यूक्रेन पर रूस का हमला: सोशलिस्ट की चुप्पी पर क्यों उठे सवाल

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- Author, गेरार्डो लिसार्ड
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
यूक्रेन पर रूस के हमले को एक महीने से अधिक समय हो चुका है. यूक्रेन के कई शहर पूरी तरह से बर्बाद हो चुके हैं लेकिन यूक्रेन की सेनाएं लगातर रूस के आगे डटी हुई हैं.
वहीं, रूस भी लगातार हमला जारी रखे हुए है. रूस लगातार मिसाइलें दाग रहा है. फिलहाल यह युद्ध कब और कैसे समाप्त होगा, इसे लेकर कोई भी स्पष्ट तौर पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की लगातार रूस पर आरोप लगा रहे हैं कि रूस आम लोगो को निशाना बना रहा है. दूसरी तरफ रूस, के अपने अलग दावे हैं.
इस बीच यूक्रेन की एक पार्टी के नेता व्लादिस्लाव स्ट्रोडुबत्सेव ने कहा है कि रूस के हमले के बीच वे देश छोड़ने के बजाय यूक्रेन में ही रहेंगे ताकि वह यह दिखा सकें कि उनके जैसे सोशलिस्ट भी युद्ध की स्थिति में मददगार हो सकते हैं.
बीबीसी मुंडो को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, "हम मानवीय सहायता के लिए काम कर रहे हैं. हम पश्चिमी यूक्रेन में शरणार्थियों की मदद के लिए काम कर रहे हैं. हम दवाइयां ख़रीदकर लोगों को दे रहे हैं. लोगों को हथियार दे रहे हैं और सैन्य सहायता भी मुहैया करा रहे हैं."
उनकी सोत्स्यालनयी रुख़ (सोशल मूवमेंट) पार्टी यूक्रेन की एक डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ऑर्गेनाइज़ेशन है. यह पार्टी ख़ुद को पूंजीवाद और असहिष्णुता की विरोधी पार्टी बताती है.
हाल के दिनों में उन्होंने पश्चिम में वामपंथी समूहों - स्पेन के पोडेमोस से लेकर वेनेज़ुएला के ट्रोटस्काईस्ट्स तक को, रूस के हमले के ख़िलाफ़ यूक्रेन की मदद के लिए हथियार भेजने के लिए राज़ी करने की कोशिश की.
जब से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने फरवरी महीने में यूक्रेन पर हमले का आदेश दिया है, तब से कुछ वामपंथी पार्टियां, नेता और सरकारें सीधे तौर पर हमले की निंदा करने से बचते दिखे हैं.
स्ट्रोडुबत्सेव कहते हैं, "रूस के सोशलिस्ट तक ने पश्चिमी देशों के सोशलिस्ट की तरह की ग़लती नहीं की और हमले का विरोध किया."
महज़ 19 साल के यूक्रेन के सोशलिस्ट जो कि अपनी पार्टी के काउंसिल सदस्य भी हैं, उन्होंने यूक्रेन की राजधानी कीएव से बीबीसी मुंडो से बात की.
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अब कैसे हैं हालात?
यहां कमोबेश हालात लगभग स्थिर से हैं. शुरुआती दिनों में निश्चित तौर पर दहशत का माहौल था लेकिन यही वो दौर भी था जब लोग ख़ुद सामने आए और एकजुट होकर मदद भी की. रूस के ख़िलाफ़ मोर्चा संभालने के लिए यूक्रेन के सैकड़ों लोगों ने मीलों लंबा रास्ता तय किया और सेना में भर्ती हो गए.
हालांकि अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही है. अब धीरे-धीरे यही सब सामान्य हो गया है. लोगों को सायरन की आवाज़ सुनने की आदत हो चुकी है और अब उनके लिए बम धमाके और मिसाइल हमलों की आवाज़ आम बात हो चुकी है. अब लोग धीरे-धीरे ही सही इन्हीं सबके साथ सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं.
यूक्रेन पर रूस के हमले के बारे में आप क्या सोचते हैं?
इस सवाल पर वह कहते हैं कि यूक्रेन पर रूस का हमला बिल्कुल अनुचित है. उन्होंने इस हमले को भयावह बताया.
वह कहते हैं कि रूस के हमले का बचाव करने वाले कुछ लोगों की दलील है कि रूस, नेटो के ख़िलाफ़ ख़ुद का बचाव कर रहा है लेकिन इसका असलियत से कोई दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है.
वह कहते हैं कि इस युद्ध के पीछे रूस जो वजह दे रहा है, उसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल, यह रूस की कट्टरवादी सोच का नतीजा है. जो यह सोचता है कि उसके पास ये अधिकार है कि वह यह तय कर सकता है कि यूक्रेन में क्या हो. और यूक्रेन के लोगों को कैसे रहना चाहिए. यह रूसी साम्राज्यवाद का युद्ध है.
ज़ेलेंस्की जिस तरह से रूस के हमलों का जवाब दे रहे हैं, उसे आप कैसे देखते हैं?
दरअसल, इस सवाल के जवाब के दो आयाम हैं. सबसे पहले तो, सैन्य प्रतिक्रिया और इससे जुड़ा सबकुछ, मीडिया में इसे लेकर कैंपेन, यूरोपीय लोगों से अपील और इसी तरह की दूसरी चीज़ें.
इस लिहाज़ से, ज़ेलेंस्की ने शानदार और काबिल-ए-तारीफ़ काम किया है. उन्होंने हर किसी को प्रोत्साहित किया और इस युद्ध में एक नायक की भूमिका अदा की है. उन्हें सैन्य आधार पर सही फ़ैसले लिए हैं. इस युद्ध में सभी को एक भावना के तहत लाकर उन्होंने एक बेहतरीन काम किया है.
लेकिन उनकी प्रतिक्रिया का एक दूसरा पहलू सामाजिक आयाम का भी है, यूक्रेन के लोगों की स्थिरता की रक्षा करना. और इस लिहाज़ से इस सवाल का जवाब बेहद मुश्किल है.
युद्ध के दौर में, सरकार अपने श्रम-विरोधी सुधार को बढ़ावा दोने की कोशिश करती रही. इसके साथ ही वे वेलफ़ेयर फंड में कटौती को बढ़ा रहे हैं. इस लिहाज़ से ज़ेलेंस्की का प्रदर्शन बेहद ख़राब है.

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जिस तरह आप और यूक्रेन के लोगों ने रूस के हमले के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया दी है, क्या इसमें विचारधारा की कोई भूमिका है?
वो कहते हैं, "हम, बतौर सोशलिस्ट शुरू से ही रूस की साम्राज्यवादी नीति का विरोध करते रहे हैं."
"लेकिन दुर्भाग्य से, विचारधारा ने ही यूक्रेन के ख़िलाफ़ पुतिन की नीतियों का बचाव करने वाले पश्चिमी लेफ़्टिस्ट के लिए मुख्य भूमिका निभाई है."
कुछ पश्चिमी लेफ़्टिस्ट्स ने रूस के हमले को अमेरिका और नेटो के विस्तारवाद का नतीजा बताया है. इस पर आपका क्या तर्क है?
"मुझे लगता है कि यह बिल्कुल ही ग़लत तर्क है. यह पश्चिम पर केंद्रित विचार है कि पश्चिम की सभी समस्याओं को दूसरे प्रांतों में स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए."
वो कहते हैं कि दरअसल, यूक्रेन खुद नेटो में शामिल होने की कोशिश कर रहा था और इसकी एक बड़ी वजह रूस की नीति के कारण उपजा ख़तरा है.
यह कहना कि यूक्रेन पर अमेरिका या फिर नेटो का दबाव है, ग़लत है.
क़रीब आठ साल पहले डोनबास प्रांत में युद्ध शुरू हुआ था जब रूस की सेना ने यूक्रेन के क्षेत्र में आक्रमण किया और क्राइमिया पर कब्ज़ा कर लिया.
रूस की इस कार्रवाई ने सभी को असुरक्षित महसूस कराया और सभी के भीतर रूस के हमले का डर था.
पश्चिमी लेफ़्ट जो नहीं समझ सकता है, वो यह कि नेटो के साथ उनकी समस्या का इस क्षेत्र की स्थिति से कोई नाता नहीं. ये बिल्कुल अलग मसला है.

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पश्चिम के कई नेताओं और लेफ़्ट-विंग ऑर्गेनाइज़ेशन ने यूक्रेन को हथियार मुहैया कराने की आलोचना की है. उनका कहना है कि इससे शांति के विचार को नुकसान होगा और युद्ध की सोच को बल मिलेगा. आप इस पर क्या कहेंगे?
इस सवाल पर वो कहते हैं, "हम पूरी तरह से यूक्रेन को हथियार उपलब्ध कराने के पक्ष में हैं. हमारे एक्टिविस्ट्स सेना में भाग लेते हैं और युद्ध के लिए एकदम आगे खड़े हैं. और हमारी कोशिश है कि उन्हें इस दौरान जिस भी चीज़ की ज़रूरत हो, हम उन्हें वो उपलब्ध कराएं."
वो कहते हैं कि युद्ध और गुस्सा शब्दों से ख़त्म नहीं हो सकता है. अगर यूक्रेन की सेना के पास और रूस के ख़िलाफ़ खड़े लोगों के पास ख़ुद की रक्षा करने के लिए हथियार नहीं होंगे तो, यूक्रेन का अस्तित्व नहीं होगा. यूक्रेन के लोगों के पास अपनी राजनीति तय करने, अपनी अर्थव्यवस्था तय करने, अपनी संस्कृति को अपनाने और अपने जीवन को अपने तरीक़े से संचालित करने का अधिकार भी नहीं होगा.
मेरा मानना है कि जो लोग यूक्रेन को हथियार भेजने का विरोध कर रहे हैं, वे यूक्रेन के अपने ख़ुद के फ़ैसले ले सकने के अधिकार के ख़िलाफ़ खड़े हैं. मेरा मानना है कि किसी भी समझौते या शांति के लिए ज़रूरी है कि जो लोग समझौता चाहते हैं, वे ताकतवर हों. वरना इसके बिना शांति नहीं हो सकती.
तो ऐसे में यूक्रेन को हथियार भेजना ना सिर्फ़ एक सही काम है बल्कि अगर आप चाहते हैं कि अब और लोग ना मरें और ये युद्ध जल्द से जल्द ख़त्म हो जाए तो यह करना बिल्कुल सही है.

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आपको क्यों लगता है कि कुछ पश्चिमी लेफ़्टिस्ट्स रूस और पुतिन की आलोचना करने के बजाय अमेरिका और नेटो की आलोचना को लेकर अधिक मुखर हैं?
ऐसा अमेरिका और सामान्य तौर पर उसकी नीतियों के प्रति उनकी निराशा के कारण है. वे एक ऐसे विचार में फंसे हुए हैं जिसमें लेफ़्टिज़्म और सोशलिस्ट विचार में बहुत कुछ सामान्य ना होते हुए भी अमेरिकी नीतियों के ख़िलाफ़ समान विरोध है.
इस बारे में आपका क्या ख़्याल है कि रूस दरअसल यूक्रेन को नाज़ीवाद से मुक्त कराने की कोशिश में है जैसा कि व्लादिमीर पुतिन ने हमले को ज़ायज ठहराते हुए दावा किया है ?
इस सवाल पर वो कहते हैं, "यह सरासर झूठ है."
"दरअसल यूक्रेन में हमारी एक समस्या चरम दक्षिणपंथ तो है, ख़ासतौर पर वहां के गलियों और एक हद तक सेना के बीच देखा जाय तो लेकिन अभी तक यह है कि यूक्रेन की राजनीति और सामान्य जीवन पर उनका बहुत कम प्रभाव है."
वो कहते हैं कि राजनीतिक गुट के तौर पर वहां के अभिजात्य वर्ग और कुछ कंपनियों के बीच उनकी बेहद ही ख़ास भूमिका हुआ करती हैं. बहुत ज़्यादा नहीं, फिर भी जैसा कि अधिकांश देशों में जिस तरह से इनकी मौज़ूदगी बनी रहती है, कुछ-कुछ वैसा ही.
यूक्रेन में एक अजॉव बटालियन है जो कि सेना का एक अंग है और चूंकि यूक्रेन की सेना ग़ैर-राजनैतिक है इसलिए वो वहां कुछ नहीं कर सकते, सेना आदेशों का पूरी सख्ती से पालन करते हैं.
दूसरे संगठनों, राजनीतिक दलों या फिर नए-नाज़ीवादियों की बात करें तो यूक्रेन की राजनीति में इन सबका कोई प्रभाव नहीं है.
दरअसल हमें चरम दक्षिणपंथियों से कहीं ज़्यादा यूरोपियन संघ और ख़ासतौर पर रूस से दिक़्कत है जो कि हर बात को जातीय राष्ट्रवादी विचारधारा और उसकी दलीलों से जायज़ ठहराने की कोशिश में लगा रहता है और रूसी, बेलारूसी और यूक्रेनी इन सबको इस आधार पर एक मानता है जिसमें ख़ुद को इन सबका, संघ का बादशाह. यह भी तो एक तरह का फासीवाद ही है.
क्या जो आपकी स्थिति है, वही यूक्रेन के बाकी लेफ़्टिस्ट की भी है?
वो कहते हैं, "यूक्रेन और रूस में रूस समर्थक लेफ्टिस्ट भी हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि उन्हें लेफ़्टिस्ट कहना सही है. वे स्टालिनिस्ट्स और यूक्रेन की कम्युनस्ट पार्टी हैं. कुछ ऐसा ही उन प्रतिबंधित पार्टियों के साथ भी है जो ख़ुद को लेफ़्टिस्ट बताती हैं लेकिन दरअसल, वे मुख्य रूप से राइट-विंग कंज़रवेटिव हैं या फिर रूस समर्थित नेशनलिस्ट ग्रुप, जो नस्लवाद, पितृसत्ता का समर्थन करते हैं."
रूस में भी कुछ ऐसा ही है.
"रूस के सोशलिस्ट तक ने पश्चिमी देशों के सोशलिस्ट की तरह की ग़लती नहीं की और हमले का विरोध किया."

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लैटिन अमेरिकी देश जैसे क्यूबा, बोलीविया, निकारागुआ और वेनेज़ुएला में वामपंथी सरकारें रूस की सहयोगी हैं और उन्होंने यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा करने से इनकार कर दिया है. इनके लिए आपका क्या संदेश होगा?
इस सवाल पर वो कहते हैं, "मेरा मानना है कि इनमें से अधिकांश सरकारें वामपंथी नहीं हैं. वे सत्तावादी हैं. वे लोकतांत्रिक नहीं हैं और अपने लोगों को दबा रहे हैं."
"आमतौर पर मैं इन देशों और इन देशों की सरकारों को कुछ भी नहीं कहता लेकिन उनके अपने लोगों के लिए उन्हें रूस की नीतियों का विरोध करना चाहिए."
"इन देशों के लोगों के लिए यह ज़रूरी है कि वे अपनी सरकार और रूस के साथ अपनी सरकार के संबंधों का विरोध करें. ताकि ऐसा करते हुए वे अपने देश में लोकतंत्र और समाजवादी नीतियों को बढ़ावा दे सकें."
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