चीन का 'हाइपरसोनिक टेस्ट' क्या हथियारों की नई रेस की शुरुआत है?

2019 में बीजिंग में एक परेड के दौरान हाइपरसोनिक मिसाइल

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 2019 में बीजिंग में एक परेड के दौरान हाइपरसोनिक मिसाइल
    • Author, जोनाथन मार्कस
    • पदनाम, प्रोफ़ेसर, एक्सेटर विश्वविद्यालय, ब्रिटेन

चीन ने पिछले दिनों परमाणु ताक़त से लैस एक हाइपरसोनिक मिलाइल का परीक्षण किया है. कई लोग इसे एक बड़ी उपलब्धि और हथियारों के क्षेत्र का 'गेम-चेंजर' मान रहे हैं जिससे अमेरिकी अधिकारी भी परेशान हैं.

चीनी सेना ने पिछले कुछ समय में दो बार ऐसे रॉकेट लॉन्च किए हैं जिन्होंने पूरी धरती का चक्कर काटने के बाद अपने टार्गेट को निशाना बनाया. फ़ाइनेनशियल टाइम्स ने पहली बार इससे जुड़ी जानकारी दी, उन्होंने खुफ़िया विभाग के सूत्रों के हवाले से बताया कि पहली बार ये मिसाइल अपने टार्गेट से 40 किलोमीटर दूर रह गई थी.

कई अमेरिकी जानकारों और राजनेताओं को चिंता में डालने वाली इस रिपोर्ट को चीन ने ग़लत बताया. उसने कहा कि ये पुराने अंतरिक्ष यान को फिर से इस्तेमाल करने से जुड़ा टेस्ट था.

कैलिफ़ोर्निया के मॉन्टेरी में मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में ईस्ट एशिया नॉन-प्रोलिफ़रेशन प्रोग्राम के निदेशक जेफ़री लुइस कहते हैं कि चीन का मना करना "भ्रम पैदा करने वाला क़दम है". उनके मुताबिक़ वो ऐसा इसलिए मानते हैं क्योंकि इन जानकारियों को अमेरिकी अधिकारियों ने मीडिया से बात करते हुए सही बताया है.

वो मानते हैं कि चीन द्वारा एक ऑर्बीटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम का टेस्ट करना "तकनीकी और रणनीतिक कारणों से मुमकिन है."

वीडियो लिंक पर हाइपरसोनिक मिसाइल का लॉन्च देखते पुतिन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, वीडियो लिंक पर हाइपरसोनिक मिसाइल का लॉन्च देखते पुतिन

आईसीबीएम और एफ़ओबी क्या हैं?

आईसीबीएम एक लंबी दूरी का मिसाइल है जो धरती के वातावरण को छोड़ देता है और फिर वापस आकर एक पैराबोला की तरह अपने टार्गेट को निशाना बनाता है.

एफ़ओबी यानी फ़्रैक्शनल ऑरबिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम मिसाइल को धरती के चारों तरफ़ एक कक्षा बनाकर किसी भी दिशा से टार्गेट पर निशाना बनाता है.

फ़िलाडेल्फ़िया के फ़ॉरेन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर रिसर्च एरॉन स्टेन कहते हैं, "ख़बर और चीन का इनकार करना, दोनों ही सही हो सकते हैं. फिर से इस्तेमाल होने वाले स्पेस प्लेन एक हाइपरसोनिक ग्लाइडर होते हैं. वो सिर्फ़ लैंड करते हैं. किसी ग्लाइडर से डिलीवर किया गया एक एफ़ओबी सिस्टम वही काम करेगा जो एक फिर से इस्तेमाल किया जाने वाला स्पेस प्लेन, इसलिए दोनों कहानियों में अंतर बहुत कम है."

"पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने चीन द्वारा उठाए गए ऐसे क़दमों की ओर इशारा भी किया है."

एफ़ओबी कोई नया सिस्टम नहीं है. ये सोवियत यूनियन का आइडिया था जो शीत युद्ध के दौरान सामने आया था और चीन अब इसे फिर से आज़माने की कोशिश में है. आइडिया था एक ऐसे हथियार का जो धरती की कक्षा में आंशिक तौर पर घूम कर किसी भी दिशा से हमला कर सके.

ऐसा लगता है कि चीन ने एफ़ओबी तकनीक को हाइपरसोनिक ग्लाइडर के साथ जोड़ दिया है. ये वातावरण के बाहरी किनारे पर तैरते हैं ताकि रडार और मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम से बच सके. चीन ने इन्हें मिलाकर एक नया सिस्टम बना दिया है. लेकिन क्यों?

रूस का अवानगार्ड हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड हथियार

इमेज स्रोत, TASS

इमेज कैप्शन, रूस का अवानगार्ड हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड हथियार

चीन को क्या फ़ायदा होगा?

लुइस कहते हैं, "चीन को डर है कि अमेरिका कई तरह से आधुनिक न्यूक्लियर फ़ोर्स और मिसाइल डिफ़ेंस तकनीक का इस्तेमाल कर सकता है जो कि उनकी न्यूक्लियर डिफ़ेंस की तुलना में बहुत अधिक है."

"अगर कोई ऐसी परिस्थिति आती है और अमेरिका चीन पर पहले हमला करता है तो अलास्का डिफ़ेंस सिस्टम चीन की तरफ़ से बच गए न्यूक्लियर हथियारों का आसानी से सामना कर लेगा."

स्टेन का कहना है कि हर बड़ा देश हाइपरसोनिक सिस्टम बना रहा है, लेकिन हर किसी का नज़रिया इसे लेकर अलग है. उनका कहना है कि इसी नज़रिये के फ़र्क के कारण हथियारों की रेस बढ़ रही है.

उनका मानना है रूस और चीन दोनों ही हाइपरसोनिक सिस्टम को मिसाइल डिफ़ेंस की काट की तरह देखते हैं. वहीं, अमेरिका इसे बड़े ठिकानों जैसे कि न्यूक्लियर कमांड और कंट्रोल सेंटरों पर हमले के लिए तैयार करना चाहता है.

वीडियो कैप्शन, हाइपरसोनिक मिसाइल कैसे काम करती है?

सोवियत यूनियन से तुलना

अमेरिका के न्यूक्लियर आधुनिकीकरण के समर्थक चीन के हालिया टेस्ट को "स्पूतनिक के लम्हे" की तरह देखते हैं जब 1950 में सोवियत यूनियन की पहली ऑरबिटल सैटेलाइट ने अमेरिका को चौंका और डरा दिया था.

लेकिन कुछ जानकार इस बात से सहमत नहीं हैं कि चीन कोई नया ख़तरा पैदा कर रहा है. कार्निज एन्डाउमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस के जेम्स एक्टन कहते हैं कि 1980 के दशक से ही अमेरिका को चीनी परमाणु हमले का डर है.

लेकन चीन, रूस और दक्षिण कोरिया के अमेरिका को हराने के लिए बनाए जा रहे प्रोग्राम को देखकर ये विचार ज़रूर करना चाहिए कि जो पाबंदियां अमेरिका ने लगाई हैं, ख़ासकर रक्षा क्षेत्र में, वो उसके हित में हैं भी या नहीं. लुइस का कहना है कि अभी सबसे ज़रूरी ये है कि अमेरिका एक निष्कर्ष पर पहुंचे.

वो कहते हैं, "मुझे डर है कि ये 9/11 के हमले के बाद वाले हालात की तरह है जब हम चौंक गए थे और डर और निशाने पर होने की भावना से ग़ुजर रहे थे. उसके बाद हमने विदेश नीति से जुड़े कई ऐसे फ़ैसले भी लिए जिसने हमें और भी असुरक्षित बना दिया."

"हमने एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल ट्रीटी से हटने का फ़ैसला किया जो कि चीन के ऐसे सिस्टम बना पाने की वजहों में से एक है."

वीडियो कैप्शन, बनारस के लोग अपने बिंदासपन के लिए ख़ासे मशहूर हैं

अमेरिका के सभी संभावित विरोधी परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण और अपग्रेड की कोशिश में हैं. चीन की क्षमता हालांकि अमेरिका से बहुत कम है, लेकिन लंबे रेंज और सटीक निशाने वाले अमेरिकी मिसाइलों को देखते हुए वो नए और आधुनिक मिसाइल बनाना चाहता है."

उत्तर कोरिया परमाणु क्षमता बेहतर करने पर ज़ोर दे रहा है. लुइस कहते हैं, "पिछले कुछ सालों से उनकी मांग रही है कि उन्हें अमेरिका के बराबर का दर्जा मिले. इसलिए वो अपनी साख बढ़ाने के लिए पहले से आधुनिक परमाणु मिसाइल बनाना चाहते हैं."

ये सब अमेरिका का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं. शीत युद्ध के बाद के ऐग्रीमेंट मददगार साबित नहीं हो रहे, ना ही रूस और चीन से साथ बढ़ती टेंशन.

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ अंकित पांडा का मानना है कि अमेरिका के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि वो हथियारों की सीमाओं पर चर्चा करे.

"मिसाइल डिफ़ेंस पर बातचीत अमेरिका को रूस और चीन से महत्वपूर्ण रियायत पाने में मदद करेगी. इसके अलावा ये उन देशों को महंगे, जटिल और ख़तरनाक परमाणु हथियार बनाने से रोकने में मदद करेगा."

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)