यूक्रेन-रूस युद्ध में क्या है तेल का खेल और खाड़ी देशों की मुश्किल

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
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दुनिया के तेल का एक बड़ा भंडार खाड़ी के मुसलमान देशों के पास है. इन देशों ने रूस की यूक्रेन पर चढ़ाई पर अब तक न्यूट्रल और सधी हुई प्रतिक्रिया दी है.
ये देश अपने दशकों के दोस्त अमेरिका के साथ पूरी तरह से खड़ नहीं दिख रहे हैं. उनकी प्रतिक्रिया पश्चिम और रूस के बीच एक संतुलन बनाए रखने जैसी है.
इस स्टैंड के पीछे ग्लोबल एनर्जी मार्केट में इन देशों के हित हैं.
रूसी हमले के अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति पर असर ने सबको चिंतित किया है. रूस पर पश्चिमी देशों की पाबंदी के बाद एक बार तो कच्चा तेल 140 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था.
अमेरिका के रूस से तेल आयात न करने के निर्णय ने तेल की मार्केट की दीर्घकालीन स्थिरता को भी प्रभावित किया है.

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आधिकारिक बयान कैसे रहे हैं?
क़तर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने रूसी आक्रमण की सीधी आलोचना नहीं की है. इन तीनों ने यूक्रेन और रूस के बीच विवाद का वार्ताओं के ज़रिए हल पर ज़ोर दिया है.
सऊदी अरब ने सारी स्थिति पर अपनी तटस्थता बरकरार रखते हुए दोनों पक्षों से ताक़त का इस्तेमाल छोड़, बातचीत करने पर ज़ोर दिया है.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का रेस्पांस भी लगभग ऐसा ही रही है. हालांकि, दो अवसरों पर यूएई के क़दमों पर लोगों को हैरानी हुई थी.
यूएई संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य और चैयरमेन है. दो अवसरों पर परिषद में यूक्रेन युद्ध पर हुए मतदान में यूएई वोटिंग से ग़ैर-हाज़िर रहा था.
इसके बाद मीडिया में ये अटकलें लगना शुरू हो गई थीं कि यूएई ने रूस के साथ कोई डील कर ली है. क्योंकि रूस ने यमन में लड़ रहे, ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों पर संयुक्त राष्ट्र में आने वाले एक अन्य प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था.

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ऐसी ख़बरें भी आई थीं जिनमें कहा जा रहा था कि यूएई पर हूथी विद्रोहियों के बढ़ते हमलों के बाद दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र में एक दूसरे का साथ देने का फ़ैसला किया था.
बाद में यूएई ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में रूस के यूक्रेन पर हमले वाले एक प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया था. क़तर और सऊदी अरब ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था.
क़तर ने भी यूक्रेन रूस युद्ध में ख़ुद को तटस्थ रखने का प्रयास किया है और मसले के सैन्य हल से बचने को कहा है. क़तर ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने की भी पेशकश की थी.
इससे उलट कुवैत ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी और कहा था कि रूस को यूक्रेन संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए. कुवैत ख़ुद 1990 में इराक़ी हमले का शिकार रहा है.

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क्या खाड़ी देश रूस की जगह लेंगे
अमेरिका के रूस से तेल ना खरीदने के फ़ैसले और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बाद ये बात उठने लगी है कि क्या खाड़ी देश रूस की कमी को पूरा करेंगे.
24 मार्च को सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कतर के ऊर्जा मंत्री साद बिन शरिदा अल-काबी ने कहा था कि उनका देश युद्ध में कोई पक्ष नहीं ले रहा है और वो यूरोप को गैस आपूर्ति करता रहेगा. लेकिन, उन्होंने कहा कि रूस की जगह लेना असंभव है.
इस दौरान यूएई, कुवैत और सऊदी अरब ने अमेरिका और दूसरी देशों की ओपेक के ज़रिए तेल उत्पादन बढ़ाने की मांग को खारिज कर दिया.
रूस पर प्रतिबंधों के बीच अबु धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायेद और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान दोनों ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से फोन पर बात करने से इनकार कर दिया था. अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जरनल ने ये रिपोर्ट आठ मार्च को प्रकाशित की थी.
इस रिपोर्ट के बाद अमेरिका में यूएई के राजदूत यूसेफ अल-क़तैबा ने कहा था कि यूएई और अमेरिका के संबंध 'तनाव' से गुज़र रहे हैं.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर मार्च में यूएई और सऊदी अरब की यात्रा की थी. इससे पहले ब्रिटेन ने इस साल के अंत तक रूस से ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह बंद करने की घोषणा की थी.

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मीडिया में किस तरह की चर्चा
खाड़ी देशों में मीडिया यूक्रेन-रूस के युद्ध को लेकर आधिकारिक बयानों को ही दोहराया है. सरकारी न्यूज़ एजेंसियों ने नेताओं के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत की और युद्ध की निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगा दिया है.
खाड़ी के प्रमुख ब्रॉडकास्टर अल अरेबिया, स्काई न्यू अरेबिया और अल जज़ीरा ने इसी तरह रिपोर्टिंग की है. उन्होंने पूरा ध्यान दिया है कि कोई भी विवादित मुद्दा ना छेड़ें और सरकारी बयानों को ही दोहराएं.
स्थानीय मीडिया में चल रही चर्चाओं में अमेरिका के साथ यूएई और सऊदी अरब के संबंधों में आए तनाव पर फोकस किया गया है. कुछ जानकारों का कहना है कि इसी तनाव के चलते ये देश अमेरिका की तरफदारी नहीं कर रहे हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर अनुमानों ने भी तनाव बढ़ा दिया है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि ये खाड़ी देशों के लिए प्रमुख मुद्दा बना हुआ है. इसके अलावा ईरान के समर्थन वाले लड़ाकों हूथियों को अमेरिका का समर्थन भी तनाव की एक वजह है.
चार मार्च को लंदन से निकलने वाले यूएई समर्थक अल-अरब अख़बार ने लिखा था कि अमेरिका के यूईए और पूरे खाड़ी देशों के प्रति निष्क्रिय रवैये को देखते हुए ओतैबा का बयान अमेरिका के लिए एक संदेथ था.
स्काई न्यूज़ अरेबिया ने पांच अप्रैल को एक अरब के एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से लिखा था कि यूएई और सऊदी अरब ने जो रुख अपनाया है उसकी वजह ईरान से समझौते के लिए अमेरिका का खाड़ी देशों को नज़रअंदाज करना है.
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