रूस-यूक्रेन जंग: दुनिया के हथियारों के बाज़ार में सबसे बड़ा खिलाड़ी कौन- रूस या अमेरिका

हथियार

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

रूस और यूक्रेन के बीच जंग की असली वजह है 'डर'. रूस को 'डर' है कि यूक्रेन नेटो का सदस्य बनता है तो उसकी सुरक्षा को ख़तरा होगा. वहीं, यूक्रेन को रूस का 'डर' है. इसी 'डर' की वजह से वो नेटो की सदस्यता चाह रहा था और उसका डर, आख़िरकार हक़ीक़त में बदल ही गया.

रूस यूक्रेन की जंग के बीच एक और 'डर' की चर्चा हो रही है - वो है तीसरे विश्व युद्ध की संभावना का 'डर'.

हालांकि इस डर का फिलहाल कोई ठोस आधार नहीं है, लेकिन अलग-अलग देशों ने इस 'डर' के मद्देनज़र रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने का फ़ैसला भी ले लिया है. ताज़ा उदाहरण जर्मनी और चीन का है.

किसी भी बड़ी जंग के डर को दूर करने का दुनिया के मुल्कों के पास एक ही तरीका है - वो है हथियार.

जिस देश के पास हथियारों का जितना बड़ा ज़खीरा है, दुश्मन से लड़ाई में वो देश ख़ुद को उतना ही सशक्त मानता है. इसलिए दुनिया के 'डर के इस बाज़ार' यानी 'हथियारों के बाज़ार' को समझना ज़रूरी है.

ये पाँच देश मिल कर पूरी दुनिया के हथियारों के बाज़ार का 75 फ़ीसदी हिस्सा कब्ज़ाए बैठे हैं.

1- दुनिया को सबसे ज़्यादा हथियार बेचने वाले देश

आइए, सबसे पहले समझें कि विश्व में कौन-कौन से देश हैं, जो दुनिया में हथियारों का कारोबार करते हैं.

अमेरिका, रूस, फ़्रांस, जर्मनी और चीन ये पाँच देश मिल कर पूरी दुनिया के हथियारों के बाज़ार का 75 फ़ीसदी हिस्सा कब्ज़ाए बैठे हैं.

फिलहाल नंबर एक पर अमेरिका है और नंबर दो पर रूस. लेकिन रूस की हसरत भी इस बाज़ार में नंबर एक होने की है.

रूस और यूक्रेन की इस जंग में अमेरिका यूक्रेन के साथ खड़ा है. इस वजह से कई जानकार इस जंग को रूस और अमेरिका की जंग भी करार दे रहे हैं.

फिलहाल अमेरिका और यूरोप के कई दूसरे देश यूक्रेन की हथियारों से मदद कर रहे हैं, जिसकी गुहार ख़ुद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की भी लगा रहे है.

इस वजह से अमेरिका पर ये आरोप भी लग रहे हैं कि वो असुरक्षा के डर के बीच अपने हथियारों के बाज़ार को और बड़ा करना चाहता है.

हथियार के पाँच सबसे बड़े खरीदार

2- सबसे ज़्यादा हथियार खरीदने वाले देश

स्वीडन स्थित थिंक टैंक 'स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट' (सिप्री) की साल 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक़ डर के इस बाज़ार में हथियारों के पाँच सबसे बड़े खरीदार हैं- सऊदी अरब, भारत, मिस्र, ऑस्ट्रेलिया और चीन.

बेचने और ख़रीदने वाले देशों को ग़ौर से देखें तो पता चलता है कि चीन इकलौता ऐसा देश है जिसका नाम सबसे अधिक हथियार बेचने वाले देश और सबसे अधिक हथियार खदीदने वाले देश- दोनों ही लिस्ट में है.

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ राहुल बेदी इसके पीछे की वजह बताते हैं. उनके मुताबिक़, "चीन का एक पुराना आज़माया हुआ फॉर्मूला है. वो पहले दूसरे देशों से हथियार ख़रीदता है और फिर उसको 'रिवर्स इंजीनियर' करके, कुछ बेहतर बनाकर बेचता है."

रिवर्स इंजीनियरिंग का मतलब है, हथियारों को खोलकर उसके पुर्ज़ों को अपने यहाँ दोबारा से तैयार करना. इस प्रक्रिया में चीन उन पुर्जों में अपनी ज़रूरत के हिसाब से कुछ बदलाव भी करता है और फिर या तो इन्हें अपने इस्तेमाल में लाता है या फिर बेच देता है. इस वजह से चीन हथियारों के लिए आयातकों की लिस्ट में भी आगे है और निर्यातकों की लिस्ट में भी.

रूस के हथियारों के टॉप तीन ख़रीदार हैं

3- रूस से हथियार कौन से देश खरीदते हैं

रूस और अमेरिका से हथियार खरीदने वालों की सूची देखें तो पता चलता है कि वे एकदूसरे से बिलकुल अलग हैं.

सिप्री की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ रूस के हथियारों के टॉप तीन ख़रीदार हैं - भारत, चीन, अल्जीरिया. यानी रूस के हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार भारत ही है.

जानकार मानते हैं कि इसी वजह से भारत इस मामले से दूरी बनाए हुए है और खुलकर रूस का विरोध नहीं कर रहा. रूस भारत को हथियारों के साथ-साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में भी मदद करता है. जिस वजह से भारत कुछ चीज़ें अपने देश में भी बना पाता है.

अमेरिका के हथियारों के ख़रीदार देश

4- अमेरिका से हथियार कौन से देश खरीदते हैं

जहाँ तक अमेरिका के हथियारों के ख़रीदार देशों की बात है तो सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया इस सूची में सबसे आगे हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत अमेरिका से हथियार नहीं ख़रीदता. रूस के अलावा भारत अमेरिका, इसराइल और फ़्रांस से भी हथियार खरीदता है.

हाल ही में रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा बुलंद किया है. इस वजह से भी भारत रक्षा क्षेत्र में विविधता लाकर रूस और अन्य मुल्कों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है.

यही वजह है कि भारत खुल कर इस जंग में किसी का पक्ष नहीं ले रहा. भारत ने यदि रूस के विरोध में या फिर यूक्रेन के समर्थन में कुछ कहा तो इससे भारत और अमेरिका की दोस्ती में दरार आ सकती है. इस वक़्त भारत अमेरिका से भी दुश्मनी मोल लेने की स्थिति में नहीं है.

पिछले 10 सालों में रूस और अमेरिका का हथियारों का बाज़ार कितना बदला ( 2011-15 बनाम 2016-20)

5- रूस और अमेरिका का हथियारों का बाज़ार कितना बदला

रक्षा क्षेत्र को लेकर भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे का सबसे ज़्यादा असर रूस पर ही पड़ा है. सिप्री की रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2016-18 के बीच रूस के हथियारों का बाज़ार बहुत बढ़ा था, लेकिन 2019-20 में ये काफ़ी घट गया.

इसमें 53 फ़ीसदी की कटौती भारत की वजह से हुई. इस दौरान भारत ने दूसरे देशों से भी हथियार लिए. हालांकि रूस अब हथियार बेचने के लिए चीन का रुख़ कर रहा है, लेकिन इस घाटे की पूरी भरपाई अब भी नहीं हो पाई है.

पिछले दस सालों में जहाँ अमेरिका के हथियारों का बाज़ार 15 फ़ीसदी बढ़ा है वहीं रूस का 22 फ़ीसदी कम हुआ है.

हालांकि राहुल बेदी कहते हैं कि रूस यूक्रेन जंग के बाद हथियारों के बाज़ार की तस्वीर थोड़ी बदल सकती है.

वो कहते हैं, "अमेरिका के पास पैसा और तकनीक दोनों हैं. इस वजह से वो हथियार के बाज़ार में नंबर एक पर है. रूस के पास कुछ ऐसी तकनीक है जो अमेरिका तक के पास नहीं है. चीन के पास पैसा है और सामान तैयार करने की औद्योगिक क्षमता भी. अगर रूस और चीन ज़्यादा करीब आए, तो हथियारों के बाज़ार में अमेरिका का दबदबा और कितने दिन क़ायम रहेगा, ये कह नहीं सकते."

वीडियो कैप्शन, यूक्रेन के शहरों पर अंधाधुंध रूसी हमले जारी

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