस आर्कटिक महासागर में अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाना चाह रहा है. और इसे तेल की तलाश के पर्दे से ढंके रहना चाहता है.
अब चाहे तेल निकालने का मिशन हो, या आर्कटिक पर क़ब्ज़ा करने की नीयत. प्रोजेक्ट आइसबर्ग की वजह से रूस के दोनों हाथों में लड्डू हैं.
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