You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मायावती पर भद्दे चुटकुले सुनाने की हिम्मत कहाँ से आती है?
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'मायावती जोक्स'
अगर आप ये दो शब्द गूगल पर सर्च करें तो आपको मायावती को लेकर बीसियों 'चुटकुले' मिलेंगे. इनमें से ज़्यादातर में उनके रंग-रूप और कद-काठी पर छींटाकशी की गई है.
मायावती पर हिंदी और स्थानीय भाषाओं में भी भद्दे चुटकुले बनाए जाते हैं और एलीट अंग्रेज़ी में भी. ये सभी चुटकुले इतने अपमानजनक और अश्लील हैं कि उन्हें यहाँ लिखना भी नहीं चाहिए.
ये चुटकुले उन्हीं मायावती को निशाना बनाते हैं जो भारत में पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं, जो चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रह चुकी हैं, जो राष्ट्रीय स्तर की बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष हैं और जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने 'लोकतंत्र का चमत्कार' कहा था.
हाल ही में बॉलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा का एक पुराना वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में वो सार्वजनिक मंच से एक चुटकुला सुनाते नज़र आ रहे हैं.
अंग्रेज़ी में सुनाए गए इस चुटकुले का मायावती की राजनीति से ताल्लुक नहीं है, बल्कि उनकी शक्ल-सूरत का मज़ाक उड़ाया गया है, यानी बदसूरत महिला कहने की जगह उनके नाम का इस्तेमाल किया गया है.
चुटकुले में मायावती का नाम होना आपत्तिजनक तो है ही, लेकिन अगर मायावती का नाम न भी होता तो यह बेहद फूहड़ और भद्दा मज़ाक़ था जिसे सुनने के बाद वहाँ मौजूद लोग ठहाके लगाकर हँसते नज़र आते हैं.
वीडियो साल 2012 का बताया जा रहा है लेकिन अभी सामने आया है, मायावती उस समय या तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही होंगी या फिर हाल ही में सत्ता से बाहर हुई होंगी.
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर रणदीप की गिरफ़्तारी की माँग होने लगी.
हर साल माइग्रेट करने वाले जीवों के संरक्षण पर काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्था सीएमएस ने भी उनसे नाता तोड़ लिया. अब तक हुड्डा सीएमएस के ब्रैंड एंबेसेडर थे. हालाँकि इन सबके बाद रणदीप हुड्डा की तरफ़ से कोई माफ़ी या बयान सामने नहीं आया है.
मायावती का मज़ाक़
यह पहला और अकेला मौक़ा नहीं है जब मायावती पर कोई आपत्तिजनक, महिला-विरोधी या जातिवादी टिप्पणी की गई हो या इसी तरह का कोई भद्दा चुटकुला सुनाया गया हो.
उनको निशाना बनाने वालों में नेताओं और अभिनेताओं से लेकर कॉमेडियन और आम लोग, सब शामिल हैं.
उत्तर प्रदेश के दलित परिवार और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाली मायावती को उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा था.
मायावती की बायोग्राफ़ी लिखने वाले अजय बोस ने अपनी किताब 'बहनजी: अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ मायावती' में इसका ज़िक्र किया है.
किताब में बताया गया है कि जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और 'देहाती लिबास' तथाकथित संभ्रांत महिला सांसदों के लिए 'माखौल का विषय' हुआ करते थे.
अजय बोस लिखते हैं, "वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है. उनमें से एक ने तो एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहाँ तक कहा था कि वो मायावती से 'अच्छा परफ़्यूम' लगाकर सदन में आने के लिए कहें.''
यह भी पढ़ें: जब फ़ैमिली वॉट्सऐप ग्रुप पर आएं 'सेक्सिस्ट' चुटकुले
कारवाँ पत्रिका में मायावती पर विस्तृत लेख लिखने वाली पत्रकार नेहा दीक्षित कहती हैं कि मायावती को शुरू से अब तक हमेशा निशाना बनाया गया है.
वो कहती हैं, "पहले मायावती चोटी बनाती थीं तब भी उनका मज़ाक़ उड़ाया जाता था. फिर उन्होंने बाल छोटे कराए तब भी उनका मज़ाक़ उड़ाया गया. उन्होंने हीरे के गहने पहने तब भी उनका मज़ाक़ बना और महँगे हैंडबैग लिए तब भी."
नेहा दीक्षित बताती हैं कि इन सबके बावजूद शायद ही कभी हुआ हो जब मायावती ने ख़ुद पर की गई अपमानजनक बातों को लेकर कोई प्रतिक्रिया दी हो.
कई बार ऐसा हुआ है जब सेलिब्रिटी, नेताओं और जाने-माने लोगों की दलित-विरोधी टिप्पणियाँ सामने आईं, जिनमें से कई मायावती से भी जुड़ी थीं.
आसान निशाना
सवाल ये है कि लोग एक सशक्त नेता के ख़िलाफ़ ऐसी बातें कहकर इतनी आसानी से निकल कैसे लेते हैं? उनकी पर्याप्त निंदा क्यों नहीं होती और उन पर क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होती?
वामदल सीपीआई (एमएल) की महिलावादी नेता कविता कृष्णन मायावती पर होने वाली टिप्पणियों को महिला-विरोधी और दलित-विरोधी सोच का नतीजा बताती हैं.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हमारा समाज इस क़दर सेक्सिस्ट और कास्टिस्ट है कि महिलाओं और दलितों पर ऐसी टिप्पणी करना कोई बड़ी बात नहीं माना जाता. इसलिए लोगों को भी नहीं लगता कि वो कुछ ग़लत कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि यह तो सामान्य बात है और सभी ऐसा करते हैं."
कविता कृष्णन का मानना है कि जब लोगों को किसी महिला को नीचा दिखाने का कोई और रास्ता नहीं सूझता तो वो उसके चेहरे और शरीर को निशाना बनाते हैं.
वो कहती हैं, ''यही वजह है कि असुरक्षा की भावना से घिरे लोग, ख़ासतौर पर सवर्ण पुरुष मायावती जैसी सशक्त महिलाओं पर भद्दी टिप्पणी कर उन्हें अपमानित करने की कोशिश करते हैं.''
साथ ही, कविता यह भी कहती हैं कि आज सोशल मीडिया के ज़माने में महिलाएं और दलित अपने अधिकारों और पहचान को लेकर जागरूक हो रहे हैं और वो ऐसी टिप्पणियों का विरोध करते हैं, इन पर सवाल पूछते हैं.
शायद यही वजह है कि साल 2012 में रणदीप हुड्डा के उस आपत्तिजनक चुटकुले का विरोध नहीं हुआ लेकिन आज हो रहा है.
यह भी पढ़ें: बलात्कार की वो संस्कृति, जिसे आप सींच रहे हैं
कई बार ऐसी टिप्पणियाँ करने वाले लोग कहते हैं कि जब उन्होंने ऐसी बातें कहीं तब वो जागरूक नहीं थे और उनकी समझ विकसित नहीं हुई थी. ऐसी दलीलों को कितना उचित माना जा सकता है?
इसके जवाब में कविता कृष्णन कहती हैं, "ऐसी दलीलें देकर पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता. यह बात सही है कि हमारा समाज सेक्सिस्ट और कास्टिस्ट है लेकिन हमें अपनी समझ ख़ुद विकसित करनी पड़ती है. ग़लत चीज़ों को 'अनलर्न' करना पड़ता है."
दलित अधिकारों के लिए काम करने वाली और जेंडर सेंसिटिविटी ट्रेनिंग का लंबा अनुभव रखने वाली सिंथिया स्टीवन भी ऐसी दलीलों को नाकाफ़ी बताती हैं.
वो कहती हैं, "अगर आपने अतीत में कोई ऐसी टिप्पणी की है तो उसके पीछे बहाने और दलीलें ढूँढने से अच्छा है कि आप बिना शर्त माफ़ी माँगें और अपना बयान वापस लें. ज़रूरत पड़े तो उन पर क़ानूनी कार्रवाई भी की जाए."
सिंथिया के मुताबिक़ भारत में महिलाओं की ख़ूबसूरती के जो पैमाने तय किए गए हैं वो भी 'ब्राह्मणवादी और अभिजात्यवादी' (एलिटिस्ट) हैं.
यहाँ ध्यान देने वाली एक बात यह भी है कि मायावती पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करने वाले या उनसे जुड़े भद्दे चुटकुले सुनाने वालों में बड़ी संख्या सवर्ण पुरुषों की है.
सिंथिया कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि कोई दलित महिला मायावती के रंग-रूप या शरीर पर अपमानजनक टिप्पणी कर सकती है. ऐसा करने वाले सवर्ण पुरुषों की संख्या ज़्यादा है क्योंकि उनकी नज़र में दलित महिलाओं की कोई ख़ास अहमियत नहीं है."
सिंथिया के मुताबिक़ ऐसा करने वाले लोगों को अपनी ग़लती इसलिए नज़र नहीं आती क्योंकि वो जन्म से मिले अपने 'प्रिविलेज' की वजह से इसे सहज मानते हैं.
यौन हिंसा को रूप-रंग से जोड़ा जाना
कविता कृष्णन दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं के प्रति लोगों के नज़रिए को समझाने के लिए राजस्थान कोर्ट की एक टिप्पणी याद दिलाती हैं.
साल 1995 में हाई कोर्ट ने पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाली भंवरी देवी के बलात्कार के अभियुक्तों को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि अगड़ी जाति का कोई पुरुष पिछड़ी जाति की महिला का बलात्कार नहीं कर सकता क्योंकि वो उसे 'अशुद्ध' मानते हैं.
साल 1995 की ही बात है जब उत्तर प्रदेश में गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती ने कहा कि उस दिन उन्हें बलात्कार का डर लगा तो मुलायम सिंह यादव ने एक रैली में कहा, "क्या मायावती इतनी सुंदर हैं कि कोई उनका बलात्कार करना चाहेगा?"
कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा जोशी ने साल 2009 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती से बलात्कार पीड़िताओं के लिए मुआवज़े की रक़म बढ़ाने के संदर्भ में कहा कि 'मायावती को शर्मिंदा करने के लिए उन पर मुआवज़े की रक़म फेंककर कहना चाहिए कि अगर तुम बलात्कार के लिए राज़ी हो जाओ तो तुम्हें एक करोड़ रुपये दूंगा.'
यानी बात सिर्फ़ महिलाओं की हर सफलता या नाकामी को उनके चेहरे और शरीर से जोड़ने तक ही सीमित नहीं है. बलात्कार जैसे यौन अपराधों को भी उनके रूप से ही जोड़ा जाता रहा है.
#MeToo मुहिम की शुरुआत करने वाली टैरेना बर्क की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की गईं और कहा गया 'समझ नहीं आता कि उन्हें #MeToo जैसी मुहिम की ज़रूरत क्यों पड़ गई. उनके जैसी काली, मोटी और भद्दी महिला का भला कौन यौन उत्पीड़न करेगा?'
टैरेना बर्क एक ब्लैक अमेरिकी महिला हैं. ज़ाहिर है, अपने समाज में वो भी कहीं न कहीं हाशिए पर हैं.
यह भी पढ़ें: 'विधायक जी, तीन बच्चों की मां से बलात्कार होता है'
पूरे समुदाय का अपमान
कविता कृष्णन कहती हैं, "पुरुषवादी और जातिवादी समाज की यही धारणा है कि महिलाएं ही अपने बलात्कार और यौन उत्पीड़न के लिए ज़िम्मेदार हैं. ऐसे ही विचारों की झलक समय-समय पर लोगों के बयानों में भी दिख जाती है."
नेहा दीक्षित का मानना है कि हम मज़ाक़ अक्सर उनका बनाते हैं जिन्हें ख़ुद से कमतर समझते हैं इसलिए चुटकुलों में भी एक 'पावर इक्वेशन' होता है.
वो कहती हैं, "जब आप किसी महिला या किसी दलित को लेकर भद्दे चुटकुले बनाते हैं या कोई आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं इससे पूरा समुदाय प्रभावित होता है."
सिंथिया स्टीवन कहती हैं कि इसे रोकने के लिए ज़रूरी है कि मौजूदा और भावी पीढ़ी को शुरू से ही महिलाओं और दलितों के साथ होने वाली हिंसा और भेदभाव के बारे में संवेदनशील बनाया जाए.
वो ऐसे बयानों पर लगातार सवाल उठाने और विरोध करने को कहती हैं. उनके मुताबिक़ अगर हम लगातार अपमानजनक बातों पर आपत्ति जताते रहेंगे तो यह संदेश साफ़ होता जाएगा कि ऐसा कहना या करना सामान्य नहीं है.
सिंथिया कहती हैं, "अच्छी बात यह है कि सोशल मीडिया के कारण ऐसा बर्ताव अनदेखा नहीं रह पाता और ऐसा करने वाले सवालों के घेरे में आ ही जाते हैं. ठीक वैसे ही, जैसे इन दिनों रणदीप हुड्डा आए हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)