अमेरिका और चीन के बीच इस एफ़-35 लड़ाकू विमान को लेकर क्यों हो रही है ज़ोर-आज़माइश

    • Author, क्लेयर हिल्स
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, वाशिंगटन

अमेरिकी नौसेना अपने एक दुर्घटनाग्रस्त लड़ाकू विमान की तलाश में युद्ध स्तर पर काम कर रहा है. उसकी कोशिश है कि चीनी सेना के पहुंचने के पहले वो घटनास्थल तक पहुंच जाए.

इससे पहले, सोमवार को अमेरिकी जहाज यूएसएस कार्ल विंसन से उड़ान भरते वक़्त 10 करोड़ डॉलर की लागत वाला अमेरिका का एक एफ़-35सी लड़ाकू विमान दक्षिण सागर में गिर गया.

अमेरिकी नौसेना ने इसे एक "दुर्घटना" बताया है. डेक से टकराने के चलते हुई इस दुर्घटना में सात नाविकों को चोट लगी.

यह अमेरिकी नौसेना का सबसे नया विमान है और इसमें काफ़ी गोपनीय उपकरण लगे हुए हैं. समुद्र में जिस जगह पर ये दुर्घटना जहां हुई, वो स्थान किसी ख़ास देश की सीमा में नहीं आता.

इसलिए वहां दोनों के प्रयास करने पर कोई रोक नहीं है. नियमों के अनुसार, जो देश उसकी तलाश पहले कर लेगा, उस पर उसी का क़ब्जा होगा.

इसका फ़ायदा क्या होगा? ये पूरी क़वायद उस महंगे और आधुनिक लड़ाकू विमान के लिए हो रहा है, जिसमें काफ़ी रहस्य छिपे हुए हैं. एक देश रहस्य जानना चाहता है, तो दूसरा छिपाना.

दुर्घटनाग्रस्त जहाज अब तक कहीं समुद्र की तल में पड़ा है. अब देखना यह है कि आगे क्या होता है. अमेरिकी नौसेना यह नहीं बताएगी कि यह विमान कहां गिरा या इसे खोजने में कितना समय लगेगा.

चीन का दावा- इसमें हमारी कोई रुचि नहीं

उधर, चीन लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर दावा करता रहा है. हाल के कुछ सालों में उस दावे पर ज़ोर देने के लिए चीन ने कई कदम उठाए हैं. वह 2016 में एक अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के दिए फ़ैसले को मानने से इनकार करता है. चीन का कहना है कि इस फ़ैसले का कोई क़ानूनी आधार नहीं है.

गुरुवार को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने उस बात से इनकार किया कि चीन की एफ़-35सी में कोई रुचि है. एक ​प्रेस ​ब्रीफ़िंग में उन्होंने कहा, ''हमें उनके विमानों में कोई रुचि नहीं है.''

इसके बावजूद अमेरिका के सुरक्षा जानकारों का कहना है कि चीन की सेना उस विमान तक पहुंचने की ख़ूब कोशिश करेगी. बचाव का काम करने वाला एक जहाज अभी दुर्घटना स्थल से कम से कम 10 दिन दूर है.

हालांकि रक्षा सलाहकार अबी ऑस्टेन कहती हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है, क्योंकि ब्लैक बॉक्स बैटरी तब डेड हो चुकी होगी. ऐसा होने पर उस विमान का पता लगा पाना काफ़ी मुश्किल हो जाएगा.

अबी ऑस्टेन कहती हैं, "यदि अमेरिका इसकी तलाश कर लेता है, तो उसके लिए यह बहुत बड़ी बात होगी. एफ़-35 असल में उड़ने वाले एक कंप्यूटर जैसा है. इसे दूसरे उपकरणों को जोड़ने के लिए बनाया गया है. इसलिए अमेरिकी वायुसेना इसे 'हमला करने वालों के लिए लिंकिंग सेंसर' कहकर बुलाता है."

वे कहती हैं कि चीन के पास ऐसी तकनीक नहीं है. इसलिए इस विमान को हासिल करना चीन के लिए बड़ी सफलता होगी. चीन ने यदि एफ़-35 की नेटवर्किंग क्षमता हासिल कर ली तो यह अमेरिका के लिए बहुत बड़ा झटका होगा.

क्या दोनों देशों के बीच शीत युद्ध की आहट सुनाई दे रही है, इस पर वे कहती हैं कि यह जताने की कोशिश हो रही है कि सबसे बड़ा दादा कौन है.

एफ़-35सी में ख़ास क्या?

  • इसमें ऐसी सुविधा है कि उड़ान के दौरान जुटाई गई जानकारी उसी समय किसी के साथ शेयर की जा सकती है·
  • यह अमेरिकी नौसेना का पहला "लो ऑब्जर्वेबल" विमान है. इस चलते यह दुश्मन के एयरस्पेस में बिना पकड़ में आए अपना काम कर सकता है.
  • बड़े पंख और अधिक मज़बूत लैंडिंग गियर के चलते यह कम जगह में भी पोत से उड़ान भरने में सक्षम है.
  • लड़ाकू विमानों में इसका इंजन सबसे शक्तिशाली है. यह 1,200 मील प्रति घंटे की गति से उड़ सकता है.
  • इसके पंख पर दो और चार भीतर में मिसाइल लोड हो सकते हैं.

अबी ऑस्टेन के अनुसार, वे मानती हैं कि दुर्घटनाग्रस्त विमान की खोज पर दावा जताने का उसका मक़सद अमेरिका की परीक्षा लेना है. उनका मानना ​​है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की दुखद वापसी के बाद ख़तरनाक वक़्त पर यह दुर्घटना घटी है.

चीनी मामलों के जानकार ब्राइस बैरोस कहते हैं कि इसमें कोई शक़ नहीं है कि चीन इस विमान को पाना चाहता है. उनके अनुसार, साइबर जासूसी से हो सकता है कि उसे इसकी भीतरी बनावट, डिज़ाइन और कामकाज का पहले से ही पता हो.

वे कहते हैं, ''मेरा मानना है कि वे इस विमान के ​पार्ट्स को हक़ीक़त में देखना चाहते हैं कि कैसे इसे बनाया गया और इसकी क्या कमज़ोरियां हैं.''

कैसे खोजा जा रहा है यह विमान?

अमेरिकी नौसेना ने एक बयान में बताया है कि उस दुर्घटना के बाद ही इस विमान को खोजने का अभियान जारी है.

अमेरिकी नौसेना की 'सुपरवाइजर ऑफ़ साल्वेज एंड डाइविंग' की एक टीम कई बैग को इस विमान से जोड़ देगी. उसके बाद इन बैगों को धीरे-धीरे फुलाया जाएगा ताकि मलबे को बाहर खींचा जा सके. लेकिन यह अभियान बहुत मुश्किल हो जाएगा, यदि वो विमान कई टुकड़ों में बंट गया हो.

1974 में जब शीत युद्ध चरम पर था, जब अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने गोपनीय ढंग से चलाए गए एक अभियान में विशाल पंजों के सहारे हवाई के समुद्र तल पर पड़े रूस की एक पनडुब्बी को खींच निकाला था.

दो साल पहले, चीन की सेना ने ब्रिटेन की एक पनडुब्बी एचएमएस पोसीडॉन को गुप्त रूप से निकाल लिया था. यह पनडुब्बी चीन के पूर्वी तट पर डूब गई थी.

कई लोगों का मानना है कि 2011 में ओसामा बिन लादेन के परिसर पर की गई छापेमारी में दुर्घटनाग्रस्त हुए हेलीकॉप्टर के मलबे तक तक चीन गोपनीय ढंग से पहुंच गया.

बैरोस कहते हैं, ''हमें पूरा यकीन है कि चीन की सेना ने उस विमान पर लगे उपकरणों और सॉफ़्टवेयरों को देखा."

गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार, सबसे गहराई में मई 2019 में सफल बचाव अभियान हुआ, तब अमेरिकी नौसेना के एक मालवाहक विमान के मलबे को फिलीपींस सागर से निकाला गया था. यह मलबा समुद्र की सतह से लगभग 5,638 मीटर (18,500 फ़ीट) नीचे पड़ा था.

अमेरिकी विमान के मलबे को लेकर एक सैनिक अधिकारी ने कहा कि एक और विकल्प है. चीन के हाथों में इसे जाने से रोकने के लिए विमान के मलबे को नष्ट कर दिया जाए. लेकिन इस पर अभी विचार नहीं हो रहा है.

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