#MeToo: यौन उत्पीड़न की दशकों पुरानी शिकायत की क़ानूनी वैधता कितनी?

    • Author, रेखा अग्रवाल
    • पदनाम, वकील, दिल्ली हाईकोर्ट

#MeToo मुहिम के तहत महिलाएं सोशल मीडिया पर खुलकर अपने साथ हुए बुरे बर्तावों का जिक्र कर रही हैं.

कई महिलाएं दशकों पुराने अपने बुरे अनुभव बता रही हैं तो कई हाल की घटनाओं का जिक्र कर रही हैं. पर सवाल उठता है कि दशकों पुराने मामले की क़ानूनी वैधता कितनी है.

क़ानून की बात करें तो महिला और पुरुष के बीच लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है. संविधान हर महिला को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है.

वो किसी तरह के दबाव में या फिर लिंग के आधार पर भेदभाव या ज्यादतियां या फिर उत्पीड़न नहीं सह सकती है. अगर ऐसा होता है तो वो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती हैं और वो कह सकती हैं कि उन्हें यह मंजूर नहीं है.

निर्भया मामले के बाद क़ानून में कई तरह के संशोधन किए गए हैं. साल 2013 में वर्मा कमेटी ने क्रिमिनल लॉ में संशोधन की सिफारिश की थी.

इसके बाद यौन उत्पीड़न की परिभाषा बदल गई. पहले इसकी परिभाषा बहुत ही संकीर्ण थी. अधिकतर मामलों को छेड़छाड़ का नाम देकर बंद कर दिया जाता था.

लेकिन नई परिभाषा के तहत अगर महिला को कोई घूर कर भी देखता है तो उत्पीड़न समझा जाता है.

दशकों बाद क्यों दर्द बयां रही हैं महिलाएं

आप देखें तो #MeToo के तहत कई मामले दशकों पुराने हैं. यहां तक कि अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने भी दस साल पुराने मामले में नाना पाटेकर को कटघरे में खड़ा किया है.

इसके पीछे वजह यह है कि महिलाएं शिकायत कई कारणों से तुरंत नहीं कर पाती हैं. उन्हें समाज का डर, नौकरी जाने का डर होता है और कभी-कभी तो परिवार के सदस्य ही उन्हें चुप करा देते हैं.

क़ानून अब उन्हें यह सहूलियत देता है कि वो कभी भी अपने साथ हुए ग़लत व्यवहार की शिकायत दर्ज करा सकती हैं.

कई बार बचपन में उत्पीड़न या फिर बलात्कार की शिकार महिलाएं अंदर ही अंदर सालों तक घुटती रहती हैं. इस घुटन से बाहर आने के लिए भी वो कई साल बाद इंसाफ की चाह में शिकायत दर्ज कराती हैं.

दशकों बाद के मामले की क़ानूनी वैधता कितनी?

  • क़ानून में यह बात स्पष्ट है कि उत्पीड़न के मामले में एफआईआर कभी भी दर्ज कराई जा सकती है.
  • कई कारणों की वजहों से महिलाएं घटना के वक़्त चुप रह जाती हैं, इसलिए क़ानून उन्हें यह सहूलियत देता है.
  • वैसे क़ानून यह भी कहता है कि जब घटना घटी है, उसी समय मामला दर्ज कराया जाना चाहिए. इससे यह समझा जाता है कि मामले में लीपापोती नहीं की गई है.
  • अगर बाद में या सालों बाद केस दर्ज कराया जाता है तो यह समझा जाता है कि आपने सोच समझ कर घटनाओं में बदलाव की कोशिश की है.

सबूतों का क्या होगा?

  • अगर कई साल बाद शिकायत दर्ज की जाती है तो सबूत प्रभावित होते हैं.
  • इतने साल बाद सबूतों का मिलना बहुत मुश्किल है.
  • निर्भया मामले के बाद पुलिस को कई साल पहले की शिकायत मिलने पर तत्काल मामला दर्ज करना होता है पर मामले में चार्जशीट दाखिल करने में उसे परेशानी आ सकती है.
  • जब तक मामले में चार्जशीट तैयार नहीं की जाती है, एफआईआर एक कागज का पन्ना बन कर रह जाता है.
  • कई सालों बाद मामले की जांच में अगर पुलिस को कुछ भी नहीं मिलता है तो चार्जशीट तैयार करने में उसे मुश्किल होती है.
  • अगर चार्जशीट पेश भी की जाती है तो वो बहुत ही लचर या फिर कमजोर चार्जशीट होगी.

एफआईआर दर्ज कराने के बाद क्या होगा

महिला द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बाद जाहिर है मामले की जांच होती है. महिला का 164 का बयान दर्ज कराया जाता है.

अगर कोई सबूत बचे हैं तो उसके आधार पर चार्जशीट फाइल की जा सकती है. लेकिन अगर किसी तरह का कोई सबूत नहीं मिलता है तो थोड़ी मुश्किल हो सकती है.

अगर जिस पर आरोप लगाए जा रहे हैं वो मर चुका हैं तो एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती है. अगर व्यक्ति जीवित हैं और कितनी भी उम्र का है, उसके ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज किया जा सकता है.

हाल ही में एक 80 साल के वृद्ध को अपनी नातिन के साथ ग़लत करने के दोष में सजा दी गई थी.

अगर आरोप सिद्ध नहीं होते हैं तो...

अगर किसी पुरुष पर किसी तरह के उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं और महिला आरोप सिद्ध नहीं कर पाती हैं तो पुरुष चाहे तो मानहानि का मुकदमा दर्ज करा सकता है.

अगर कोर्ट ने ट्रायल के बाद अभियुक्त को बाइज्जत बरी किया है तो वो मानहानि का मुकदमा दर्ज करा सकता है.

मानहानि का क्रिमिनल केस एक साल के अंदर दर्ज कराया जा सकता है, वहीं सिविल केस तीन साल के भीतर दर्ज करा सकते हैं.

अगर संदेह के आधार पर छोड़ दिया जाता है तो मानहानि का मुकदमा दायर नहीं किया जा सकेगा.

विशाखा गाइडलाइन क्या कहती है

विशाखा गाइडलाइन के तहत भी शिकायत कभी भी दर्ज कराई जा सकती है, चाहे मामला कितना भी पुराना क्यों न हो. इसमें भी सीमा निर्धारित नहीं की गई है.

यह शिकायत संस्था के अंदर बनाई गई कमेटी में दर्ज कराई जा सकती है. विशाखा गाइडलाइन के तहत उसकी सुनाई की जाती है और महिलाकर्मी को कार्यालय के भीतर बेहतर माहौल दिया जाता है.

देरी को कभी भी मुकदमा दर्ज नहीं करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)