बांग्लादेशी मीडिया में हिन्दुओं पर हमले को लेकर क्या छप रहा है?

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बांग्लादेश के कुमिल्ला शहर में एक दुर्गा पूजा पंडाल में कथित तौर पर क़ुरान रखे जाने के बाद दुर्गा पूजा पंडालों और हिंदू मंदिरों पर सिलसिलेवार हमले हुए.
इन हमलों के बाद शुक्रवार को कई रैलियों के दौरान देश के कई हिस्सों में हिंसा हुई. इन हमलों हिन्दू घरों को निशाने पर लिया गया और पाँच लोगों की मौत हुई है.
इस हिंसा के बाद प्रधानमंत्री शेख़ हसीना पर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं. हिंसा को जल्द से जल्द न रोक पाने पर प्रधानमंत्री हसीना की आलोचना भी हो रही है.
वहीं, इन हमलों और हिंसा की घटनाओं पर भी बांग्लादेशी मीडिया काफ़ी कुछ लिख रहा है.
'ढाका ट्रिब्यून' अख़बार ने तो खुलकर संपादकीय लिखा हैं. अपनी संपादकीय टिप्पणी में उसने सत्ता से सवाल पूछा है कि क्या हम सेक्युलर सोसाइटी अब नहीं रहे और क्या अब इस देश में अल्पसंख्यकों के लिए जगह नहीं है.
इसके अलावा 'द डेली स्टार' और 'द डेली ऑब्ज़र्वर' जैसे अख़बारों ने भी अपने संपादकीय के ज़रिए सवाल पूछे हैं.
'अल्पसंख्यकों के लिए देश नहीं बचा'
बांग्लादेश के बड़े अंग्रेज़ी अख़बारों में से एक 'ढाका ट्रिब्यून' ने सोमवार को एक संपादकीय लिखा था जिसका शीर्षक था, 'अल्पसंख्यकों के लिए देश नहीं बचा.'
अख़बार लिखता है कि इस अख़बार ने पिछले सप्ताह संपादकीय लिखकर उम्मीद जताई थी कि इस साल दुर्गा पूजा पर काफ़ी प्रबंध हैं और सुरक्षा सुनिश्चित होगी और इस साल हिंदू आबादी पूजा और त्योहार के दौरान सुरक्षित महसूस करेगी लेकिन एक बार फिर दुर्भाग्यवश हमें यह लेख लिखना पड़ रहा है."
"आशावादी नज़रिए से हम नहीं लिख रहे हैं बल्कि निराशावश लिख रहे हैं कि बांग्लादेश में शरारती तत्वों ने हिंदुओं पर हमला करके जघन्य काम किया है जिससे दुख है. कई मामलों में बौद्ध समुदाय पर भी हमले हुए."
"हिंदू मंदिरों, पूजा पंडालों, बौद्ध लोगों के घरों या इसाइयों के काम करने की जगहों या जहां कहीं भी सांप्रदायिक हिंसा हुई है और जहां पर अल्पसंख्यक आबादी को नफ़रत के इरादे से निशाना बनाया गया है, उसने हमारे राष्ट्र को कमज़ोर ही किया है. इसने हमारे लोगों में विभाजन पैदा किया है और समुदायों के बीच शत्रुता को जगह दी है."

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इस लेख में आगे लिखा गया है कि 'यह बहुत लंबे समय से चल रहा है और सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के मामले में जो हमने अब तक किया है, वो वापस हर साल हमारे सामने आ जाता है. जिन्होंने ये हमले किए उनकी पहचान की जाए और उन्हें गिरफ़्तार किया जाए. इसके साथ ही इसको पहली बार जिसने भड़काया उन्हें भी पकड़ा जाए और केवल यही काफ़ी नहीं है.'
"इस तरह की अफ़वाहें हैं कि देश को अस्थिर करने के लिए यह योजना बनाई गई और कई ग़लतफ़हमियों को लेकर भी बात है लेकिन जो भी कारण रहे हों. यह हमारी अल्पसंख्यक जनता है, जिसको सहना पड़ा है और हमारे लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ ठोस कार्रवाई करनी होगी."
"बांग्लादेश तरक़्क़ी कर रहा है और हम विकासशील दुनिया के लिए एक नमूना हैं. लेकिन क्या हम इस बात को लेकर गंभीर हैं कि किसी भी पृष्ठभूमि का व्यक्ति इस राष्ट्र में सुरक्षित महसूस करेगा, क्या हम वास्तव में विकास कर पाएंगे. इस स्तर पर बांग्लादेश एक ऐसा देश लग रहा है, जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं है जबकि हमारे देश की नींव धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर रखी गई है."

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'क्या हम एक धर्मनिरपेक्ष समाज हैं?'
'ढाका ट्रिब्यून' में बुधवार को ही एक और संपादकीय प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है, 'क्या हम एक धर्मनिरपेक्ष समाज हैं?'
फ़ेनी यूनिवर्सिटी के क़ानून विभाग के लेक्चरर सख़ावत सज्जात सेजन ने यह लेख लिखा है, जिसमें कहा गया है कि अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा में नाकाम रहने पर राष्ट्र की क्षमताओं पर सवाल खड़े हो गए हैं.
लेख में लिखा गया है कि मानवाधिकार संधियों के लिए तीन बुनियादी दायित्वों को पूरा करना ज़रूरी होता है, इनमें सम्मान, सुरक्षा और उनको पूरा करना शामिल है लेकिन बांग्लादेश में हालिया परिदृश्य में मानवाधिकार के दो दायित्वों को पूरा नहीं किया गया है.
"जिस तरह से हिंदू समुदायों के साथ उनके सबसे बड़े त्योहार के दौरान बर्बरता, यातना, संघर्ष और हत्या हुई है, उसने साबित किया है कि बांग्लादेश एक राष्ट्र होने के नाते नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकार पूरा करने में नाकाम रहा है."

"सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक असहिष्णुता लापरवाही या अदूरदर्शिता का नतीजा है, जिसको बांग्लादेश का संविधान अनुमति नहीं देता है. धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता बांग्लादेश के संविधान के चार बुनियादी ढांचों का हिस्सा है. धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी संरचना होने के नाते सरकार बिना किसी धार्मिक भेदभाव के लिए धर्मनिरपेक्ष कल्याण के लिए काम करेगी."
लेख में आगे है कि बांग्लादेश के संविधान में जस्टिस लुत्फ़ुर रहमान की एक टिप्पणी भी शामिल है, जिसमें कहा गया है कि धर्म हर किसी का व्यक्तिगत मामला है इसलिए राष्ट्र को केवल धर्म को एक व्यक्तिगत पहचान के तौर पर ही देखना चाहिए.
'हिंदू दुर्गा की ऐसी विदाई नहीं चाहते थे'
बांग्लादेश के एक और बड़े अख़बार 'द डेली स्टार' ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है, 'हिंदू भक्त दुर्गा को ऐसी विदाई नहीं देना चाहते थे.'
लेख में है कि इस तरह की तस्वीर लोगों के लिए जानी-पहचानी भी है और नहीं भी है.

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इसमें लिखा गया है कि बांग्लादेश में एक समुदाय के ख़िलाफ़ 'इस्लाम का अपमान' करने का आरोप लगाते हुए हिंसा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.
"मानवाधिकार संगठन एन ओ सलिश केंद्र के अनुसार बीते नौ सालों में हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ कम से कम 3,710 हमले हुए हैं."
"हिंदू परिवारों को उनके सबसे बड़े त्योहार के समय बर्बरता और अन्य प्रकार की यातनाओं से सुरक्षा न दिला पाना भी प्रशासन की नाकामी है जो कि धर्मनिरपेक्षता को कायम रखने की नाकामी को भी दिखाता है. क्या कोई राष्ट्र अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी को नकार सकता है?"
एक दूसरे बड़े अंग्रेज़ी अख़बार 'द डेली ऑब्ज़र्वर' ने 'साम्प्रदायिक सद्भाव बचाओ' शीर्षक से संपादकीय लिखा है.

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इसमें लिखा गया है, "सांप्रदायिक बैर इस समय वैश्विक संकट है. यह सभ्यता की शुरुआत से ही मानवता को प्रभावित कर रहा है. अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक समुदाय से ख़तरा महसूस करते हैं. परिस्थिति ऐसी है कि अल्पसंख्यक समूह इस समाज में असमानताओं का सामना करने के लिए पैदा हुआ है."
"धार्मिक और नस्लीय संघर्ष दुनिया में व्यापक रूप से फैल रहे हैं. इन दिनों कमज़ोर राष्ट्रों में यह आराम से देखा जा सकता है. कई मामलों में दुनिया में हाशिए पर मौजूद समुदायों को इंसाफ़ भी नहीं मिल पाता है."
लेख में आगे बताया गया है कि कैसे बांग्लादेश में सांप्रदायिक भेदभाव पैदा हुआ है और इसमें कहा गया है कि साज़िशकर्ताओं को सज़ा देकर ही मामले को समाप्त किया जा सकता है और देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए यह आवश्यक है कि हर नागरिक सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ाए.
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