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रूस यूक्रेन संकट: पीएम मोदी गेहूं निर्यातकों से 'आपदा में अवसर' तलाशने की बात क्यों कर रहे हैं?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का ये दूसरा हफ़्ता है.
अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देशों की तरफ़ से लगाए गए प्रतिबंधों के बीच, तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं.
भारत सरकार भी अपने तेल और गैस का बिल कम करने के लिए अलग-अलग प्रयासों में जुटी है.
लेकिन आपदा की इस घड़ी में प्रधानमंत्री मोदी ने गेहूं के निर्यातकों से ख़ास अपील की है.
मंगलवार को बजट से जुड़े एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "इन दिनों दुनिया में भारत के गेहूं की तरफ़ आकर्षण बढ़ने की ख़बरें आ रही हैं. क्या हमारे गेहूं के निर्यातकों का ध्यान इस तरफ़ है? भारत के फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन का ध्यान इस तरफ़ है क्या?"
उनके कहने का मतलब ये निकाला जा रहा है कि गेहूं के निर्यातक यूक्रेन संकट के बीच, उन देशों को गेहूं निर्यात करने के बारे में सोचें, जो अब तक यूक्रेन और रूस से इसे ख़रीदते आए हैं.
इस वजह से दुनिया और भारत के गेहूं के बाज़ार के बारे में समझना ज़रूरी है.
दुनिया में गेहूं का बाज़ार
विश्व में गेहूं का निर्यात करने वाले टॉप 5 देशों में रूस, अमेरिका, कनाडा, फ़्रांस और यूक्रेन हैं.
ये पाँचों देश मिल कर 65 फ़ीसदी बाज़ार पर क़ब्ज़ा जमाए बैठे हैं.
इसमें से तीस फ़ीसदी एक्सपोर्ट रूस और यूक्रेन से होता है.
रूस का आधा गेहूं मिस्र, तुर्की और बांग्लादेश ख़रीद लेते हैं.
जबकि यूक्रेन के गेहूं के ख़रीदार हैं मिस्र, इंडोनेशिया, फिलीपींस, तुर्की और ट्यूनीशिया.
अब दुनिया के दो बड़े गेहूं निर्यातक देश, आपस में जंग में उलझे हों, तो उनके ग्राहक देशों में गेहूं की सप्लाई बाधित होना लाज़मी है.
रूस-यूक्रेन युद्ध का गेहूं के बाज़ार पर असर
इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं की डिमांड बढ़ रही है और सप्लाई के दूसरे सोर्स तलाशे जा रहे हैं.
मध्य पूर्व और उत्तर अफ़्रीका के देशों में गेहूं संकट की शुरुआत हो चुकी है.
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मिस्र जैसे देश में कुछ महीने का गेहूं का स्टॉक बचा है. मिस्र अपने गेहूं की खपत का 80 फ़ीसदी हिस्सा रूस और यूक्रेन से आयात करता है. इस वजह से वहाँ दिक़्क़त ज़्यादा है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ आने वाले दिनों में गेहूं का आयात करने वाले देशों को 40 फ़ीसदी ज़्यादा ख़र्च करना पड़ सकता है.
नतीजा ये कि कुछ देशों में गेहूं के दाम तेज़ी से बढ़ने लगे हैं.
भारत जैसे देश में भी पिछले एक सप्ताह में गेहूं के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक हो गए हैं.
यही वजह है कि पीएम मोदी भारत के गेहूं निर्यातकों से 'आपदा में अवसर' की तलाश करने को कह रहे हैं.
भारत में पैदावार अधिक पर निर्यात नहीं
दुनिया में गेहूं के पैदावार में चीन पहले पायदान पर है, भारत नंबर दो पर है. लेकिन निर्यात में दुनिया के टॉप 10 देशों में अमेरिका, रूस और यूक्रेन के साथ भारत शुमार नहीं है.
आलोक सिन्हा 2006 से 2008 तक फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (एफसीआई) के चेयरमैन रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "भारत में सालान 400- 450 लाख टन गेहूं की पैदावार होती है. कुल पैदावार का 100-150 लाख टन खुले बाज़ार में बिक जाता है और कुछ निजी इस्तेमाल में लग जाता है. बाक़ी तक़रीबन 300 लाख टन गेहूं एफ़सीआई ख़रीद लेती है. एफ़सीआई इसमें से 220-230 टन का इस्तेमाल अलग-अलग स्कीम के तहत करती है. बाक़ी 70-80 लाख टन का गेहूं बच जाता है. ये बचा हुआ गेहूं मानवीय सहायता के तौर पर कभी-कभी दूसरे देशों को दे देते हैं."
इन आंकड़ों से ये समझना मुश्किल नहीं की भारत में निर्यात के लिए गेहूं पर्याप्त मात्रा में है. सप्लाई की कमी नहीं होगी.
तो फिर निर्यात में भारत पीछे क्यों है?
इसके जवाब में आलोक सिन्हा कहते हैं, "दो अहम कारण है- देश में ही अधिक मात्रा में गेहूं की खपत होना और दूसरा है गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से अधिक होना. यूक्रेन रूस संकट से पहले तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं का रेट कम और भारत में ज़्यादा रहता था. इसलिए आयात करने वाले देश भारत का रुख नहीं करते थे."
कुछ जानकार इसके पीछे गेहूं की गुणवत्ता को भी एक वजह मानते हैं.
कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना के मुताबिक़, "गेहूं की दो तरह की क्वालिटी भारत में होती है. एक वो जो पंजाब हरियाणा की तरफ़ होती है. उसे साफ़्ट गेहूं कहते हैं. दूसरा वो है जो मध्यप्रदेश में होता है, जिसे शरबती गेहूं कहते हैं. मध्यप्रदेश में होने वाले गेहूं का इस्तेमाल ब्रेड और बेकरी की चीज़ें बनाने में ज़्यादा होता है. इस वजह से कई लोग इसे बेहतर मानते हैं."
यूरोप के देशों में शरबती गेहूं की डिमांड ज़्यादा होती है. ये एक अहम वजह है कि भारत के गेहूं के ग्राहक देश बांग्लादेश, नेपाल, यूएई, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान और क़तर हैं.
गेहूं के निर्यातकों के लिए क्या यूक्रेन संकट आपदा में अवसर है?
यूक्रेन-रूस युद्ध का अंत तुरंत नज़र नहीं आ रहा है.
ऐसे में क्या दुनिया को गेहूं संकट से उबरने में भारत के गेहूं निर्यातक कोई भूमिका निभा सकते हैं?
इस सवाल के जवाब में आलोक सिन्हा 2014 का किस्सा सुनाते हैं.
"साल 2014 में रूस ने जब क्राइमिया पर हमला किया था, तब यूरोपीय संघ के देशों ने रूस को डेयरी उत्पाद देना बंद कर दिया. उस समय अमूल ने रूस में नया बाज़ार तलाशा और उनका साल का टर्नओवर काफ़ी बढ़ गया था. उस लिहाज़ से देखें तो इस समय भारत के गेहूं के एक्सपोर्टर दूसरे देशों में गेहूं बेचने का विकल्प तलाश कर सकते हैं."
तो गेहूं के एक्सपोर्ट से भारत में गेहूं के दाम ज़्यादा नहीं बढ़ जाएंगे?
इस पर आलोक सिन्हा कहते हैं, "गेहूं एक्सपोर्ट के कुछ फ़ायदे भी हैं और कुछ नुक़सान भी. फ़ायदा ये कि भारत के गेहूं को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक अलग पहचान मिलेगी. भारत के निर्यात बिल से होने वाली कमाई में इज़ाफ़ा होगा. भारत सरकार राशन में जिन्हें गेहूं देती है, उनपर इसका कोई असर नहीं होगा. लेकिन नुक़सान ये हो सकता है कि वो मिडिल क्लास जो पैकेट का आटा ख़रीदते हैं उनको आने वाले दिनों में बढ़ी हुई कीमत चुकानी पड़े. इससे कंज्यूमर प्राइज़ इंडेक्स बढ़ सकता है."
विजय सरदाना कहते हैं, "आज की तारीख़ में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं 40 हज़ार रुपये प्रति टन है. भारत के एफ़सीआई के गोदाम में रखे गेहूं तक़रीबन 25 हज़ार रुपये प्रति टन में ख़रीदे गए हैं (एमएसपी और माल ढुलाई जोड़ दें तब)."
यानी गेहूं के दाम भारत में आज की तारीख़ में कम है.
इसके लिए भारत उन देशों को अपना ग्राहक बनाने की कोशिश में लग सकता है, जो पहले रूस और यूक्रेन के ग्राहक थे.
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