ब्लॉग: औरतें यौन शोषण पर इतना बोलने क्यों लगी हैं?

    • Author, विकास त्रिवेदी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है.'

वो पहली औरत कौन थी, जिसे बनाया गया. हम नहीं जानते. लेकिन ये फ़िक्र लाज़िम है कि वो आख़िरी औरत कौन होगी, जिसे बनाया जाएगा. क्योंकि उस आख़िरी औरत के बाद की औरतें बनाई नहीं गई होंगी. वो सिर्फ़ औरत होंगी.

भारत समेत पूरी दुनिया की औरतें उस आख़िरी औरत की तरफ बढ़ रही हैं, ताकि उसके बाद वो समाज की बनाई, दबाई और कुचली हुई औरतें न रह जाएं. जो सदियों से अपने बनने, हालात में ढाले जाने से तंग तो हैं, मगर इस बात से बेख़बर भी है.

#MeToo जैसे अभियान या किसी एक भी औरत का अपने साथ हो रहे शोषण पर चिल्लाना इसी ज़रूरी सफ़र का अहम पड़ाव है.

स्टीरियोटाइप बात है कि औरतें देखा-देखी में बहुत कुछ करती हैं. दूसरे का सुख देखकर हम सब अपना हिस्से का भी सुख खोजने लगते हैं. इस बात का शुक्र मनाइए कि यही नियम दुख और तकलीफ़ों को बयां करने में भी लागू हो रहा है.

इसी नियम का प्यारा नतीजा है कि ये औरतें अब बहुत बोलने लगी हैं. इन औरतों ने अब 'औरत हो, औरत की तरह रहो' लाइन को ठेंगा दिखा दिया है. इन बड़बड़ाती हिम्मती औरतों ने 'की तरह रहो' को नहीं, अपने होने को फ़ाइनली समझा और चुना है.

अपने मन के भीतर छिपे बैठे एक पितृसत्तात्मक सोच वाले आदमी की भाषा में पूछूं तो अचानक इन औरतों की ज़बान, जो कल तक चलती नहीं थी... आज दौड़ने कैसे लगी? तो मन के भीतर कहीं आज़ाद बैठी औरत जवाब देना चाहती है.

वो वजहें या ट्रिगर गिनाना चाहती है, जिसके चलते शायद हॉलीवुड हीरोइनें, भारत में किसी भी ग्रेड की कोई कलाकार, स्कूली बच्चियां या अब महिला पत्रकार चीखकर कह रही हैं- हां, मेरे साथ कुछ ग़लत हुआ था. अभी दो मिनट पहले... दस, तीस साल पहले या मेरे पैदा होने के कुछ साल बाद.

आपको हमें इन औरतों पर आंख बंद करके न सही... आंख खोलकर यक़ीन करना होगा. जैसे हम सड़क हादसों, गर्भ से बच्चा गिरने, आत्महत्याओं की बातों पर शक नहीं करते. ठीक वैसे ही हमें इन औरतों पर यक़ीन करना होगा, ताकि उस औरत को अपने आसपास बेटी, मां, पत्नी, प्रेमिका, दोस्त या बहन की शक्ल में देख सकें, जो बनाई हुई न हों.

1: ख़ामोशी

पाश अपनी कविता की एक लाइन में कह गए, 'सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है, मगर सबसे ख़तरनाक नहीं...'

पाश और इस कविता को पढ़ने वाले बेहद कम लोग होंगे. लेकिन इस लाइन को जाने-अंजाने अपनी ज़िंदगी में उतारने वाले कम नहीं होंगे. ये संख्या इतनी ज़्यादा होगी कि अगर सबकी सहमी चुप्पी को जकड़न से रिहा किया जाए और सारी चीख़ों को मिला लिया जाए तो दुनिया भर के कानों को सुनाई देना बंद हो जाएगा.

सहमी सी चुप्पी में सबसे ज़्यादा औरतें जकड़ी रहीं और कई बार मर्द भी. मगर इस दुनिया का उसूल है कि मर्दों को माफ़ी मिल जाती है औरतों को नहीं. इसके ज़िम्मेदार जितने आदमी हैं, लगभग उतनी ही औरतें भी.

हम उस समाज में रहते हैं, जहां महाभारत में द्रौपदी की खींची जा रही साड़ी को रोकने के लिए गांधारी आंख की पट्टी हटाकर कुछ नहीं बोलती. लेकिन जब उसी 'बलात्कार' की कोशिश करते बेटे दुर्योधन की जान बचानी होती तो वो आंख की पट्टी खोल देती है.

प्रतिज्ञाओं की आड़ में महाभारत से लेकर 2018 के भारत में ख़ामोशी बरती जा रही है. मगर ये बीच-बीच में टूटती है. बॉलीवुड, साहित्य, राजनीति, शिक्षा, मीडिया या एक परिवार के भीतर. इसकी वजह कुछ भी हो सकती है.

वो एक अंतिम बात, जिसके बाद सांस लेना मुश्किल हो जाए. कोई सपना, फ़िल्मी सीन या 280 कैरेक्टर का कोई एक ट्वीट. हमें इन टूटती ख़ामोशी पर यक़ीन करना होगा.

2. ठहाके

सुनिए.

वो आख़िरी चुटकुला याद कीजिए, जो आपने बिना किसी ग़लत नियत के किसी औरत या किसी के संबंध बनने या बिगड़ने पर कहा या सुना हो.

मुझे यक़ीन है कि आपने वो चुटकुला एकदम लाइट मूड में कहा था, क्योंकि दिल से आप साफ़ हैं. मगर अब यहां अपने दिल के क़रीब किसी भी एक औरत या बच्ची की कल्पना कीजिए. ये मुश्किल काम है, पर कीजिए तो सही.

ऐसा न हो, मगर उस अपनी के किसी से संबंध बिगड़ने या शोषण होने की स्थिति में आपको ठहाके सुनाई दें तो आप क्या करेंगे? कान बंद करेंगे?

या शायद आप उन ठहाकों वाली आवाज़ों तक पहुंचें जो आपके कान के रास्ते दिल, दिमाग़ में चुभ रही हैं. ये ठहाकों की आवाज़ आपको एक आईने तक ले जाएगी, जिसमें आपको दिखाई देंगे कई जाने-माने नाम, आप और मैं ख़ुद.

जो किसी बड़े सितारे या सड़क पर गुटखा थूकते हुए चरित्र प्रमाणपत्र बांटते इंसान के कहने पर ठहाके लगा देते हैं.

अमिताभ बच्चन: ना मेरा नाम तनुश्री दत्ता है, ना मेरा नाम नाना पाटेकर. कैसे उत्तर दूं आपके सवाल का?

हाहाहहाहा हाहाहाहा हाहाहाहा

आमिर ख़ान: मैं सोचता हूं कि बिना किसी मामले की डिटेल जाने मेरा किसी तरह की कोई बात कहना सही नहीं रहेगा.

हाहाहा हाहा हाहाहा हाहा. सही बात...सही बात. हाहा हाहा

सलमान ख़ान: आप किस इवेंट में आईं हैं मैडम. जिस इवेंट में आईं हैं, उस इवेंट का सवाल पूछिए न?

हाहाहा हाहा हाहाहा हाहा

पैसा कमाने और अपने फ़ैंस का दायरा कम होने से डरते बिना सीधी रीढ़ के इन सितारों से उम्मीद क्यों की जाए.

शिकायत इन भाड़े के अभिनेताओं से नहीं, आपसे और हमसे है. जो इनके ज़रूरी सवालों के बेतुके जवाब देने पर ग़ुस्से से भरते नहीं, ठहाके लगाते हैं.

आपका हमारा ये 'हाहा हाहा' ही उन औरतों को बोलने नहीं देगा, जो आपकी अपनी भी हो सकती हैं.

3: सोशल मीडिया इवॉल्यूशन

आपकी मम्मी फ़ेसबुक पर हैं? जवाब दो हो सकते हैं. पहला- हां हैं. दूसरा- अभी कुछ दिन पहले ही फ़ेसबुक पर आई हैं.

अब अपने सोशल मीडिया के उन शुरुआती दिनों को याद कीजिए, जब आपने किसी गुड़िया, फूल पत्ती या हीरोइन वाले वॉलपेपर वाली लड़की को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी या अगर आप लड़की हैं तो आपने ख़ुद ऐसा कुछ पोस्ट किया हो.

अब उस दौर से आगे की तरफ़ चलते हैं. ठीक वैसे ही जैसे 'मानव के विकास' वाली तस्वीर में बंदर से पीठ सीधी करने के क्रम में दायीं तरफ सबसे लंबे आदमी के हाथ में हथियार आ जाता है.

इन लड़कियों ने सोशल मीडिया पर वॉलपेपर, हीरोइनों की तस्वीर लगाने से सफ़र शुरू किया था. ये औरतें पहले कविताएं लिखती थीं. फिर हिम्मत करके तस्वीरें लगाने लगीं. सेल्फ़ी का दौर आया तो इन सोशल मीडिया अकाउंट्स पर इनकी शक्लें दिखने लगीं.

लड़कियों ने कुछ-कुछ लिखना शुरू किया. प्यार, परिवार, धोखों और सपनों पर. फ़ेमिनिज़्म शब्द ट्रेंड बना. लड़कियों ने फे़सबुक पर what's on your mind? लिखा देखा तो काली पन्नी में सालों से छिपे पांच दिन की तकलीफ़ों को लिखना शुरू किया.

ये एक ऐसे देश में हो रहा था, जहां पीरियड्स होने पर पांच दिन में घर से लगभग बाहर कर दिया जाता है. लड़कियों ने अपने दिल की बातें इस क़दर कहीं कि लोगों को लगने लगा कि 'औरतों का हक़ क्या सिर्फ़ पीरियड तक ही सीमित है. और कुछ है नहीं क्या इन औरतों के पास.'

मगर ये इन लड़कियों की जीत ही तो है कि अब से कुछ साल पहले जिन दिनों को 'उन दिनों' कहकर छिपा दिया जाता था, अब वो खुलकर कह रही हैं- मैं डाउन हूं यार, पीरियड्स चल रहे हैं. चॉकलेट खाने का मन है.

जैसे मानव विकास के क्रम में आख़िरी से पहले आदमी के हाथ में हथियार आ गया था. सोशल मीडिया इवॉल्यूशन के दौर में अब हथियार औरतों के हाथ में है. वो इस हथियार से अपनी बात को मज़बूती से रखेंगी भी और बराबरी का जो हक़ सालों से शोषण की कंबल में समाज ने छुपा रखा है, उसे भी लेंगी.

अब इस हथियार से वो अतीत के मुजरिमों को भी कुरेदेंगी और वर्तमान या भविष्य में ख़ुद की तरफ़ घूरती आंखें और बढ़ते शरीर के अंगों को आगाह करेंगी.

यही दुनियाभर की उन चुप बैठी और चीख़कर अपना दुखद सच बताती औरतों का विकास होगा. जिसके बाद वो उस आख़िरी औरत के पार जाकर एक ऐसी औरत हो सकेंगी, जो आपकी हमारी बनाई हुई नहीं होगी. वो सिर्फ़ और सिर्फ़ औरत होगी.

4: औरतों की हिम्मत और भरोसा

रेस्त्रां के मैन्यू में क्या लिखा है, इससे ज़्यादा हम ये देखते हैं कि सामने वाले की थाली में क्या है? जेंडर प्रधान दुनिया में इस बात का एक सकरात्मक पहलू ये है कि इस आदत का कोई जेंडर नहीं होता.

औरतें दूसरी औरतों का दुख देखकर हिम्मती हो रही हैं और अपना दबा दुख खोज पा रही हैं. ये औरतें शायद अब जानने लगी हैं कि जिसे वो सहमकर पी गईं थीं, वो पानी नहीं...शोषण का घूंट था. जिसे उगलकर बाहर नहीं किया तो घूंट पीने वाली औरतें और पिलाने वाले मर्द बढ़ते चले जाएंगे.

द्रौपदी से लेकर तनुश्री दत्ता तक. बाजू वाले डेस्क पर बैठे आदमी से यौन शोषण झेलते हुए बलात्कार की ख़बरों में 'मामले की जांच की जाएगी' लाइन लिखने वाली महिला पत्रकारों तक. इतिहास की पहली यौन शोषण झेलने वाली महिला से लेकर आपका इस लाइन को पढ़े जाते वक़्त कहीं किसी बच्ची की गुलाबी स्कर्ट में किसी निगाह के घुसने तक.

'अरे जब इतनी बड़ी हीरोइन बोल रही है तो मैं क्यों न बोलूं.'

'मेरा शरीर भी तो मेरा अपना ही है.'

'चाचा, ऐसे क्यों कर रहे हो? प्लीज़ चाचा'

'मैंने कितना मना किया था.'

'उसे अपना समझा था और उसने मेरे साथ ही..'

'कितने साल तो चुप रही...अब और नहीं.'

'मैंने बॉस, एचआर से शिकायत भी की थी...नौकरी मेरी ज़रूरत थी. क्या करती.'

'कोई मेरा यक़ीन ही नहीं कर रहा..मर जाऊं क्या?'

शायद ये बात किसी लड़की ने एक नहीं...हज़ारों बार सोची हो. मगर हर बार वो चुप होकर दूसरे ज़रूरी कामों में लग जाती हो. मन में कई सवाल लिए. ये सवाल ज़रूरी नहीं कि उस शोषण का घूंट पिए हुई लड़की का हो. ये सवाल आपके, हमारे और समाज के हैं.

जिसे वो लड़की समझती है और वो क्या जवाब देगी और उस जवाब पर कौन भरोसा करेगा. ये सोचकर वो चुप है. इंतज़ार कर रही है उस दिन का, जब वो अपना सच चीख सके. जब आप उस पर भरोसा कर सकें.

100 में से कुछ मामलों में दहेज क़ानून का शायद ग़लत इस्तेमाल होता होगा. लेकिन क्या उस एक ग़लत इस्तेमाल से... उन चूड़ा पहने हुए पिटती बहुओं की लाल पीठों को आप यूं ही बिना इंसाफ़ के रहने देंगे. या वो औरतें, जो दहेज के लिए ज़िंदा जला दी गईं.

आप कहेंगे- कतई नहीं. इंसाफ़ होना चाहिए.

'100 कूसरवार रिहा हो जाएं लेकिन एक निर्दोष फँसना नहीं चाहिए.' फ़िल्मों में घिसा जा चुके इस डायलॉग में अपने आपको आपने निर्दोष वाले खांचे में तो शायद कई बार रखा होगा. किसी अपने के कसूरवार के रिहा होने की कल्पना कीजिएगा. आपको ये फ़िल्मी डायलॉग झूठा लगने लगेगा.

फिर सच पर भरोसा तो ज़िंदगी का बेसिक है.

कोई कुछ कह रहा है तो समझिए. संभव है तो भरोसा करिए. अपने बदन पर यौन शोषण झेल चुकी किसी औरत पर जब आप जाने-अंजाने में बिना सच जाने या समझने की कोशिश किए बग़ैर एक राय बनाते हैं तो आप भी एक किस्म का ज़ेहनी शोषण करते हैं. शक कीजिए... मगर भरोसा भी कीजिए.

वरना बिना भरोसे के ये दुनिया औरतों और मर्दों दोनों के लिए भारी-भारी लगने लगेगी.

आंकड़े मुहैया कराने वाली कोई वेबसाइट या संस्था नहीं बता सकेंगी कि कितनी औरतें अपने साथ हुए शोषण की बात मन में लिए मर गईं.

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