आख़िर यूक्रेन के लिए क्या है रूस का एक्शन प्लान?

    • Author, ओल्गा इव्शिना
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की लगातार बढ़ती आशंकाओं के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूरोप में अतिरिक्त सेना भेजने का फ़ैसला लिया है. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने ये जानकारी दी है. दो हज़ार सैनिकों को नॉर्थ कैरोलाइना के फ़ोर्ट ब्रैग से पोलैंड और जर्मनी भेजा जाएगा. जर्मनी में पहले से मौजूद एक हज़ार सैनिकों को रोमानिया भेजा जाएगा.

रूस ने आक्रमण करने की किसी भी योजना से इंकार किया है, हालांकि यूक्रेन की सीमाओं पर एक लाख रूसी सैनिक तैनात किए गए हैं. रूस ने अमेरिका के सेना भेजने के फ़ैसले को "विनाशकारी" बताया है.

यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैनिकों के जमावड़े में हाल के वर्षों में कई गुना तेज़ी आई है. लेकिन पश्चिमी देशों की ओर से जितनी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं वो पहले नहीं मिलती थीं. बीबीसी ने यह पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर अभी क्यों बढ़ा है यूक्रेन संकट.

अमेरिका एक तरफ़ रूस के यूक्रेन पर आक्रमण की तारीख़ का पूर्वानुमान लगाते हुए कह रहा है कि ये फ़रवरी महीने के अंतिम दिनों में हो सकता है. लेकिन दूसरी ओर कीव (यूक्रेन की राजधानी) में यूक्रेन के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें रूस से सटी सीमा पर स्थिति में कुछ भी नया नहीं दिख रहा है और वो पश्चिम के देशों से अभी नहीं घबराने की अपील कर रहे हैं.

दोनेत्स्क पीपुल्स रिपब्लिक के स्व-घोषित रूसी समर्थकों और यूक्रेनी सेना के बीच संघर्ष बीते आठ वर्षों से चला आ रहा है. उन्होंने रूस के एक नए सैन्य अभियान की संभावना के बारे में बात की. ऐसे में ये जानना महत्वपूर्ण है कि रूस और यूक्रेन के बीच ताज़ा तनाव और संकट के पीछे की संभावनाएं क्या-क्या हैं.

पहली संभावना -उत्तेजित करने की कोशिश

रूसी अंतरराष्ट्रीय मामलों की परिषद के प्रमुख आंद्रेई कोर्तुनोव ने बीबीसी को बताया, "पुतिन वाक़ई यूक्रेन में एक सैन्य अभियान शुरू करना चाहते हैं, ये हमें सबसे अंत में पता चलेगा. मुझे यक़ीन नहीं है कि वे यूक्रेन पर आक्रमण करने जा रहे हैं."

अगर हम 2014-15 की घटनाओं को याद करें हैं तो क्राइमिया पर क़ब्ज़ा करने के रूसी ऑपरेशन और डोनबास में रूसी समर्थकों से जुड़े ऑपरेशन दोनों ही अचानक शुरू हुए थे. तब यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैनिकों के जमावड़े के बारे में कोई जानकारी नहीं थी या फिर वे उस संघर्ष के शुरू होने के बाद दिखाई दिए थे.

बीते वर्ष अक्तूबर (2021) में पूरी स्थिति एक अलग ही परिदृश्य में शुरू हुई.

यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैनिकों की तैनाती की सूचना सबसे पहले वॉशिंगटन पोस्ट में रिपोर्ट की गई. कुछ दिनों बाद, पॉलिटिको और ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में एक सैटेलाइट इमेज को छापा और दावा किया कि यूक्रेन से सटी सीमा में रूस सोवियत संघ के दौर के बाद के सबसे बड़े सैन्य जमावड़े और उपकरणों की तैनाती कर रहा है.

हालांकि दिसंबर की शुरुआत में, यूक्रेन के अधिकारियों और सेना ने अपने बयानों में इस बात पर ज़ोर दिया कि वो अपनी सीमा पर 2016 या 2018 जैसी गतिविधियां नहीं देख रहे हैं.

जनवरी में यूक्रेन के नेशनल सिक्योरिटी ऐंड डिफ़ेंस काउंसिल के सचिव ओलेक्सी डैनिलोव ने कहा, "सैनिकों का जमावड़ा और रूसी सीमा में अभ्यास किया जाना काफ़ी समय से यूक्रेन के लिए न्यूज़ नहीं बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी जैसा है."

रूस के आधिकारिक प्रतिनिधि पश्चिम पर यूक्रेन को भड़काने का आरोप लगाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थायी प्रतिनिधि वसीली नेबेंज़्या कहते हैं, "लगता है कि वो ऐसा चाहते हैं और इसके होने का इंतज़ार कर रहे हैं. जैसे कि अनुमानों को हक़ीक़त में बदलने की कवायद हो रही है. हम लगातार इसका खंडन कर रहे हैं और यूक्रेन पर किसी भी तरह से सुनियोजित आक्रमण की बात हमारी किसी भी जानी मानी हस्ती के ज़ुबान से नहीं सुनी गई है."

विश्लेषक कोर्तुनोव का मानना है कि ये संकट जितना अधिक समय तक रहेगा दोनों देशों के बीच वास्तिक सैन्य संघर्ष की संभावना उतनी ही कम होगी.

वे ज़ोर देकर कहते हैं कि युद्ध रूस के लिए लाभकारी नहीं है और वो यूक्रेन में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान को लेकर उत्सुक नहीं दिखता है

एक और मुद्दा पश्चिम के साथ टकराव का है. जानकारों के मुताबिक़, पुतिन का मानना है कि पश्चिम ने 90 के दशक में रूस की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया, रूस के साथ ग़लत व्यवहार किया गया, उसे वो नहीं मिला जिसका वो हक़दार था और अब वो उस स्थिति को बदलना चाहता है.

कोर्तुनोव ने समझाया, "पुतिन का तर्क बिल्कुल सरल है, अब शक्ति संतुलन की धुरी बदल गई है, अब पूरी दुनिया का झुकाव पश्चिम की ओर नहीं है, और आपको हमारी बात सुननी होगी और हमारी चिंताओं को गंभीरता से लेना होगा."

दूसरी संभावना - रूस का ये मानना कि कोशिश करने पर मिलती है सफलता

पश्चिम में विश्लेषक तर्कों को थोड़ा अलग तरीक़े से जोड़ते हैं.

कई इस तथ्य पर ग़ौर फ़रमाते हैं कि यूक्रेन की सीमा से रूसी सैनिकों के जमावड़े में पहली बड़ी गिरावट बीते वर्ष वसंत में हुई थी. कुछ महीने बाद पुतिन ने एक लेख में रूस-विरोधी योजनाओं का उल्लेख किया था, उनकी राय में पश्चिम के देश यूक्रेन की धरती पर ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं.

रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स में विशेषज्ञ जॉन लोव कहते हैं, "शायद ये समझते हुए पुतिन शतरंज की बिसात पर अपनी चाल की भांति ख़ुद को व्यवस्थित करते हुए अपने अवसर का इंतज़ार कर रहे हैं."

वे कहते हैं कि ठीक इस तरह का अवसर 2021 के अंत में उन्हें मिल गया. यूक्रेन में वर्तमान स्थिति को लेकर रूस थक गया लगता है.

पुतिन को लगता है कि यूक्रेन के साथ कंधे से कंधा मिलाने की चाह उतनी मज़बूत नहीं हो सकती जितनी 2014 में थी. जर्मनी में सरकार नई है और वो अभी माहौल को समझने में ही लगी है. वहां रूस के साथ संबंधों को लेकर कैसे आगे बढ़ा जाए, इस पर एक मत नहीं है.

जैसा कि रूस में कहा जाता है कि आप एक क़दम आगे बढ़ाएं और फिर प्रतिक्रियाएं देखें.

सैन्य विश्लेषक रॉब ली कहते हैं कि यूक्रेन और तुर्की के बीच सफल सैन्य सहयोग भी इसका एक कारण हो सकता है.

यूक्रेन ने तुर्की से कई दर्जन बैराकटार टीबी2 ड्रोन ख़रीदे हैं जिसने दोनेत्स्क पीपुल्स रिपब्लिक के स्व-घोषित रूसी समर्थकों पर अक्तूबर में सफल हमला किया था. ये ड्रोन नार्गोनो-काराबाख़ युद्ध के दौरान बहुत कारगर साबित हुए थे.

एक्सपर्ट का मानना है कि तुर्की के ड्रोन वास्तव में यूक्रेन और रूस के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित तो नहीं करते, लेकिन डोनबास में रूस के समर्थक विद्रोहियों और यूक्रेनी सैनिकों के बीच शक्ति संतुलन को महत्वपूर्ण तरीक़े से बदलते हैं. लिहाज़ा यह निश्चित ही रूस को कार्रवाई करने के लिए उकसा सकता है.

रूस के नज़रिए से देखें तो बैराकटार के हमले और एचएमएस डिफ़ेंडर एक सार्वजनिक शर्मिंदगी और रूस को चुनौती देने जैसा है. ख़ासकर सीमा पर सैनिकों के जमावड़े और बाइडन के साथ बैठक को लेकर हुए प्रचार को देखते हुए.

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि रूस ने अपने नज़रिए को बदलने का फ़ैसला लिया है. ली कहते हैं, "मौजूदा स्थिति रूस को स्वीकार नहीं है, और वो ये देख पा रहा है कि वर्तमान घटनाक्रम उसकी स्थिति को कमज़ोर बना रहा है. वसंत के समय में रूस ने सैनिकों को कम करने की जो कवायद की थी उससे यूक्रेन ने अपनी सेना का आधुनिकीकरण नहीं रोका, न ही यूक्रेन के लिए नेटो देशों के समर्थन में कमी आई और न ही यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की रूस विरोधी नीति में."

उनका मानना है कि रूस ने इसके बाद सैन्य जमावड़े को कम करने की बजाय आक्रामक तरीक़े से अपने क़दम आगे बढ़ाने का फ़ैसला लिया.

किंग्स कॉलेज लंदन के एक्सपर्ट एलेक्ज़ेंडर क्लार्कसन कहते हैं, "पुतिन को दोनों देशों के बीच मौजूदा तनाव से फ़ायदा ही होगा, वो कई महीनों तक इस स्थिति को बनाए रख सकते हैं, यानी बड़ी संख्या में सैनिकों को यूक्रेन की सीमा पर बनाए रख सकते हैं. इससे यूक्रेन के पश्चिमी और यूरोपीय समर्थक भी थकने लगेंगे. इससे यूक्रेन में स्थिरता आएगी. फिर या तो वो तेज़ प्रहार करेंगे या प्रस्ताव देंगे या शायद दोनों ही करेंगे."

तीसरी संभावना: युद्ध करेगा भविष्य का निर्धारण

इतिहासकारों ने पहले ही इस ओर इशारा किया था कि यूक्रेन के बारे में पुतिन के सार्वजनिक बयान में पहले ही कई ऐतिहासिक ग़लतियां और जोड़तोड़ हैं. वहीं पश्चिम के कुछ विश्लेषक भी मानते हैं कि कीव और डोनबास में वर्तमान स्थिति को लेकर रूस के विश्लेषण में ग़लतियां हो सकती हैं.

पुतिन, रूस, फ़ेडरल सीक्योरिटी सर्विस यानी एफ़एसबी और जीआरयू यानी इंटेलिजेंस सर्विस के डायनामिक्स को नहीं समझते. वो कहते हैं कि यूक्रेनी रूस की दुनिया से जुड़ना चाहते हैं, लेकिन यूक्रेन के पश्चिम समर्थक फ़ासीवादी उसे विफल कर रहे हैं

जानकारों का मानना है कि इसी वजह से रूस, यूक्रेन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान को शुरू कर सकता है

कुज़ियो कहते हैं, "रूस ये मानता है कि अगर उसने यूक्रेन पर हमला किया तो उसकी सेना का वहां (यूक्रेन में) मुक्ति दिलाने वाले के तौर पर स्वागत किया जाएगा. और इसी वजह से वो वहां रूस समर्थक कठपुतली शासन स्थापित करना चाहते हैं और लोगों की राय को अनदेखा करना चाहते हैं."

रिटायर्ड ब्रिटिश राजनयिक इयॉन बॉण्ड इस बात से सहमत हैं कि रूस, यूक्रेन के अधिकांश लोगों की भावनाओं को ग़लत समझता है. उनका मानना है कि यूक्रेन पर हमला करने की रूस की योजना वास्तविक हो सकती है.

वो कहते हैं, ''मुझे लगता है कि फ़िलहाल पुतिन ने पश्चिम से ऐसा कुछ नहीं सुना है जिससे उन्हें लगे कि यूक्रेन पर हमला करना संभावित फ़ायदे से बढ़कर है. वो इसे रूसी और यूक्रेनी लोगों को एक करने के अवसर के रूप में देखते हैं, भले ही यूक्रेन के लोग इसके विषय में कुछ और ही क्यों न सोचते हों. और यह भी बहुत हद तक संभव है कि वो ये भी सोचते हों कि महज़ यूरोप को भेजे जा रहे गैस में कटौती कर देने मात्र से ही पश्चिम के देश पीछे हट जाएंगे और कोई भी प्रतिरोध नहीं करेंगे."

रिटायर्ड राजनयिक कहते हैं, "एक परिदृष्य ये होगा कि रूस की सेना कीव तक पहुंचेगी और रूस की आबादी कीव को तथाकथित "नाज़ियों से मुक्ति दिलाने" और डोनबास के क्षेत्र के कुछ और किलोमीटर क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करने का जश्न मनाएगी. और अगर वहां की सत्ता पर क़ाबिज़ हुए तो यूक्रेन की सेना बिना किसी लीडर के रह जाएगी. बिना किसी नेतृत्व के. लिहाज़ा उन्हें दबाना आसान होगा."

बॉण्ड का मानना है कि पश्चिम के पूर्वानुमानों पर संयम बरतने की बात करने वाले यूक्रेन के अधिकारियों के अपने कारण हो सकते हैं.

वो कहते हैं, "ज़ेलेंस्की अभी रूस को ख़तरा नहीं बता रहे हैं, शायद इसलिए कि वो किसी तरह के दहशत का बीज नहीं बोना चाहते हैं और शायद उन्होंने सैन्य और आम जनों की तैयारियों पर समुचित ध्यान न दिया हो."

हालांकि, अधिकतर विश्लेषक इस बात से सहमत हैं कि रूस की शुरुआती योजना चाहे जो भी हो, जैसे-जैसे चीज़ें आगे बढ़ेंगी वो योजना भी समय और परिस्थिति के मुताबिक़ बदलती जाएगी.

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