#MeToo सिर्फ़ फ़िल्म इंडस्ट्री में ही नहीं होता महिलाओं का शोषण: सौम्या टंडन

    • Author, मधु पाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

#MeToo मूवमेंट के चलते लड़कियां सामने आ रही हैं, अपने साथ हुए उत्पीड़न पर बात कर पा रही हैं, लेकिन जिस तरह एक के बाद एक हर रोज़ नए नाम आ रहे हैं उससे मीडिया, राजनीति और फ़िल्म इंडस्ट्री में हलचल मच गई है.

इस अभियान के तहत अभी तक फ़िल्म इंडस्ट्री के कई बड़े नाम समाने आए हैं. एक्ट्रेसेज़ खुलकर सामने आ रही हैं और सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से अपने साथ हुए उत्पीड़न के दर्द को बयां कर रही हैं. जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनमें से कुछ लोगों ने तो माफ़ी मांग ली है, लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनकी तरफ़ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने ऊपर लगे आरोपों को झूठा बता रहे हैं.

इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग है जो इस मूवमेंट के समर्थन में है. बहुत-सी महिला कलाकारों ने हमारे साथ अपने अनुभव साझा किए.

सौम्या टंडन की आपबीती

'भाभी जी घर पर हैं' से मशहूर हुई सौम्या टंडन बताती है कि जब वो स्कूल में थी तो उनका एक रिश्तेदार उन्हें ग़लत तरीक़े से छूता था.

"वो मुझे बहुत ग़लत तरीक़े से छूते थे, लेकिन मैंने ये बात अपने माता-पिता से छुपाई नहीं. जब मैंने मेरे पापा को ये सब बताया तो उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया."

सौम्या कहती हैं कि आमतौर पर लोगों को लगा है कि सिर्फ़ फ़िल्म इंडस्ट्री में ही ऐसा होता है, लेकिन ऐसा नहीं है.

वो कहती हैं "हर जगह कुछ ऐसे पुरुष मिलेंगे जो औरतों को गंदी नज़र से देखते हैं. मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, लेकिन कुछ ऐसे लोगों से मैं मिली ज़रूर हूं जिनकी नीयत मुझे ठीक नहीं लगी."

"मुझे आज भी याद है जब मैं साउथ की फ़िल्मों के लिए ऑडिशन के लिए जाती थी तो कई बार ऐसा लगा कि कास्टिंग डायरेक्टर ठीक नहीं हैं या फिर असिस्टेंट डायरेक्टर ठीक नहीं हैं. जब भी लगा कि वो मुझसे कुछ ग़लत बात करना चाहते हैं या जैसे ही मुझे कुछ खटका मैं वहां रुकती ही नहीं थी. ये मेरा तय नियम है कि मैं जहां भी काम करुँगी, अपने आत्मसम्मान के साथ करुँगी, अपनी शर्तों पर करूंगी."

सौम्या मानती हैं कि आवाज़ उठाना ज़रूरी है और वो #MeToo का समर्थन भी करती हैं, लेकिन वो इसकी संवेदनशीलता को लेकर भी गंभीर हैं.

वो मानती हैं कि अगर कोई ग़लत वजह के लिए इस मूवमेंट का इस्तेमाल करेगा तो ये कमज़ोर पड़ जाएगा.

फ़िल्म स्त्री में 'चुड़ैल' बनकर लोगों को डराने वाली फ्लोरा सैनी यौन-उत्पीड़न का शिकार रह चुकी हैं.

'मी टू की वजह से सामने आता सच'

बीबीसी से बात करते हुए फ्लोरा कहती हैं कि '11 साल से मैं इंसाफ के लिए अकेले लड़ रही थी. 2007 में वेलेंटाइन डे के दिन एक बहुत बड़े प्रोड्यूसर ने मुझे बुरी तरह से मारा था जिससे मेरा जबड़ा टूट गया था. ये वो वक्त था जब मैं उस प्रोड्यूसर से प्यार करती थी और उसे डेट कर रही थी. एक साल मैंने ये सब झेला. मैंने सोचा ये सब बता दूं, लेकिन डर था कि मुझ पर कोई यक़ीन ही नहीं करेगा.'

फ्लोरा बताती हैं कि उनका डर सही था. इस हादसे के बाद उनसे उनका बहुत सारा काम छिन गया.

वो कहती हैं "मुझे ख़ुशी है कि अब #MeToo की वजह से औरतें अपनी बात कह पा रही हैं. आज बड़े-बड़े कलाकार और निर्माता लड़कियों को इंसाफ़ दिलाने के लिए आगे आ रहे हैं. ये एक सार्थक पहल है."

मसान, बेबी, अलोन और टोटल धमाल जैसी फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री निहारिका रायज़ादा कहती हैं "ये फ़िल्म इंडस्ट्री बहुत गन्दी है, यहाँ आपको हर तरह के लोग मिलेंगे. मैं ये नहीं कहूँगी कि मेरे साथ यौन उत्पीड़न हुआ लेकिन हाँ मुझे ऐसे लोग ज़रूर मिले जो शरीर और खूबसूरती की बात करते है. ऐसे कई लोगों का सामना करना पड़ता है जब हम ऑडिशन के लिए जाते हैं, वो आपको अपने साथ सोने के लिए पूछ लेंगे या फिर आप से गन्दी-गन्दी बात करेंगे और अगर आपने उनकी बात नहीं मानी तो वो आपको काम नहीं देंगे."

हालांकि निहारिका इस बात का दूसरा पक्ष भी रखती हैं. वो कहती हैं "हर कोई ऐसा है ये भी नहीं है. कई बार औरतें भी जल्दी तरक्की के लिए ग़लत काम का सहारा लेती हैं."

लेकिन #MeToo मूवमेंट को लेकर निहारिका काफ़ी खुश हैं. वो कहती हैं कि इसकी बहुत ज़रूरत थी और अब जिस तरह औरतें सामने आ रही हैं उसे देखकर बहुत खुशी हो रही है.

वो कहती हैं "इतने सालों बाद एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. एक और सच्चाई है इस इंडस्ट्री की कि अगर कोई लड़की किसी फ़िल्म में थोड़ा बहुत अंग प्रदर्शन कर रही है तो लोगों को लगता है कि ये असल ज़िन्दगी में बहुत आसानी से हमारी बात मान लेगी. ऐसे लोगों को मेरा जवाब यही है कि पर्दे पर कोई सीन करना काम है, लेकिन किरदार के बाहर कुछ उसूल होते हैं."

इतने सारे नाम सामने आने से फ़िल्म इंडस्ट्री सदमे में है और अब क़ानून को सख़्त बनाए जाने की बात पर ज़ोर दिया जा रहा है. बीबीसी से बात करते हुए अशोक पंडित (इंडियन फ़िल्म एंड टेलीविज़न डायरेक्टर्स एसोसिएशन (IFTDA) के अध्यक्ष) कहते हैं कि 'हमारे पास अब तक जो भी शिकायतें आ रही हैं हम उन सभी को नोटिस भेज रहे हैं ताकि वो हमें अपनी सफ़ाई पेश कर सकें. एसोसिएशन के अपने दायरे हैं उसी में रहकर कुछ न कुछ करना होगा. हम जज नहीं हैं जो फ़ैसला सुना सकें. हम सिर्फ़ दबाव डाल सकते हैं. दबाव डालने के साथ-साथ हमने अब कुछ कड़े क़ानून बनाए हैं. हमने दो जाने-माने वकील दीपक कृष्णा और मिताली देशमुख को अपने एसोसिएशन में जोड़ा है जो सारे लीगल मामलों पर सलाह देंगे.'

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