पाकिस्तानः टीएलपी का लॉन्ग मार्च- क्या अपने ही जाल में फंस गए इमरान ख़ान?

टीएलपी के मार्च को रोकने के लिए रेंजर तैनात किए गए हैं

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, टीएलपी के मार्च को रोकने के लिए रेंजर तैनात किए गए हैं
    • Author, सक़लैन इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख अहमद रशीद ने कहा है कि यदि तहरीक-ए-लब्बैक सरकार से किया अपना वादा नहीं निभाएगी तो हालात काबू से बाहर हो सकते हैं.

प्रतिबंधित धार्मिक सियासी पार्टी टीएलपी लाहौर से इस्लामाबाद मार्च पर अडिग है.

विश्लेषकों का मानना है कि टीएलपी का ये मार्च प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सरकार और पाकिस्तान की सेना के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

सरकार ने टीएलपी के लॉन्ग मार्च को देशविरोधी साज़िश क़रार दिया है और मार्च को रोकने के लिए रेंजर्स तैनात करने का फ़ैसला लिया है.

इसी बीच प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने शुक्रवार को टीएलपी के मार्च से पैदा हुए हालात पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक भी बुलाई है. इसी बीच टीएलपी के मार्च ने गुरुवार को गुजरांवाला को पार कर लिया.

अब सवाल उठ रहा है कि यदि रेंजर्स और टीएलपी कार्यकर्ता आमने-सामने आए तो क्या नतीजे हो सकते हैं. यदि ख़ूनी संघर्ष हुआ तो नतीजे लाल मस्जिद ऑपरेशन जैसे भी हो सकते हैं.

इमरान ख़ान सरकार का दावा है कि टीएलपी का लॉन्ग मार्च का यह छठा प्रयास है. इससे पहले सरकार हर बार टीएलपी के मार्च या धरने को रोकने के प्रति अनिच्छा दिखाती रही है.

क्या है टीएलपी?

टीएलपी का गठन साल 2015 में हुआ था लेकिन ये चर्चा में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज हुसैन क़ादरी की फ़ांसी की सज़ा का विरोध करके आई.

टीएलपी 2017 में फ़ैज़ाबाद में धरना देकर अपनी ताक़त दिखा चुकी है. तब सेना की मध्यस्थता से धरना समाप्त हुआ था.

पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख अहमद राशिद का कहना है कि इस संगठन को वैश्विक आतंकवादी संगठन कहा जा सकता है.

क्यों हो रहा है मौजूदा मार्च

टीएलपी का लांग मार्च

इमेज स्रोत, Getty Images

इस साल अप्रैल में टीएलपी ने फ्रांस के राजदूत को पाकिस्तान से निकालने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था. तब धार्मिक मामलों के मंत्री ने टीएलपी को भरोसा दिया था कि फ़्रांस के राजदूत को वापस भेज दिया जाएगा और धरना समाप्त हो गया था.

दरअसल फ्रांस ने इस्लाम के पैगंबर हज़रत मोहम्मद के कार्टूनों के प्रकाशन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और पाकिस्तान समेत दुनियाभर के मुसलमान बहुल देशों में फ़्रांस के ख़िलाफ़ आक्रोश पैदा हो गया था. टीएलपी ने फ़्रांस के राजदूत को देश से निकालने के लिए प्रदर्शन किए थे.

वहीं यूरोपीय सदन ने एक प्रस्ताव पारित करके पाकिस्तान से यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और उनके प्रतिनिधियों का सम्मान करने के लिए कहा गया था.

टीएलपी के तत्कालीन नेता साद हुसैन रिज़वी को देश की क़ानून व्यवस्था को बिगाड़ने के आरोप में गिरफ़्तार भी किया गया था.

मौजूदा लॉन्ग मार्च फ्रांस के साथ राजनयिक संबंध समाप्त करने और साद रिज़वी की रिहाई की मांग कर रहा है.

रेंजरों की तैनाती

रेंजर

इमेज स्रोत, Getty Images

सरकार ने टीएलपी के मार्च को रेकने के लिए रेंजरों को तैनात किया है लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसके गंभीर परीणाम भी हो सकते हैं.

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब पंजाब प्रांत में रेंजर तैनात किए गए हैं. पूर्वर्ती सरकार ने 2016 हथियारबंद गिरोहों को रोकने के लिए भी रेंजर तैनात किए थे.

रेंजर पाकिस्तान के अर्धसैनिक बल हैं जिन्हें विशेष परिस्थितियों में देश में तैनात किया जाता है. गृह मंत्रालय का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 147 के तहत रेंजर तैनात किए गए हैं.

टीएलपी और लाल मस्जिद

तहरीक लब्बैक पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर मोहम्मद आमिर राणा के मुताबिक लाल मस्जिद और टीएलपी में बड़ा फ़र्क़ ये है कि लाल मस्जिद से जुड़े लोग तालिबान और अल-क़ायदा जैसे समूहों में यक़ीन रखते थे और हमलों के भी हामी थे जबकि टीएलपी के कार्यकर्ता सिर्फ़ सड़कों पर प्रदर्शन करते हैं. टीएलपी कार्यकर्ताओं ने कभी हमले नहीं किए हैं.

राणा कहते हैं कि लाल मस्जिद के लोग अल-क़ायदा जैसे संगठनों से जुड़े थे और बहुत ख़तरनाक़ थे और उनके एजेंडे को पाकिस्तान की आम जनता का समर्थन नहीं था. लेकिन टीएलपी आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है और उसका ख़त्मे नबूबत (मोहम्मद इस्लाम के आख़िरी पैगंबर हैं) के नारे सभी को स्वीकार्य है.

राणा के मुताबिक भले ही टीएलपी आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रीय ना हो लेकिन उसका नारा सभी को स्वीकार्य है. पाकिस्तान की सरकार भी 'रियासत-ए-मदीना' (इस्लाम के पवित्र स्थल मदीना से प्रभावित सरकार) के नारे के साथ हुक़ूमत कर रही है.

आमिर राणा मानते हैं कि यदि टीएलपी के नेता बातचीत से रास्ता निकालते हैं तब भी उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता बढ़ेगी और उनके वोट बैंक में भी वृद्धि होगी और वो भविष्य में मज़बूत चुनौती पेश कर सकेंगे.

इमरान को चुकानी पड़ सकती है कार्रवाई की क़ीमत?

आमिर राणा को लगता है कि यदि पाकिस्तानी रेंजरों ने टीएलपी कार्यकर्ताओं से झड़प की और ख़ून बहा तो इसका ख़ामियाज़ा इमरान ख़ान की सरकार को भुगतना पड़ सकता है.

अभी के माहौल में ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की सेना इस गतिरोध में शामिल नहीं है. आमिर राणा कहते हैं कि यदि इस खेल में सभी खिलाड़ी एक साथ आ गए तब भी ख़ामियाज़ा इमरान ख़ान की तहरीक-ए-इंसाफ़ पाकिस्तान (पीटीआई) को ही चुकाना पड़ेगा.

पाकिस्तान में अन्य राजनीतिक दल भी इस माहौल और रेंजर के ऑपरेशन का फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे.

हालांकि पाकिस्तान की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि इस तरह के धार्मिक आंदोलनों का शांतिपूर्ण समाधान निकालना मुश्किल होता है. जैसे-जैसे धार्मिक समूहों की मांगे मानी जाती है वो और उग्र होते जाते हैं.

राणा कहते हैं, "अहरार या ख़ाकसार तहरीर को देख लें, ये सब लोकप्रिय नारों के साथ शुरू हुईं थीं और कामयाबी के साथ और उग्र होती गईं थीं. अंततः एजेंसियों को ही उनसे निबटना पड़ा."

हो सकते हैं गंभीर परिणाम

वीडियो कैप्शन, आलम ये है कि यहां पुलिसकर्मी तक बंधक बना लिए गए थे.

वहीं इक़रा यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एज़ाज़ हुसैन भट्ट का मानना है कि टीएलपी मसले के समाधान के लिए रेंजरों के इस्तेमाल के गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं.

प्रोफ़ेसर एजाज़ भट्ट को लगता है कि बातचीत ही सही रास्ता है. वो कहते हैं कि "हो सकता है कि सेना ही अंतिम उपाय हो और फिर इसके अपने निहितार्थ होंगे."

पाकिस्तान में हुए पिछले आम चुनावों में टीएलपी पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी थी और धार्मिक समूहों में वोट हासिल करने के मामले में सबसे आगे थी. प्रोफ़ेसर एजाज़ भट्ट मानते हैं कि यदि सरकार ने टीएलपी के ख़िलाफ़ हिंसक कार्रवाई की तो सभी के लिए गंभीर परिणाम होंगे.

प्रोफ़ेसर भट्ट कहते हैं कि टीएलपी के मार्च देश के हितों के भी ख़िलाफ़ है और ऐसे में सरकार को टीएलपी से बात करने के लिए धर्मगुरूओं की समिति बनानी चाहिए.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मोहम्मद ज़ियाउद्दीन को लगता है कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार के पास कोई आसान रास्ता नहीं है.

ज़ियाउद्दीन दावा करते हैं कि 'इसे (टीएलपी) एएचक्यू (सेना मुख्यालय) ने फ़ैज़ हमीद की आईएसआई के ज़रिए मुस्लीम लीग की सरकार पर दबाव डालने के लिए बनाया था."

ज़ियाउद्दीन कहते हैं कि इमरान ख़ान और शेख रशीद ने उस दौर में टीएलपी का समर्थन किया था. उस समय टीएलपी के क़ब्ज़े से फ़ैजाबाद जंक्शन को खाली कराने के लिए मुस्लिम लीग सरकार को हथियार डालने के दस्तावेज़ पर दस्तख़त करने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान: खुद को 'पैग़ंबरे इस्लाम का चौकीदार' कहने वाले खादिम हुसैन रिज़वी कौन हैं?

फ़ैज़ हमीद उस मौक़े पर समझौते के गारंटर थे. ज़ियाउद्दीन दावा करते हैं कि कमांडर ने सार्वजनिक तौर पर टीएलपी कार्यकर्ताओं में पैसे भी बांटे थे.

ज़ियाउद्दीन दावा करते हैं कि टीएलपी को मुस्लिम लीग के वोट बैंक में सेंध मारने के लिए राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत होने का मौका भी दिया गया.

पिछली बार जब टीएलपी सड़कों पर उतरी थी तो सरकार ने उन्हें फ्रांस के राजदूत को हटाने का मुश्किल वादा करके संतुष्ट कर दिया था. लेकिन पाकिस्तान की सरकार के लिए इस वादे को पूरा करना आसान नहीं है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी लॉन्ग मार्च से अपनी सियासी जड़ें मज़बूत की थीं और अपनी पार्टी का देश में विस्तार किया था. अब टीएलपी उन्हीं के खेल में उन्हें चुनौती दे रही है.

मौजूदा संकट से निकलना इमरान ख़ान सरकार के लिए बहुत आसान नहीं होगा. सबसे बड़ी चुनौती शांतिपूर्ण समाधान की है.

इमरान सरकार इस समय बुरी तरह फंसी हुई है. सरकार यदि मांगे मानती हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के लिए मुश्किलें होंगी और यदि रेंजर कार्रवाई करते हैं तो देश के आंतरिक हालात ख़राब होंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)