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चीन में #MeToo मुहिम वाली वो महिला, जिन्हें चुप कराने कोशिश हो रही है
- Author, जाओयिंग फेंग और टेसा वॉन्ग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, वॉशिंगटन और सिंगापुर से
जियांज़ी थकी हुई लगती हैं. बीजिंग से फ़ोन पर बात करते हुए वो बीबीसी से कहती हैं, "सॉरी, मैं पिछले आधे घंटे से रो रही हूँ."
यह चीन के सबसे बड़े सितारों में से एक पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप पर अदालत के फ़ैसले का दूसरा दिन है.
अदालत ने जियांज़ी की अपील को यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनके पास यौन उत्पीड़न को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं.
यह वही मामला था जिसने जियांज़ी को चीन में यौन उत्पीड़न के खिलाफ़ छिड़ी ऑनलाइन मुहिम #MeToo का चेहरा बना दिया था.
मगर अब तीन साल बाद अदालत ने उनकी अपील ठुकरा दी है.
'नारीवादियों को एक-दूसरे से दूर करने की कोशिश'
बीबीसी से बात करने से पहले जियांज़ी ने चीनी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म वीबो पर अपनी एक समर्थक से संपर्क करने की कोशिश की थी लेकिन अदालती फ़ैसले के दूसरे ही दिन उन्हें वीबो पर पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया था.
जियांज़ी की समर्थक को भी वीबो पर ब्लॉक कर दिया गया है. वजह- वो जियांज़ी के पक्ष में खुलकर बोल रही थीं.
यह जानकर जियांज़ी की आँखों में आँसू आ गए कि अब उन्हें अपने ऑनलाइन समर्थकों से भी दूर कर दिया गया है.
वो बताती हैं, "लोगों के अकाउंट लगातार सस्पेंड किए जा रहे हैं. मेरे लिए उनसे संपर्क करने का कोई और तरीका नहीं है. मैंने उन्हें शुक्रिया कहने का मौका भी खो दिया है."
जियांज़ी कहती हैं कि पिछले तीन वर्षों में सिर्फ़ चीन की नारीवादियों को एक दूसरे से अलग किया गया है.
आवाज़ उठाने वाली महिलाओं का लगातार दमन
साल 2018 में जब #MeToo अभियान चीन पहुँचा तब जियांज़ी उन कई महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने अपने यौन उत्पीड़न की बात सबके सामने रखी.
उनका असली नाम ज़ोऊ जियाओजुअन है लेकिन वो जियांज़ी नाम से लोकप्रिय हैं.
जियांज़ी ने 3,000 शब्दों के एक लेख में सरकारी समाचार चैनल सीसीटीवी के होस्ट ज़ू जुन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया.
जियांज़ी का लेख वायरल हो गया था. उन्होंने बताया था कि जब यह घटना हुई, उस समय वो 21 साल की एक इंटर्न थीं और ज़ू जुन का इंटरव्यू मिलने की उम्मीद में उनके ड्रेसिंग रूम में गई थीं.
उस समय ज़ू जुन चीन में लाखों लोगों के चहेते टीवी होस्ट थे और वो स्प्रिंग फ़ेस्टिवल का सालाना इंवेट पेश करते थे.
जियांज़ी ने एक अन्य लेख में बताया था कि कैसे जुन उन्हें करीब 50 मिनट तक ग़लत तरीके से छूते रहे और उनके मना करने के बावजूद उन्हें जबरन किस किया.
जियांज़ी का कहना था कि इस दौरान कई बार लोग उस कमरे में आए और गए लेकिन वो डर और शर्म से इस कदर जम गई थीं कि किसी को इस बारे में बता नहीं पाईं.
जियांज़ी के मुताबिक़ वो तभी कमरे से बाहर निकल पाईं जब जुन एक क्रू मेंबर से बात करने लगे और उनका ध्यान भटक गया.
उन्होंने लिखा था, "मुझे डर था कि अगर में ज़ू जुन के ख़िलाफ़ बोलूँगी तो इससे मेरी पढ़ाई पर असर पड़ेगा. इसलिए मैं लड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई."
'पुलिस ने चुप रहने को कहा क्योंकि...'
ज़ू जुन ने इन आरोपों से लगातार इनकार किया है. उन्होंने कहा कि वो एक अपमानजनक मुहिम के 'शिकार' हैं और उन्होंने "बेहद शर्मिंदगी" झेली है.
जियांज़ी का कहना है कि इस घटना के अगले दिन वो पुलिस के पास गई लेकिन उन्हें चुप रहने को कहा गया क्योंकि जुन उस समय चीन में "सकारात्मक ऊर्जा" की राष्ट्रीय मिसाल थे.
दरअसल जुन को उस दौरान एक सरकारी अभियान का हिस्सा बनाया गया था जिसका मक़सद लोगों में अच्छे बर्ताव को बढ़ावा देना था.
जियांज़ी के मुताबिक़ पुलिस का कहना था कि जुन एक ऐसे शख़्स थे जिनकी प्रतिष्ठा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता था.
इसलिए वो तब तक चुप रहीं जब तक #MeToo नहीं शुरू हुआ.
मानहानि का मुक़दमा
यह मामला तब और ज़्यादा चर्चा में आ गया जब जुन ने जियांज़ी पर मानहानि का मुक़दमा कर दिया. तब से जियांज़ी की पूरी ज़िंदगी ही बदल गई.
वुहान के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी जियांज़ी 18 साल की उम्र में ही फ़िल्म निर्देशन की पढ़ाई करने बीजिंग आ गई थीं. उस समय वो एक स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर काम भी कर रही थीं.
इस घटना के बाद से जियांज़ी को काम छोड़ना पड़ा और पिछले तीन वर्षों से वो अपनी बचत और फ़्रीलांस लेखन से होने वाली अनियमित आय के सहारे गुज़ारा कर रही हैं.
राहत की बात यह है कि उनके वकील ने इस क़ानूनी लड़ाई के दौरान उनसे मामूली फ़ीस ही ली.
जियांज़ी ने अपना ध्यान क़ानूनी लड़ाई और यौन उत्पीड़न की अन्य पीड़िताओं के लिए आवाज़ उठाने पर केंद्रित किया.
यौन उत्पीड़न की शिकार कई महिलाएं सोशल मीडिया के ज़रिए उनसे मदद भी माँगती थीं और उनके तीन लाख से ज़्यादा फ़ॉलोअर हो गए थे.
'#MeToo मुहिम चीन के ख़िलाफ़ विदेशी ताकतों की साज़िश'
दूसरी तरफ़, सोशल मीडिया पर उनकी गतिविधियाँ रोकने को चीनी अधिकारियों की कोशिशें भी तेज़ हो गईं.
जियांज़ी को वीबो पर कुछ भी पोस्ट करने से रोक दिया गया है. इतना ही नहीं "राइस बनी" (#MeToo अभियान के लिए चीन में प्रचलित शब्द) को भी सोशल मीडिया से हटा दिया गया है.
पहले तो जियांज़ी ने अपना लेख अपने समर्थकों को भेजकर पोस्ट करवाया लेकिन फिर उनके समर्थकों के अकाउंट भी सस्पेंड किए जाने लगे.
हाल के दिनों में जियांज़ी की आलोचना और उन पर होने वाली व्यक्तिगत टिप्पणियाँ भी बढ़ गई हैं. कुछ राष्ट्रवादी ब्लॉगर्स ने विवाद पैदा करने के लिए उन पर 'झूठ बोलने' और 'विदेशों ताकतों के साथ गलबहियाँ करने' का आरोप लगाया है.
इसी हफ़्ते चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में जियांज़ी के मामले पर छपी एक टिप्पणी में कहा गया था कि विदेशी ताकतें चीनी समाज को बाँटने के लिए #MeToo मुहिम का इस्तेमाल कर रही हैं.
अदालत के फ़ैसले के पीछे क़ानूनी कारण?
इसके बाद जियांज़ी को क़ानून की तरफ़ से भी झटका लगा. जियांज़ी का कहना है कि एक नया क़ानून आने के बाद अदालत ने उनके मामले को यौन उत्पीड़न का मुक़दमा मानने से इनकार कर दिया.
जियांज़ी का यह भी कहना है कि मुक़दमे के दौरान अदालत ने उन्हें अपनी बात रखने के कम मौके दिए और जब उन्होंने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के 'सबूत' (जैसे कि ड्रेसिंग रूम के बाहर का वीडियो फुटेज और जुन के साथ उनकी मुलाकात की तस्वीर) दिखाने की कोशिश की तो उन प्रयासों में रुकावट डाली गई.
साल 2014 में जियांज़ी ने सबूत के तौर पर वो ड्रेस पेश की जो उन्होंने जुन से मुलाकात के दिन पहनी थी.
ड्रेस की शुरुआती जाँच में उस पर जुन के डीएनए के कोई निशान नहीं मिले तो उन्होंने दोबारा जाँच की अपील की. इस पर अदालत में कहा गया कि उनकी ड्रेस "मिल नहीं रही है."
जियांज़ी ने बताया कि अदालत में उनसे यहाँ तक कहा गया कि जुन पर बयान देने का दबाव डालना ग़ैरज़रूरी था.
चीनी क़ानून के विशेषज्ञ डैरियस लॉन्गैरिनो ने बीबीसी से कहा कि उन्हें अदालत का तर्क पर्याप्त मज़बूत नहीं लगा.
चीन के कुछ लोगों का मानना है कि अदालत के इन फ़ैसलों के पीछे राजनीतिक कारण थे.
'मैं बहुत थक चुकी हूं...'
उधर, जियांज़ी पर मानहानि का मुक़दमा भी चल रहा है जिसमें 1 लाख डॉलर मुआवज़े की माँग की गई है.
बीबीसी ने इस मामले में ज़ू जुन और उनके वकीलों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं मिला.
इस पूरे घटनाक्रम ने जियांज़ी को बुरी तरह प्रभावित किया है. पिछले हफ़्ते उनके समर्थकों ने एक वीडियो शेयर किया था जिसमें वो अदालत से निकलने बाद निराश नज़र आ रही हैं.
वो कहती हैं, "जब ये सब हुआ तब मैं 21 साल की थी. अब मैं 28 साल की हूँ, मैं बहुत थक चुकी हूं...मुझे नहीं मालूम कि मैं तीन साल और लड़ने की हिम्मत जुटा पाऊंगी या नहीं."
जियांज़ी ने बीबीसी को बताया कि वो कई बार यह सोचकर घबरा जाती हैं कि इतना सब होने के बाद क्या वो कभी अपना करियर दोबारा पा सकेंगी.
वो बताती हैं कि जब उन्हें ज़्यादा घबराहट होती है तो वो फ़िल्म देखकर या नींद की एक झपकी लेकर अपना ध्यान भटकाने की कोशिश करती हैं.
उनके एक्टिविस्ट दोस्त, उनका परिवार और उनका बॉयफ़्रेंड, इन सभी लोगों ने उन्हें ज़रूरी भावनात्मक सहारा दिया है.
वैसे जियांज़ी के लिए सबसे अच्छी थेरेपी लिखना और अपने दोस्तों से बात करना है.
वो कहती हैं, "बात करना जख़्मों पर मरहम लगाने जैसा होता है और यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बोलने से रोका जाना इतना दुखद क्यों है."
वो कहती हैं, "अगर आप लोगों को दुखी होने पर बोलने से रोकते हैं को इसका मतलब है कि आप उन्हें ख़त्म करना चाहते हैं. मुझे समझ नहीं आता है कि मैंने क्या ग़लती की है. वो मुझे क्यों ख़त्म करना चाहते हैं?"
क़ानून का भारी बोझ
जियांज़ी का मामला हाल के हफ़्तों में यौन उत्पीड़न से जुड़ा ऐसा दूसरा मामला है जिसे चीन की अदालत में ख़ारिज कर दिया गया.
इससे पहले चीनी अदालत ने मशहूर टेक कंपनी अलीबाबा के एक मैनेजर के ख़िलाफ़ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोपों को ख़ारिज कर दिया था.
मैनेजर पर उनकी एक सहकर्मी से उस समय बलात्कार करने का आरोप था जब वो नशे में थीं.
पुलिस की जाँच में सामने आया था कि मैनेजर ने अपनी सहकर्मी के साथ "अश्लील हरकतें" की थीं. इसके बाद उन्हें कंपनी से निकाल दिया गया था और 15 दिनों के लिए हिरासत में रखा गया था.
चीन में यौन उत्पीड़न के बहुत कम मामलों को ही अदालत में जीत मिल पाई है.
यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए पीड़ित पक्ष को अदालत में कई तरह के ठोस सबूत देने होते हैं जैसे कि अपराध से जुड़े वीडियो या तस्वीरें.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस क़ानून के कारण अपने साथ हुए अपराध को साबित करने का बोझ पीड़िताओं पर ही आ जाता है.
नतीजन, कुछ पीड़िताएं अपनी आपबीती सोशल मीडिया पर लिखती हैं क्योंकि आम तौर पर दफ़्तरों में उनके साथ हुए अपराध को लेकर ज़रूरी कार्रवाई नहीं की जाती.
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की रिसर्च फ़ेलो कहती ऐरॉन हालेगुआ कहती हैं कि सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती लिखना पीड़िताओं की मजबूरी है क्योंकि उनके पास लोगों के सामने अपनी बात रखने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता.
वो कहती हैं, "इससे साबित होता है कि चीन में संस्थाएं कैसे पीड़िताओं की शिकायत पर कार्रवाई में असफल हैं क्योंकि अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की ओर ध्यान दिलाने के लिए किसी महिला को इसे वीबो पर लिखने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए."
सोशल मीडिया पर यौन उत्पीड़न से जुड़ी बातें लिखने की वजह से अभियुक्त पीड़िताओं पर मानहानि का मुक़दमा कर देते हैं और अध्ययनों बताते है कि महिलाएं अक्सर ये मुक़दमा हार जाती हैं.
इस साल जनवरी में चीन में एक क़ानून आया था जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया है कि यौन उत्पीड़न का शिकार व्यक्ति मुक़दमा कर सकता है.
क़ानून में यह भी कहा गया है कि कंपनियों और संस्थानों को ऐसे मामलों की अच्छी तरह जाँच कराने और इन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए.
जब यह क़ानून आया था जब इसकी ख़ूब तारीफ़ हुई थी लेकिन हाल के अदालती फ़ैसले बताते हैं कि ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही है.
'हमारी कोशिश बेकार नहीं गई'
एक्टिविस्ट्स का कहना है कि जियांज़ी मामले में अदालत का फ़ैसला चीन में #MeToo मुहिम पर स्पष्ट हमला है.
एक्टिविस्ट लिआंग जियाओवेन ने बीबीसी से बताया कि इस फ़ैसले के बाद वीचैट 300 सदस्यों वाले एक फ़ेमिनिस्ट ग्रुप को ब्लॉक कर दिया गया.
ग्रुप पर लोग अब भी पोस्ट कर सकते हैं लेकिन वो दूसरों के मैसेज नहीं देख सकते.
हालाँकि जियांज़ी के मामले ने चीन में महिलाओं के अधिकारों को लेकर जागरूकता ज़रूर बढ़ाई है.
जानी-मानी फ़ेमिनिस्ट लू पिन कहती हैं, "#MeToo अभियान महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आवाज़ उठाता है. यह आंदोलन ख़त्म नहीं होगा क्योंकि इसकी उपज चीनी महिलाओं के सच्चे और जिए अनुभवों से हुई है."
जियांज़ी कहती है कि उन्हें लगता है कि उनके मामले ने इंसाफ़ की लड़ाई में प्रगति हासिल की है.
वो दृढ़ होकर कहती हैं, "हम साथ मिलकर लड़ेगे. हमने पहले ही कुछ हद तक जीत हासिल कर ली है. मैंने कभी नहीं सोचा कि हमारी कोशिशें बेकार हो गईं. एक सेकेंड के लिए भी नहीं."
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