चीन की नई आर्थिक नीति का पूरी दुनिया पर कैसे होगा असर

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    • Author, करिश्मा वासवानी
    • पदनाम, बीबीसी एशिया संवाददाता

चीन का कहना है कि उसकी नई आर्थिक नीतियां लोगों के बीच संपत्ति की बढ़ती खाई को कम करने के इरादे से बनाई गई हैं, और मौजूदा वक्त में यह उसकी आर्थिक विकास के अनुकूल है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह चीनी सरकार का नया तरीक़ा जिससे वह देश में व्यापार और समाज को अधिक नियंत्रित कर सकती है.

चीन का नया 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' (यानी साझा समृद्धि) अभियान पूरी तरह से देश में रहने वालों को लेकर बनाया गया है लेकिन इसका बड़ा असर बाकी दुनिया पर भी होने की संभावना है.

इस नीति के सबसे स्पष्ट परिणामों में से एक ये है कि इससे चीनी व्यवसाय का पूरा ध्यान एक बार फिर घरेलू बाज़ार पर केंद्रित होगा.

हाल के वक्त में लगातार अपना वैश्विक कद बढ़ाने वाली चीनी कंपनी अलीबाबा ने अब सरकार की 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' मुहिम के तहत 15.5 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है. कंपनी ने इसके लिए एक टास्क फ़ोर्स भी बनाई है जिसका नेतृत्व कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी डेनियल ज़ांग करेंगे.

कंपनी का कहना है कि देश की आर्थिक वृद्धि के ये लिए फ़ायदेमंद होगा. कंपनी ने कहा है, "अगर समाज आर्थिक रूप से मज़बूत होगा और देश की अर्थव्यवस्था बेहतर होगी तो अलीबाबा भी बेहतर काम कर सकेगी."

देश की अन्य बड़ी टेक कंपनी टेन्सेंट भी इस मुहिम में शामिल हो रही है. इस नए अभियान के तहत कंपनी ने 7.75 अरब डॉलर का निवेश किया है.

नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक चीनी कंपनी ने मुझे बताया था कि कंपनियां ये दिखाने को उत्सुक हैं कि वे चीनी सरकार की ताल से ताल मिलाकर काम कर रही हैं, लेकिन शुरूआत में जब देश की कई कंपनियों ने सार्वजनिक तौर पर शी जिनपिंग की इस नई योजना का समर्थन किया था तो ये उनके लिए ये 'एक झटके' की तरह था.

कंपनी ने कहा, "लेकिन अब हम इस विचार को समझ पा रहे हैं. यह अमीरों को लूटने के बारे में नहीं है, बल्कि यह समाज के पुनर्गठन और मध्यवर्ग के पुनर्निर्माण के बारे में है. हम एक कंज़्यूमर बिज़नेस का हिस्सा हैं- और इसलिए यह हमारे लिए अच्छा है."

अलीबाबा के वरिष्ठ अधिकारी डेनियल ज़ांग

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लग्ज़री सेक्टर का होगा नुक़सान

लेकिन अगर 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' का मतलब चीन के मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिति में बेहतरी लाना है तो ये उन कंपनियों के लिए वरदान साबित हो सकता है जो इन नए ग्राहकों तक पहुंचना चाहती हैं.

चीन के ईयू चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष जॉर्ज वत्के कहते हैं, ''हम देख सकते हैं कि नौजवानों को नौकरी मिले योजना में इस पर विशेष ध्यान है.''

"अगर उन्हें लगता है कि वो इस देश में सामाजिक प्रगति का हिस्सा बन सकते हैं तो यह हमारे लिए अच्छा है, क्योंकि जब मध्यवर्ग आगे बढ़ता है, तो अवसर भी अधिक मिलते हैं."

हालांकि जॉर्ज वत्के कहते हैं कि हो सकता है कि जो व्यवसाय लग्ज़री सेक्टर से जुड़े हुए हैं उन्हें सरकार के इस कदम से नुक़सान हो.

वो कहते हैं, "वैश्विक स्तर पर लग्ज़री सामान की खपत के मामले में दुनिया में चीन की हिस्सेदारी लगभग 50 फीसदी है. और अगर चीन की धनी वर्ग स्विस घड़ियाँ, इतालवी टाई और यूरोपीय लग्ज़री कार ना खरीदने का फ़ैसला कर लें तो इस सेक्टर को नुक़सान होगा."

लेकिन वत्के ये स्वीकार करते हैं कि एक आम चीनी व्यक्ति की कमाई बढ़ाने के लिए चीनी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' मुहिम इस उद्देश्य तक पहुंचने का सबसे प्रभावी तरीका नहीं है.

चीन में ब्रिटिश चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष स्टीवन लिंच भी मानते हैं कि 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' अभियान इस बात की गारंटी नहीं देता कि जिस तरह मध्यवर्ग बीते चौर दशकों में बढ़ता रहा है वैसे ही आगे भी बढ़ता रहेगा.

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चीन में लग्ज़री ब्रांड

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पिछले कुछ दशकों में चीनी अर्थव्यवस्था का विस्तार जिस तेज़ी से हुआ है, स्टीवन उसके बारे में बताते हैं, ''तीस साल पहले एक चीनी परिवार महीने में एक बार डंपलिंग खा सकता था (चीनी खाना जिसे भारत में मोमोज़ के तौर पर भी जानते हैं). बीस साल पहले, वो सप्ताह में एक बार डंपलिंग खाने का खर्च उठा सकते थे, दस साल पहले डंपलिंग खरीदने की क्षमता हर रोज़ में बदल गई. अभी का वक्त ऐसा है जब वो कार खरीदने में सक्षम हैं.''

लेकिन लिंच कहते हैं कि अलीबाबा और टेन्सेंट जैसी बड़ी कंपनियों ने कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोन्सिबिलिटी के तहत इस अभियान को समर्थन देने का फ़ैसला तो किया है, लेकिन इसके अलावा अब तक इस दिशा में कुछ ठोस नहीं हो पाया है.

टेक कंपनियों पर हाल में हुई सरकारी कार्रवाई का ज़िक्र कहते हुए लिंच कहते हैं, "बहुत सारे क्षेत्रों में कई सेक्टर के लिए नियम तत्काल बनाए गए हैं, इससे अनिश्चितता बढ़ी है. सवाल उठता है कि यदि सरकार घरेलू और देश के भीतर के बज़ार की तरफ अधिक ध्यान देना चाहती है तो क्या उन्हें वास्तव में बाकी दुनिया की आवश्यकता भी है?"

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चीन का नया 'समाजवाद'

'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' यानी साझी समृद्धि का मतलब है समाज को और न्यायसंगत और बराबर बनाना. कम से कम कम्युनिस्ट पार्टी के अनुसार इसकी यही परिभाषा है. पार्टी के अनुसार इसमें वैश्विक स्तर पर समाजवाद के मायने को बदलने की शक्ति है.

बीजिंग के सेंटर फ़ॉर चाइना एंड ग्लोबलाइज़ेशन के वांग हुयाओ कहते हैं, "पार्टी को अब आम श्रमिकों की चिंता है- जैसे कि टैक्सी ड्राइवर, प्रवासी मज़दूर और डिलीवरी बॉय."

''चीन समाजिक धुव्रीकरण से बचना चाहता है जैसा कि पश्चिमी देशों में दिखता है और जिस कारण वैश्वीकरण का असर पलट सकता है.''

लेकिन लंबे समय से चीन से जुड़े मामलों पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि अगर पार्टी का मकसद है कि वो समाजवाद को एक अलग चीनी छवि दे और इसे दुनिया के सामने एक विकल्प की तरह पेश करे तो 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' इसका सही तरीका नहीं हो सकता.

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में चाइना सेंटर में सहयोगी जॉर्ज मैग्नस कहते हैं, "यह शी जिनपिंग का और अधिक नियंत्रण की ओर तेज़ी से बढ़ता वामपंथी तरीक़ा है. उन्होंने प्रगतिशील करों को लेकर कोई क़दम नहीं उठाया है."

मैग्नस कहते हैं कि 'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' का मतलब यूरोपीय शैली के सामाजिक कल्याण मॉडल की नकल करना बिलकुल नहीं है.

वो कहते हैं, "फिलहाल पार्टी के उद्देश्यों को पूरा करना प्राथमिक उद्देश्य लग रहा है. अधिक कमाई पर अधिक टैक्स लगाया जाएगा, साथ ही निजी कंपनियों पर दवाब होगा कि वो पार्टी के उद्देश्यों के लिए डोनेट करें. लेकिन विकासशील टैक्स को लेकर कुछ नहीं किया गया है."

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यह स्पष्ट है कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन पर कैसे शासन किया जाएगा, ये इन नई आर्थिक नीति का एक प्रमुख हिस्सा है.

'कॉमन प्रॉस्पेरिटी' के साथ सरकार एक अधिक समानता वाले समाज का वादा कर रही है, जिसमें एक बड़ा और संपन्न मध्यवर्ग होगा और ऐसी कंपनियां होंगी जो लेने के बजाय समाज को वापस देने का काम करेंगी.

ये एक तरह का आदर्श देश बनाने की बात है और पार्टी उम्मीद कर रही है दुनिया के लिए एक व्यवहारिक वैकल्पिक मॉडल साबित होगा जो पश्चिम देशों के मॉडल से अलग होगा.

लेकिन क्या यह एक चाल है जिससे अधिक नियंत्रण और शक्ति पार्टी के हाथों में चली जाएगी?

विदेशी कंपनियों के लिए चीन हमेशा से एक मुश्किल बाज़ार रहा है, और इस नई नीति का मतलब होगा कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में इन कंपनियों के लिए मुश्किलें और बढ़ेंगी.

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