अमेरिका का आरोप- चीन अपने व्यापार से कर रहा दुनिया की कंपनियों का नुकसान

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अमेरिका ने चीन पर अपनी व्यापार नीति से दुनिया भर के श्रमिकों और कंपनियों को 'गंभीर नुकसान' पहुंचाने का आरोप लगाया है.
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने चीन पर व्यापार प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में बार-बार फेल होने का आरोप लगाया.
बुधवार को अमेरिका की व्यापार प्रतिनिधि ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की सदस्यता के लिए चीन और संगठन में हुए समझौते के अनुपालन की वार्षिक समीक्षा जारी की, जिसमें ये बात कही गई.
चीन का कहना है कि वह इस समझौते का समर्थक है और डब्ल्यूटीओ का अहम सहयोगी भी है.
राष्ट्रपति बाइडन के प्रशासन में कैथरीन ताई को शीर्ष अमेरिकी व्यापार वार्ताकार के रूप में नियुक्त किया गया. कैथरीन ताई के पदभार ग्रहण करने के बाद ये पहली रिपोर्ट है. रिपोर्ट में चीन की व्यापार नीतियों के बारे में अमेरिकी चिंताओं को ज़ाहिर किया गया है.
दरअसल, चीन उन उद्योगों को सब्सिडी देता है जिसे वह महत्वपूर्ण मानता है, साथ ही विदेशी कंपनियों के चीन में व्यापार करने की क्षमता पर प्रतिबंध और बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए सुरक्षा की कमी अमेरिका की चिंता का कारण है.
चीन का कहना है कि वह "एक समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहा है" जो बाज़ार की ताक़तों को संसाधनों के आवंटन का निर्धारित करने और सरकार को "बेहतर भूमिका निभाने" का मौका देता है.
रिपोर्ट कहती है, "चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था के लिए राजकीय नेतृत्व और ग़ैर-बाज़ार दृष्टिकोण अपनाया है, वक़्त के साथ चीन के व्यापार में बढ़ोतरी हुई है. और इससे उत्पन्न होने वाले व्यापारिक घाटे ने अमेरिकी कंपनियों और श्रमिकों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है."
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ में चीन के ख़िलाफ़ 27 मुक़दमे किए थे और सभी में अमेरिका की जीत हुई है, इसके बावजूद चीन ने कोई सुधार नहीं किया.
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय में शुरू हुए इस व्यापार युद्ध में दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने एक-दूसरे को आयात और निर्यात होने वाली चीज़ों पर अधिक-से-अधिक टैरिफ़ लगाना शुरू कर दिया था.
इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार में बढ़ोतरी हुई और बीते साल ये बढ़कर 657.4 बिलियन डॉलर हो गया.

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'अमेरिका और चीन के व्यापार से सभी प्रभावित होंगे'
क्रिस मॉरिस बीबीसी के ग्लोबल ट्रेड संवाददाता हैं और दोनों देशों के बीच इस व्यापारिक युद्ध पर लंबे वक़्त से नज़र बनाए हुए हैं.
वे कहते हैं, "चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संबंध यकीनन दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में से एक हैं. ये दुनिया के सभी देशों को प्रभावित कर रहा है, और दोनों देशों के रिश्ते ख़राब ही होते जा रहे हैं."
अमेरिका का कहना है कि चीन अमेरिका से पांच साल पहले की तुलना में कम ख़रीद कर रहा है.
विश्व व्यापार संगठन जैसे बहुपक्षीय व्यापार मंच पर अगर इस द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को देखें तो दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंध आगे की ओर बढ़ते नहीं बल्कि अटके हुए दिखते हैं.
इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि टैरिफ़ से दोनों देशों को कोई लाभ हुआ है, न ही दोनों देशों की ओर से टैरिफ़ खत्म होने के आसार नज़र आ रहे हैं.
अमेरिका और चीन दो बेहद अलग-अलग तरह के आर्थिक प्रणाली वाले देश हैं और दोनों देशों की ये दुश्मनी 21वीं शताब्दी की नई परिभाषा तय करेगी.

क्या पहली फ़ेज़ के ट्रेड डील का असर हुआ?
डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान विश्व व्यापार संगठन में अमेरिकी राजदूत रहे डेनिस शिया ने बीबीसी को बताया कि 2020 में दोनों पक्षों के बीच व्यापार समझौता हुआ.
वे कहते हैं, "पहले फ़ेज के इस समझौते में हमारी कोशिश थी कि चीन अमेरिका के लिए भी वही करे और वही आज़ादी दे जैसा अमेरिका चीन की कंपनियों को व्यापार के संदर्भ में देता है."
"ये रोचक है कि राजदूत ताई और बाइडन प्रशासन अभी भी उसी डील को लागू करने के लिए काम कर रहा है."
साल 2020 में हुए सौदे में, अमेरिका ने चीन पर लगाए गए कुछ टैरिफ कम कर दिए थे और चीन ने 2017 की तुलना में अमेरिका से आयात को 200 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने पर सहमति जताई थी.
चीनी सरकार के प्रवक्ता लियू पेंग्यु ने कहा है कि अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ रहा है और पहले चरण के सौदे से अमेरिका और बाकी दुनिया को फ़ायदा हो रहा है.
उन्होंने कहा कि किसी भी मतभेद को बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है.

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उन्होंने कहा, "कोविड-19, वैश्विक आर्थिक मंदी, आपूर्ति के साथ-साथ अमेरिकी सरकार के निरंतर प्रतिबंधों के बावजूद चीन संयुक्त समझौते पर काम कर रहा है."
वाशिंगटन में पीटरसन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स के चैड बॉउन के शोध के अनुसार चीन ने इनमें से कोई भी अतिरिक्त सामान नहीं ख़रीदा है.
चाड बॉउन ने बीबीसी से कहा, "इस बात का तो कोई संकेत नहीं है कि अमेरिका-चीन व्यापार संबंध कभी भी जल्द ही सुधरेंगे, लेकिन इस बात का भी कोई मतलब नहीं है कि वे ख़राब होने के कगार पर हैं."
"राष्ट्रपति ट्रंप के विपरीत, बाइडन प्रशासन व्यापार युद्ध को फ़िर से बढ़ाने और अरबों डॉलर के व्यापार पर नए टैरिफ लगाने की धमकी नहीं दे रहा है."
ऐसा नहीं लगता कि विश्व व्यापार संगठन इस दोनों देशों के बीच के मतभेद को सुलझाने में सक्षम होगा.
विश्व व्यापार संगठन का मुख्य विवाद समाधान सिस्टम, अपीलीय निकाय साल 2019 दिसंबर से काम करने में सक्षम नहीं है क्योंकि अमेरिका बार-बार नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को रोक रहा है.
यूएसटीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि, "चीन के राजकीय नेतृत्व वाली अर्थव्यवस्था और व्यापार के लिए ग़ैर-बाज़ार दृष्टिकोण से पैदा कई समस्याओं से निपटने के लिए नई रणनीतियों की आवश्यकता है, जिसमें डब्ल्यूटीओ से स्वतंत्र समाधान की ज़रूरत भी शामिल हैं."

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बहुस्तरीय दृष्टिकोण की ज़रूरत
शिया कहते हैं कि अमेरिका में बढ़ता चीनी निर्यात और इसके कारण अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा केवल इसलिए नहीं है कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को सस्ते चीनी सामानों की आदत है.
एक और प्रतिबद्धता जो चीन को दिखानी होगी वो ये है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को उपभोक्ता के खर्च करने की क्षमता के आधार पर तैयार करे.
वे कहते हैं, "असंतुलन का एक हिस्सा यह तथ्य है कि चीन उपभोग-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अब तक नहीं जा सका है. वह अभी भी निर्यात-आधारित, उत्पादन-आधारित अर्थव्य्वस्था है."
पीटरसन इंस्टीट्यूट के चैड बॉउन का कहना है कि अन्य देश भी इसी तरह की चिंताओं को ज़ाहिर कर रहे हैं.
वे कहते हैं, "इसमें यूरोपीय संघ शामिल है, यूरोप ने भी अमेरिका-ईयू व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद के ज़रिए इस चिंता को उठाया है और साथ ही जापान भी इस मु्द्दे को उठा चुका है. इन तीनों ने संभावित नए नियम बनाने के लिए एक 'त्रिपक्षीय' समूह का गठन किया है जो अर्थव्यवस्थाओं के राजकीय-नेतृत्व होने के कारण होने वाली समस्याओं का समाधान कर सके.
बॉउन कहते हैं, "अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में कोई भी सुधार आने में समय लगेगा और शायद केवल उन दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच बातचीत से परिणाम नहीं आएगा, बल्कि अन्य प्रमुख देशों को भी बीच में आना होगा."
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