रूस और यूक्रेन की जंग की वजह से क्या दुनिया को अकाल का सामना करना पड़ेगा

    • Author, एलेक्सी कामिकोव
    • पदनाम, बीबीसी

यूक्रेन के खिलाफ रूस के हमले से न सिर्फ दोनों तरफ के लोगों की मौत हुई है, बल्कि इसने दुनिया को भारी खाद्यान्न संकट की ओर धकेल दिया है.

इससे दुनिया में और ज्यादा गरीबी बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है.

लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर उन गरीब देशों पर होगा जिन्हें रूस अपना दोस्त नहीं मानता.

इस लड़ाई से पहले तक रूस और यूक्रेन दुनिया के बाजारों में सबसे ज्यादा खाद्यान्न बेचने वाले देशों में शुमार थे.

अनाज और वनस्पति तेल के ये सबसे बड़े निर्यातक थे. इसके अलावा रूस खुद पेट्रोल, पेट्रोल उत्पाद और गैस के भी सबसे बड़े निर्यातक देशों में शामिल है.

लेकिन रूस और यूक्रेन दोनों देशों की ओर से इन चीजों के निर्यात की रफ्तार धीमी हो गई है. यूक्रेन तो अब खुद खाद्यान्न की कमी का सामना कर रहा है.

रूसी नौसेना ने उनके बंदरगाहों की नाकेबंदी कर रखी है, जिससे यूक्रेन तक अनाज नहीं पहुंच पा रहा है. कहा जा रहा है कि यूक्रेन में हालात अब और खराब होंगे.

यह भी पक्का नहीं है कि इस साल फसलों की कटाई होगी भी या नहीं क्योंकि यूक्रेन के खेतों में बारूदी सुरंगें बिछी हुई हैं और वहां टैंक से हमले हो रहे हैं.

किसानों को अपने ट्रैक्टर खेतों में ही छोड़ कर भागना पड़ रहा है.

खाद्यान्न संकट से बेतहाशा बढ़ी महंगाई

इन हालातों ने बड़ी समस्या खड़ी कर दी है, खासकर कर गरीब देशों के लिए. उन देशों के लिए जहां परिवारों का ज्यादातर पैसा खाने पर ही खर्च हो जाता है.

दुनिया अभी पिछले साल के भयंकर सूखे से उबरी ही है और लोग पहले से खाद्यान्न की महंगाई का सामना कर रहे हैं. लेकिन इस वक्त खाद्यान्नों की महंगाई और बढ़ गई है.

ये महंगाई पिछले 32 साल के शीर्ष पर पहुंच गई है.

यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग की वजह से खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनों को चलाने वाले फ्यूल के दाम काफी बढ़ गए हैं.

समुद्र और सड़क मार्ग से चीजों की ढुलाई, लोन, फर्टिलाइजर और स्टोरेज सर्विसेज भी महंगी हो गई है.

मीट और खाने के दूसरे सामान महंगे होते जा रहे हैं क्योंकि मनुष्य और मवेशियों के लिए खाद्यान्न उपलब्धता घटती जा रही है.

अब सवाल ये है कि क्या हमारी धरती एक और अकाल की ओर बढ़ रही है. नहीं, फिलहाल ऐसा संकट नहीं है.

ब्रुजेल रिसर्च सेंटर के विशेषज्ञों का कहना है, "खराब से खराब स्थिति में भी धरती पर इतना खाद्यान्न होगा कि ये लोगों को पेट भर सके."

हो सकता है कि हालात मुश्किल हों. लोगों को कम खाद्यान्न से काम चलाना पड़े. लेकिन वैसे देशों के सामने वाकई अकाल का खतरा है जो गरीब हैं और जहां संघर्ष चल रहा है.

सोमालिया, अफगानिस्तान और यमन ऐसे ही देश हैं. खाद्यान्न की कमी से सबसे कम प्रभावित पश्चिमी देश होंगे.

सबसे ज्यादा किन देशों पर असर

सबसे खराब हालात उन विकासशील देशों में होंगे, जो शुष्क क्षेत्र में पड़ते हैं. इनमें मध्य पूर्व से लेकर उत्तरी अफ्रीका के देश शामिल हैं.

ये देश अपनी जरूरत का 90 फीसदी खाद्यान्न आयात करते हैं. इसके सबसे नजदीकी निर्यातक रूस और यूक्रेन ही हैं.

ब्रुजेल के रिसर्चरों का कहना है कि खाद्यान्न कीमतों के बढ़ने से मानवीय संकट और राजनीतिक जोखिम भी बढ़ेगा. इससे पहले खाद्यान्नों की इतनी महंगाई अरब स्प्रिंग के दौरान दिखी थी.

एक दशक पहले अरब स्प्रिंग के नाम से जाने गए विरोध और क्रांति से लीबिया, ट्यूनिशिया, मिस्र और यमन में सरकारें बदल गई थीं और सीरिया में गृह युद्ध छिड़ गया था, जिसमें रूस भी एक पक्ष के साथ है.

वर्ल्ड बैंक और यूरोपियन बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट के विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन पर रूस के हमले का अप्रत्यक्ष शिकार होने वाले देशों में तुर्की, मिस्र, भारत, थाईलैंड, जॉर्जिया, आर्मेनिया, दक्षिण अफ्रीका, लेबनान और यहां तक कि श्रीलंका भी शामिल हो सकता है.

रूस के साथ कारोबार

मौजूदा दौर में इन देशों की स्थिति खराब है क्योंकि ये रूस पर काफी निर्भर हैं. रूस के साथ इनका कारोबार है.

ये पर्यटन से कमाई करते हैं और रूस पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन कर पश्चिमी देशों से खुलेआम झगड़ा नहीं चाहते.

ये देश आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं जो घरेलू राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डाल सकता है. मिसाल के तौर पर मिस्र दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न आयातकों में से एक है.

लड़ाई से पहले यहां 20 फीसदी टूरिस्ट रूस से आए थे. तुर्की की तरह. तुर्की भी तेल के आयात पर 93 और गैस के आयात पर 99 फीसदी तक निर्भर है.

यूक्रेन को छोड़ कर रूस से खाद्यान्न और तेल मंगाने वाले इसके सभी पड़ोसी देशों को दिक्कत हो सकती है.

उन देशों को भी दिक्कत होगी जिनकी आबादी का एक हिस्सा रूस काम की तलाश में रूस जाता है.

लड़ाई से पहले रूस से आने वाला पैसा ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता था.

रूस से आने वाली रकम तो उजबेकिस्तान और आर्मेनिया की जीडीपी का दस फीसदी तक पहुंच चुकी थी. ये पैसा रूस में काम करे इनके लोगों की ओर से भेजा जाता है.

इन देशों को दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन अफगानिस्तान और यमन जैसे अंदरुनी संघर्ष वाले देसं को सामने वास्तव में अकाल जैसे हालात पैदा हो सकते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले 38 देशों के चार करोड़ चालीस लाख लोग भुखमरी के कगार पर थे. दुनिया की आबादी का हर दसवां शख्स भुखमरी का सामना कर रहा था.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि युद्ध की वजह से एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों में यह संख्या अस्सी लाख और ज्यादा खराब स्थिति में एक करोड़ तीस लाख तक पहुंच सकती है.

पश्चिमी देश बढ़ा सकते हैं अनाज की पैदावार

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं और तेल के बढ़े दामों ने गरीब देशों पर और जोरदार वार किया है. इससे फाइनल प्रोडक्ट के दाम में बढ़ोतरी हो रही है.

संयुक्त राष्ट्र के शुरुआती आकलनों के मुताबिक युद्ध की वजह से यूक्रेन अपनी खेती लायक 20 से 30 फीसदी जमीन खो देगा. ब्रुजेल का आकलन तो और ज्यादा है.

अगर हालात ज्यादा खराब हुए तो यूक्रेन का सारा निर्यात ठप हो जाएगा. अगर युद्ध जल्दी खत्म होता है तो भी निर्यात 30 फीसदी गिर जाएगा.

ब्रुजेल के रिसर्चरों का कहना है, "अगर समय से कदम उठाए जाते हैं तो खाद्यान्न की कमी का असर कम किया जा सकता है. यूरोपीय यूनियन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अनाज उत्पादन करने वाले प्रमुख देश ऐसा कर सकते हैं. उनके पास पर्याप्त खाली जमीन है और पैदावार बढ़ा कर इस संकट का सामना कर सकते हैं."

यूक्रेन पर रूस के हमले का सीधा असर पड़ने के साथ अप्रत्यक्ष असर भी होगा. और वह खाद्यान्न संकट के तौर पर सामने आएगा . पश्चिमी देश तो यूक्रेन की मदद कर रहे हैं लेकिन यह अफगानिस्तान और यमन में समय नहीं दे पा रहा है. जिन लोगों की मदद की जरूरत है उनकी तादाद अब कई लाख बढ़ चुकी है. खाद्यान्न की ढुलाई की कीमतें बढ़ने, खाद्यान्न की कीमत बढ़ने और दूसरी लागतों की वजह से मानवीय सहायता का बजट या तो कम हो गया है या फिर पहले जितना ही है.

महंगाई की मार से थम सकता है विकास

यूक्रेन पहले संयुक्त राष्ट्र के फूड प्रोग्राम के लिए अनाज और तेल दे चुका है. लेकिन अब वह इसे न सिर्फ रोक चुका है बल्कि वह यूएन से मदद लेने वाला देश बन गया है. अब तक इस देश के दस लाख लोग फूड पैकेज और भोजन के तौर पर मदद ले चुके हैं. यूएन और 33 लाख यूक्रेनी लोगों को मदद देने की योजना बना रहा है.

युद्ध से पहले संयुक्त राष्ट्र ने 2022 तक के लिए 19 अरब डॉलर की सहायता राशि जुटाई थी ताकि दुनिया भर में 13 करोड़ 70 लाख लोगों को भुखमरी से बचाया जा सके. लेकिन इस साल अब तक मदद देने वालों ने भी कम मदद की. यूएन फूड प्रोग्राम के तहत जितना पैसा जुटाया गया था, इस बार उसका आधा भी नहीं आया है.

और भी कई समस्याएं हैं. खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों की वजह से पूरी महंगाई भी बढ़ रही है. इससे केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाने पर मजबूर हो रहे हैं. ऊंची ब्याज दरों की वजह से आम उपभोक्ता, देश और कंपनियां कम कर्ज ले रही हैं. इससे अमीर देशों में विकास की रफ्तार धीमी हो रही है और गरीब देशों के सामने तो दिवालिया का खतरा मंडराने लगा है.

कोरोना के दौरान इनमें से ज्यादाततर देशों को कर्ज लेना पड़ा. लगभग 40 देशों को कर्ज संकट से गुजरना पड़ा है. कम ब्याज दरों ने इन देशों में गंभीर संकट पैदा किया है और ऊंची ब्याज दरों ने आधी समृद्धि ही छीन ली है.

युद्ध की मार सबसे ज्यादा गरीबों पर

रूस-यूक्रेन युद्ध ने विकसित देशों की ओर से इस्तेमाल होने वाली चीजें कम कर दी है. कोरोना वायरस की वजह से 2020 में इन चीजों का वैश्विक कारोबार पांच फीसदी घट गया था.

पिछले साल इस बात की उम्मीद लगाई जा रही थी इसकी भरपाई हो जाएगी और इस कारोबार में दस फीसदी इजाफा होगा.

लेकिन वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन ने कहा है इस साल ग्रोथ पांच फीसदी रहेगी. अब इसने कहा है कि यह ग्रोथ अगले दो साल में तीन फीसदी ही रहेगी.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में सबसे बड़ा युद्ध छेड़ा है और पश्चिम के खिलाफ मोर्चा खोला है.

वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख गोजी ओकोंजो इवेला का कहना है, "इतिहास इस बात का गवाह है कि जब दुनिया की अर्थव्यवस्था दो विपरीत ध्रुवों में बंट जाती है तो गरीबों की ओर से पीठ फेर लेती है. दुनिया में न शांति होती है और न विकास."

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