आर्मीनिया पर अमेरिका का ये बयान तुर्की को फिर कर सकता है नाराज़

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आर्मीनिया में हुई दस लाख से ज़्यादा हत्याओं को एक बार फिर 'जनसंहार' कहा है.

इन हत्याओं के लिए ऑटोमन साम्राज्य को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. ऑटोमन साम्राज्य के पतन के आख़िरी दिनों में हुई इन हत्याओं को बाइडन एक साल पहले भी जनसंहार बता चुके हैं.

पिछले साल उन्होंने 'आर्मीनियाई रिमेम्बरेंस डे' के मौक़े पर औपचारिक तौर पर 'जनसंहार' शब्द का इस्तेमाल किया था. ऐसा करने वाले वो पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे.

तुर्की के लिए ये बेहद संवेदनशील मुद्दा है. वो उस दौरान लोगों पर हुए अत्याचारों और हत्याओं की बात स्वीकार तो करता है लेकिन इसे 'जनसंहार" मानने से इनकार करता है.

तुर्की को इस शब्द से नाराज़गी है. पिछले साल जब बाइडन की तरफ़ से ये बयान सामने आया था तो तुर्की के विदेश मंत्री ने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया था.

साथ ही तुर्की के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राजदूत को तलब कर कड़ी आपत्ति जताई थी.

फिलहाल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ताज़ा बयान में हत्याओं को 'जनसंहार' बताते हुए कहा है कि आज से 107 साल पहले शुरू हुई हत्याएं '20वीं सदी में हुए सबसे बड़े सामूहिक अत्याचारों में एक थीं.'

साथ ही बाइडन ने अमेरिकी लोगों से ऐसे मामलों में खुलकर बोलने की अपील की.

पहले की अमेरिकी सरकारों का रुख़ क्या रहा है?

बता दें कि हर साल 24 अप्रैल को आर्मीनिया ऑटोमन साम्राज्य के पतन के दौरान बड़ी संख्या में मारे गए लोगों को याद करता है.

इससे पहले के अमेरिकी प्रशासन ने तुर्की के साथ अपने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए अपने औपचारिक बयानों में आर्मीनिया में हुई हत्याओं का ज़िक्र तो किया था लेकिन इसे जनसंहार नहीं कहा था.

इससे पहले 1981 में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने होलोकॉस्ट पर दिए एक बयान में 'आर्मीनियाई नरसंहार' का ज़िक्र किया था.

हालांकि, किसी और अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा.

बाइडन से पहले राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप का कहना था कि वो इन हत्याओं को जनसंहार नहीं मानते. ट्रंप ने इसे "बीसवीं सदी के सबसे बड़े सामूहिक अत्याचारों में से एक" कहा था.

1915 में आख़िर हुआ क्या था?

रूसी सेना से हारने के बाद ऑटोमन साम्राज्य के तुर्कों ने इसके लिए ईसाई आर्मीनियाई लोगों पर विश्वासघात का आरोप लगाया.

उन्होंने जबरन बड़ी संख्या में आर्मीनियाई लोगों को सीरियाई रेगिस्तान और अन्य जगहों पर भेजना शुरू कर दिया. इस दौरान उन पर ज्यादतियां की गईं और उन्हें खाने पीने का कोई सामान नहीं दिया गया. हज़ारों अर्मीनियाई लोगों को या तो मार दिया गया गया या वो भुखमरी या बीमारी के कारण मारे गए.

उस समय के पत्रकारों, मिशनरियों और राजनयिकों समेत कई लोग आर्मीनियाई लोगों पर हुए अत्याचारों के गवाह बने और उन्होंने इन घटनाओं को दर्ज किया.

इस दौरान कितने आर्मीनियाई लोगों की मौत हुई इसे लेकर विवाद अब भी जारी है. आर्मीनिया का कहना है कि इस दौर में 15 लाख लोगों की मौत हुई थी. हालांकि, तुर्की का कहना है कि इस दौरान क़रीब तीन लाख लोगों की मौत हुई.

इंटरनेशनल असोसिएशन ऑफ़ जीनोसाइड स्कॉलर्स (आईएजीएस) के अनुसार इस दौरान मरने वालों का आंकड़ा "दस लाख से अधिक था".

तुर्की इस बात को स्वीकार तो करता है कि ऑटोमन साम्राज्य के पतन के दौरान लोगों पर अत्याचार किए गए थे लेकिन वो कहता है कि ईसाई अर्मेनियाई लोगों को ख़त्म करने के लिए किसी तरह की सुनियोजित कोशिश नहीं की गई थी.

तुर्की का कहना है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुई इस घटना में कई मुसलमान तुर्कों की भी मौत हुई थी.

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