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ग़रीब कामगार औरतों के लिए कब आएगा #MeToo movement
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''जब उनका परिवार कहीं बाहर या फिर घूमने जाता था वो घर पर जानबूझकर रह जाते. वे मेरे पीछे मंडराने लगते. मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगते. वे मुझे तस्वीरें दिखाते और बोलते छोटे कपड़े पहनो, अच्छी दिखोगी. वो मेरे दादा के उम्र के थे. मैं नज़रअंदाज कर देती थी.''
वे बताती हैं कि मैं काम नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि मुझे पैसों की ज़रूरत थी. मेरा परिवार काम की तलाश में पश्चिम बंगाल से दिल्ली आया था.
कायनात के साथ जब यौन-उत्पीड़न हुआ तब वे 17 साल की थीं.
''एक बार फिर मेरे साथ ऐसा ही हुआ. उनके बच्चे और पोता-पोती सब बाहर गए हुए थे और उन्होंने मेरे साथ फिर वैसा ही किया. मैं बहुत घबरा गई और ख़ुद को बाथरूम में बंद रखा जब तक उनका परिवार वापस नहीं आ गया.''
''मैं अगर उनके परिवार को बताती कि मेरे साथ ऐसे छेड़छाड़ की जाती है तो शायद मेरा कोई यक़ीन नहीं करता. मैंने तंग आकर उनका घर ही छोड़ दिया.''
क़ानून लागू करने में असफल
कायनात अब 25 साल की हैं और किसी के घर में रहकर काम करने की बजाय अलग-अलग घरों में जाकर काम करना पसंद करती हैं.
कायनात को अपने काम का यह तरीक़ा इसलिए पसंद है क्योंकि उन्हें लगता है शायद ये ही उन्हें छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न से बचा सकता है.
उन्हें लगता है कि अगर वो उस बुज़ुर्ग के बारे में उनके परिवार को बतातीं तो कोई उन पर विश्वास नहीं करता और फिर शायद दूसरे घरों में काम के लिए दरवाज़े भी उनके लिए बंद हो जाते.
संगठित और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली कायनात जैसी न जाने कितनी ही औरतें हैं जो अपने ख़िलाफ़ हो रहे यौन उत्पीड़न को काम छूट जाने के डर, शर्म, बदनामी के कारण अपनी ज़ुबान तक पर नहीं ला पाती हैं.
हालांकि ये देखा गया है कि पूरी दुनिया में शुरू हुए #MeToo movement के बाद भारत में भी महिलाओं ने बाहर आकर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में बताया.
लेकिन सोशल मीडिया के ज़रिए शुरू हुए इस अभियान में उन महिलाओं की आवाज़ दबी ही रही जो असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं, कम पढ़ी लिखी हैं, जो अपने हक़ और क़ानून के बारे में जानती ही नहीं हैं.
ह्यूमन राइट्स वॉच की ताज़ा रिपोर्ट भी कहती है कि भारत सरकार यौन उत्पीड़न पर क़ानून तो लेकर आयी है लेकिन वो पूरे देश भर में उसे लागू करने में असफल रही है.
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इस संस्था ने इस सिलसिले में संगठित और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं, ट्रेड यूनियन के पदाधिकारियों, श्रम और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और शिक्षाविदों से बात की.
ह्यूमन राइट्स वॉच रिपोर्ट की कंसल्टेंट जयश्री बाजोरिया का कहना है, ''#MeToo movement ने कार्यस्थल पर हिंसा और यौन उत्पीड़न को बाहर लाने में तो मदद की लेकिन भारत में 95 फ़ीसद महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती है जो समाज के ग़रीब तबक़े से ज्यादा होती हैं जिनकी पहुंच सोशल मीडिया पर बहुत कम होती है. ऐसे में हमें इन औरतों की आवाज़ें सुनाई ही नहीं दी. हालांकि इस मामले में आया क़ानून एक अच्छा क़दम था लेकिन इस क़ानून पर असंगठित क्षेत्र में अमल नहीं किया गया है.''
सरकार ने औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिला कामगारों की सुरक्षा के लिए कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013 लागू कर चुकी है. लेकिन संस्था का कहना है कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए ये क़ानून सिर्फ़ काग़जों तक ही सीमित है.
इसी रिपोर्ट में दिल्ली स्थित वकील रेबेका जॉन ने कहा है,''हमने इस तथ्य को स्वीकार तक नहीं किया है कि ये फैक्ट्री कर्मचारी, घरेलू कामगार, निर्माण मज़दूर जैसे श्रमिकों का हर रोज़ यौन उत्पीड़न किया जाता है और उन पर यौन हमला होता है. लेकिन ग़रीबी के कारण उनके पास कोई विकल्प ही नहीं होता. वे जानते हैं कि जो कमाते हैं वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.''
ये रिपोर्ट ये कहती है कि असंगठित और क्षेत्र में महिलाएं ज़्यादा संख्या में यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं और कंपनियां भी क़ानून पालन करने के लिए धीरे-धीरे क़दम उठा रही हैं.
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न संबंधी क़ानून
साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा दिशानिर्देश जारी किए थे. सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा दिशानिर्देशों के तहत मालिकों को महिला कर्मचारियों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने के लिए क़दम उठाने और ऐसे अपराधों के समाधान, निपटारे या अभियोजन के लिए कार्यप्रणाली की व्यवस्था बनाना अनिवार्य बताया गया साथ ही शिकायत समिति के रूप में कार्यस्थल के भीतर एक निवारण तंत्र का प्रस्ताव रखा गया. इस समिति को कर्मचारियों और बाहरी सदस्य को लेकर बनाने की बात कही गई थी जिसका काम शिकायतों की सुनवाई करना भी शामिल था.
साल 1997 से लेकर 2013 तक दफ़्तरों में विशाखा गाइडलाइन्स के आधार पर ही इन मामलों को देखा जाता रहा लेकिन फिर कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 आया.
जिसमें विशाखा गाइडलाइन्स के अनुरूप ही कार्यस्थल में महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात कही गई. इसके साथ ही इसमें समानता, यौन उत्पीड़न से मुक्त कार्यस्थल बनाने का प्रावधान भी शामिल किया गया.
इस एक्ट के तहत किसी भी महिला को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सिविल और क्रिमिनल दोनों ही तरह की कार्रवाई का सहारा लेने का अधिकार है.
हर वो दफ़्तर जहां दस या उससे अधिक लोग काम करते हैं वहां एक अंदरुनी शिकायत समिति (इन्टर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी या ICC) होती है जिसकी अध्यक्ष महिला ही होती है.
इस क़ानून के तहत ऑफ़िस में इस समिति की स्थापना की जाती है. इस समिति में नामित सदस्यों में से आधी महिला होनी चाहिए. साथ ही इसमें एक सदस्य यौन-हिंसा के मामलों पर काम करने वाली किसी एनजीओ की सदस्य होनी चाहिए.
ऐसे में अगर आपके साथ कार्यस्थल पर ऐसा कुछ भी हो रहा है या हुआ है तो आप सबसे पहले अपने ऑफ़िस में बनी इस समिति में जा सकती/सकते हैं. यहां एक बात स्पष्ट करना ज़रूरी है कि इस समिति के दिशा-निर्देश दफ़्तर में काम करने वाले सभी कर्मचारियों पर लागू होते है और ये क़ानून संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के सभी सार्वजनिक और निजी नियोक्ताओं और कर्मचारियों पर लागू होता है.
समितियों के लिए शिकायत दर्ज होने की तारीख़ के 90 दिन के भीतर यौन उत्पीड़न के प्रत्येक मामले की जांच को पूरा करना अनिवार्य किया गया.
जागरूकता का सवाल
वहीं साल 2017 में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने यौन उत्पीड़न इलेक्ट्रॉनिक बॉक्स भी लांच किया जिसे शी-बॉक्स के रूप में जाना जाता है. ये बॉक्स किसी भी व्यवसाय, संगठित और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिला को यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने के लिए सिंगल विंडो की सुविधा देता है.
जयश्री बाजोरिया का कहना है, ''क़ानून ने तो प्रावधान किए लेकिन शी-बॉक्स जो कि ऑनलाइन प्रणाली है उस तक अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिला कैसे शिकायत दर्ज कराएगी क्योंकि वे अपने अधिकारों के लिए जागरूक ही नहीं हैं. वे ये ही नहीं जानती कि जिस क्षेत्र में वो काम कर रही हैं वहां कंपनी की तरफ़ से आंतरिक समिति होती है या अगर आप असंगठित क्षेत्र में हैं, जहां दस लोग से कम कर रहे हो या फिर किसी को अपने मालिक से ही यौन उत्पीड़न की शिकायत हो और उसे शिकायत दर्ज करानी हो तो ऐसे में लोकल कमिटी तक बनाई जाती हैं जो ब्लॉक या ज़िला स्तर पर हो सकती है जिसे डीएम या कलेक्टर मामलों की जांच के लिए गठित करवा सकता है.''
लेकिन कई शोध बताते हैं कि ऐसी लोकल कमिटी गठित ही नहीं की गई है और हुई भी है तो इनके बारे में महिलाओं को जानकारी ही नहीं है. हालांकि सरकारी वेबसाइट पर तो जानकारी मिल जाएगी पर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को न्याय कैसे मिलेगा?''
उनका कहना है कि सरकार की इस मामले पर निगरानी को लेकर क्या प्रणाली है, उसके बारे में जानकारी नहीं मिल पाती है.
वे बताती हैं कि सरकार वर्कप्लेस सेफ्टी पर काफ़ी काम कर रही है लेकिन महिला सुरक्षा को मुद्दा नहीं समझा जाता है. ये अच्छी बात है कि #MeToo movement से महिलाओं ने यौन उत्पीड़न पर आकर बात की और जब इसकी सालगिरह आती रहेगी तो और बातें सामने आएंगी हालांकि हमने ये भी देखा कि जिन औरतों ने बड़े लोगों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई उन्हें प्रतिशोध का सामना करना पड़ा ताकि एक संदेश दिया जा सके कि अगर आप आवाज़ उठाएँगी तो आपके ख़िलाफ़ भी ऐसा हो सकता है तो ऐसे में आप उन औरतों के बारे में सोचिए जो झेलती तो हैं पर बोल नहीं पाती.
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