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कैसा होगा आर्कटिक की जमा देने वाली ठंड में साल भर गुज़ारना
- Author, मार्था हेनरिक्स
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हमारी धरती के ध्रुवीय इलाक़े बेहद सर्द हैं. धरती का तापमान संतुलित रखने और मौसमों में बदलाव में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों का भी बड़ा योगदान है.
लेकिन, जलवायु परिवर्तन की वजह से ध्रुवों पर जमी बर्फ़ पिघल रही है. वैज्ञानिक कहते हैं कि उत्तरी ध्रुव पर जमी बर्फ़ की परत हर साल सिकुड़ती जा रही है.
साल 2016 में उत्तरी ध्रुव के इर्द-गिर्द यानी आर्कटिक में जमी बर्फ़ का दायरा केवल 41.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर रह गया था. जो 1970 के दशक के बाद से सबसे कम है.
आर्कटिक की बर्फ़ की चादर की अहमियत इससे समझी जा सकती है कि, जब इस विशाल सफ़ेद चादर पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वो रिफ्लेक्ट होकर, यानी इस बर्फ़ से टकराकर वापस आसमान की तरफ़ लौट जाती हैं.
इससे धरती का तापमान नहीं बढ़ता. ध्रुवों पर जमी बर्फ़ के पिघलने की रफ़्तार धीमी रहती है.
लेकिन, जबसे आर्कटिक की बर्फ़ीली चादर सिकुड़ रही है, तब से इसके आस-पास के गहरे समंदर सूरज की गर्मी ज़्यादा सोखते हैं.
रहस्य खोजने के अभियान पर
इससे समुद्र के पानी का तापमान बढ़ता है और, ऐसा होता है, तो आर्कटिक की बर्फ़ पिघलने की रफ़्तार और तेज़ हो जाती है.
तमाम तकनीकी तरक़्क़ी और एक से एक सैटेलाइट बन जाने के बावजूद अभी भी हमें उत्तरी ध्रुवों के अंदरूनी हिस्सों के बारे में बहुत कम जानकारी है.
हमारी धरती के वातावरण को संतुलित बनाए रखने में इसका कितना बड़ा योगदान है, ये अभी तक इंसान पूरी तरह से समझ नहीं पाया है.
इसकी बड़ी वजह है कि आर्कटिक भयंकर ठंडा है. ध्रुवों तक जाना तो ठीक, लेकिन, वहां पूरे साल रुक कर रिसर्च करना चांद पर पहुंचने से भी ज़्यादा महंगा और मुश्किल काम है.
अब कई देशों के वैज्ञानिकों ने आर्कटिक और उत्तरी ध्रुव में छिपे राज़ खंगालने के लिए नया मिशन शुरू किया है.
इसके लिए जर्मनी का बना जहाज़ पोलरस्टर्न और इसका साथी आइसब्रेकर जहाज़ यानी रास्ते से बर्फ़ हटाने वाला जहाज़ अकादेमिक फ़ेदेरोव, उत्तरी ध्रुव के भयंकर सर्द माहौल में रहने के लिए निकले हैं.
ये जहाज़ नॉर्वे से रवाना किए गए हैं. इस मिशन के अगुवा हैं मार्कस रेक्स जो जर्मनी के अल्फ्रेड वेगनर इंस्टीट्यूट से जुड़े हुए हैं.
ख़तरनाक़ मिशन
पोलरस्टर्न की रवानगी के दौरान मार्कस कहते हैं कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि कैसा महसूस हो रहा है. पोलरस्टर्न को बड़े गाजे-बाजे के साथ रवाना किया गया है.
ये बर्फ़ीले माहौल में बसर करने वाला अब तक का सबसे ताक़तवर जहाज़ बताया जाता है.
जानकार कहते हैं कि अगर ये हिमखंड से भी टकरा गया, तो इसे हल्का सा झटका भर ही लगेगा. इससे ज़्यादा कुछ नहीं होगा.
पोलरस्टर्न का जर्मन भाषा में मतलब होता है ध्रुव तारा. ये जहाज़ आर्कटिक के बर्फ़ीले समंदर में एक साल गुज़ारने के लिए जा रहा है.
इस दौरान इस पर सवार वैज्ञानिक तरह-तरह के प्रयोग करेंगे. भयंकर सर्दी में ये जहाज़ भी जम जाएगा.
फिर आर्कटिक की बर्फ़ीली हवाएं इसे जिधर ले जाएंगे उधर ये जाएगा. इस दौरान कई वैज्ञानिक तजुर्बे किए जाएंगे.
पोलरस्टर्न पर ऐसे वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने तमाम यंत्र बनाने और वैज्ञानिक प्रयोग में अपनी ज़िंदगी लगा दी है.
जिस मिशन पर वो रवाना हुए हैं, वो बेहद ख़तरनाक है. वैज्ञानिकों को ज़ीरो से कई डिग्री सेल्सियस नीचे रहने वाले तापमान में रहकर प्रयोग करने होंगे.
ज़मीन से एक हज़ार किमी दूर
पोलरस्टर्न जिस मिशन पर रवाना हुआ है, उसका नाम है मल्टिडिसिपलिनरी ड्रिफ्टिंग ऑब्ज़रवेटरी ऑफ़ द स्टडी ऑफ़ आर्कटिक क्लाइमेट.
इसका संक्षिप्त नाम है, मोज़ैक. जिसका ख़र्च आएगा क़रीब 15.3 करोड़ डॉलर.
और अगर हम जहाज़ पर लदे संयंत्रों की क़ीमत भी इस में जोड़ दें, तो ये अरबों डॉलर का मिशन है. क्योंकि, वैज्ञानिकों ने इन में से कई मशीनें बनाने में पूरी ज़िंदगी ग़ुज़ार दी.
पोलरस्टर्न का मिशन पिछले एक दशक से तैयार किया जा रहा है. इसके तमाम तलों पर वैज्ञानिकों के रहने-खाने और मशीनों के रखने की व्यवस्था है.
इन मशीनों ने आर्कटिक पर पड़ने वाली सूरज की रोशनी से लेकर यहां पिघल रही बर्फ़ का पता लगाया जाएगा.
प्रयोगों में ये भी शामिल है कि आख़िर आर्कटिक में आ रहे बदलाव का, दुनिया के दूसरे इलाक़ों में कैसा असर होगा.
इस मिशन में 19 देशों के 600 से ज़्यादा वैज्ञानिक शामिल हैं. इनमें से कई तो पूरे साल भर आर्कटिक में ऐसी जगह पर रहेंगे जो किसी क़रीबी ज़मीन से क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर होगा. समय-समय पर इन्हें विमान से रसद पहुंचाई जाती रहेगी.
सख़्त नियम क़ायदे
पूरे मिशन का सबसे अहम पड़ाव तब होगा, जब जहाज़ को ऐसी जगह पर एंकर किया जाएगा, जहां वो मज़बूती से रुका रहे.
अगर जहाज़ को बर्फ़ के किसी हल्के टुकड़े से बांधा गया, तो उसके छिटक कर बहुत दूर जाने की आशंका होगी.
ऐसे में एक से एक महंगे उपकरण पानी में हमेशा के लिए बह जाने का डर होगा.
जहाज़ पर खाने-पीने के टाइम टेबल का सख़्ती से पालन होता है. यहां कुछ दुकानें भी हैं, जिनसे वैज्ञानिक अपनी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी ज़रूरतों के सामान ख़रीद सकते हैं. ये दुकानें भी 15 मिनट के लिए ही खुलती हैं.
मज़े की बात ये है कि सफ़र के चौथे दिन से जहाज़ का समय 20-20 मिनट कर के क़रीब एक घंटे तक आगे बढ़ाया जाएगा.
ये काम रात के वक़्त किया जाएगा, ताकि बदलते टाइम जो़न से तालमेल बना रहे.
बीबीसी की संवाददाता मार्था हेनरिक़्स ने इस मिशन पर वैज्ञानिकों के साथ एक हफ़्ते का वक़्त गुज़ारा. उन्हें दिलचस्प तजुर्बे हुए. वैज्ञानिकों को अपनी मशीन से लगाव दिखा.
चुनौतियां
मार्था को कई वैज्ञानिक ऐसे भी मिले, जो दिन-रात अपने मशीनों के साथ ही रहते हैं. उन्होंने उपकरणों के दिलचस्प नाम रखे हैं.
मसलन, नख़रे दिखाने वाली मशीन का नाम बैड बॉय. या फिर हर बार रूठ जाने वाली मशीन का नाम मिस सोफ़ी रखा है.
जब पोलरस्टर्न बेहद सर्द आर्कटिक समुद्र से गुज़रत है, तो, बर्फ़ीली लहरों के थपेड़े बहुत डरावने लगते हैं.
कई वैज्ञानिकों को सी-सिकनेस यानी समुद्र में होने वाली बीमारी हो जाती है. वो अपने अपने केबिन में ही दुबके रहते हैं. लेकिन, धीरे-धीरे उन्हें इसकी आदत पड़ जाती है.
एक हफ़्ते में पोलरस्टर्न अपने पहले पड़ाव पर पहुंच जाता है. जहां पर वैज्ञानिकों की पहली चुनौती होती है, बर्फ़ का मज़बूत ठिकाना तलाशना, जिससे जहाज़ को रोका जा सके.
मिशन के योजनाकारों ने इस के लिए वैज्ञानिकों को पांच दिनों का समय दिया है. लेकिन, इस में ज़्यादा वक़्त भी लग सकता है. क्योंकि पूरे मिशन का सबसे मुश्किल काम यही है.
एक बार पोलरस्टर्न सही ठिकाने पर टिक गया, तो वैज्ञानिक निश्चिंत होकर अपने प्रयोग कर सकेंगे.
फ्रोज़ेन नॉर्थ
अगर, उन्होंने जहाज़ को बर्फ़ की पतली परत पर टिकाया, तो तमाम यंत्रों के बह जाने का डर होगा.
वैज्ञानिकों को जहाज़ के लिए सही ठिकाना तलाशने के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी भी मदद देगी.
इनसे मिली तस्वीरों से ये वैज्ञानिक सही ठिकाना तलाशकर जहाज़ को रोकेंगे.
हालांकि ये मिशन, पूरी तरह से आर्कटिक के बेहद ख़तरनाक मौसम के मूड पर निर्भर करेगा.
ये लेख, बीबीसी फ्यूचर की सिरीज़ फ्रोज़ेन नॉर्थ का एक हिस्सा है.
यह लेख मूल रूप से बीबीसी फ़्यूचर पर प्रकाशित हुआ था. मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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