रईसों से ज़्यादा टैक्स कैसे वसूल सकती है सरकार?- दुनिया जहान

अरबपतियों पर टैक्स

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जेफ़ बेज़ोस, वॉरेन बफेट, एलन मस्क, माइकल ब्लूमबर्ग- शायद ही कोई इन नामों से परिचित न हो. ये दुनिया के कुछ सबसे अमीर लोगों के नाम हैं.

इसी साल जून में प्रोपब्लिका नाम की एक वेबसाइट ने दावा किया कि अमेरिका के 25 अरबपति अपनी आय के हिसाब से बेहद कम टैक्स देते हैं. जेफ बेज़ोस ने 2007, 2011 में और एलन मस्क ने 2018 में कोई इनकम टैक्स ही नहीं दिया. वॉरेन बफ़ेट की टैक्स दर 0.10 फ़ीसदी है.

वहीं एक आम मध्यवर्गीय परिवार अपनी आय का 14 फ़ीसदी तक टैक्स के रूप में देता है.

भारत की बात करें तो, मोदी सरकार ने 2016 में संपत्ति कर को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह 2 फ़ीसदी का सरचार्ज लगाया. 2019 में इसे भी ख़त्म कर दिया गया. दूसरी तरफ़ विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के नाम पर कॉर्पोरेट टैक्स को 30 फ़ीसदी से घटाकर 22 फ़ीसदी कर दिया गया.

साथ ही प्रत्यक्ष करों की बजाय अप्रत्यक्ष करों में बढ़ोतरी की गई, जिसका असर ग़रीबों और मध्यवर्ग पर पड़ा. हालांकि सरकार भी इसके असर से अछूती नहीं रही. उसका भी वित्तीय घाटा बढ़ा.

हाल में जब कोरोना महामारी के दौरान रईसों पर कोविड रीलिफ़ सेस लगाने का प्रस्ताव दिया गया तो सरकार ने इसे ख़ारिज कर दिया.

भारत या अमेरिका ही नहीं, अधिकतर मुल्कों में अरबपति अपनी संपत्ति के हिसाब से कम टैक्स देते हैं. लेकिन हाल के वक्त में रईसों से ज़्यादा टैक्स वसूलने की मांग बढ़ रही है.

इस सप्ताह दुनिया जहान में पड़ताल इस बात की कि सरकारें रईसों से ज़्यादा टैक्स कैसे वसूलें.

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जेफ़ बेज़ोस, वॉरेन बफेट, एलन मस्क

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क़ानून की ख़ामियों का इस्तेमाल

जैसी आइसिंगर प्रोपब्लिका के संपादक हैं. अपनी टीम के साथ उन्होंने कई महीनों तक इंटर्नल रिवेन्यू सर्विस के लीक्ड आंकड़ों का विश्लेषण किया है. इनमें 15 साल पुराने कुछ आंकड़े भी थे.

वो बताते हैं, "कई अरबपति सरकार को इनकम टैक्स देने से बचते हैं. दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति जेफ बेज़ोस, दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क समेत और भी कई ऐसे रईस हैं जो अपनी आमदनी के हिसाब से बेहद कम इनकम टैक्स देते हैं, कुछ साल तो ये टैक्स देते ही नहीं. ये अपने आप में चौंकाने वाला है."

अपने विश्लेषण के लिए प्रोपब्लिका ने एक टैक्स दर बनाई. सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध फोर्ब्स की लिस्ट जैसी जानकारी का इस्तेमाल कर अंदाज़ा लगाया गया कि एक तय वक्त में व्यक्ति की आमदनी कितनी बढ़ सकती है. इसके साथ लीक्ड आंकड़ों का मिलान कर ये पता लगाया गया कि व्यक्ति की असल इनकम टैक्स दर क्या होनी चाहिए.

आइसिंगर कहते हैं, "अपनी आय पर अरबपतियों का पूरा नियंत्रण होता है. मध्यवर्ग के व्यक्ति के मामले में तनख़्वाह से टैक्स काट लिया जाता है, आपके पास कोई विकल्प नहीं बचता."

सरकारें व्यक्ति की आय पर टैक्स लगाती है, यानी जितनी आय उतना टैक्स. इस सिद्धांत के आधार पर अरबपतियों को अधिक टैक्स देना चाहिए. किसी भी मध्यवर्गीय परिवार की तुलना में अरबपति बेहतर ज़िंदगी जीते हैं, तो फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि वो कम इनकम टैक्स दें?

आइसिंगर कहते हैं, "ऐसा वाकई में संभव है. आपने सुना होगा कि कभी-कभी कंपनी के मालिक पगार के रूप में केवल एक डॉलर लेने की बात करते हैं. स्टीव जॉब्स ने जब एप्पल में वापसी की तो उन्होंने एक डॉलर तन्ख़्वाह लेने की घोषणा की. ऐसी ख़बरों से हम ख़ुश होते हैं, हमें लगता है कि वो त्याग कर रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. क्योंकि टैक्स तन्ख़्वाह पर ही लगाया जाता है."

अमेरिका में आय के हिसाब से इनकम टैक्स अधिकतम 37 फ़ीसदी तक हो सकता है, वहीं भारत में ये दर 30 फ़ीसदी तक होती है.

मतलब ये कि अगर किसी की तन्ख़्वाह एक डॉलर है तो उस पर कोई इनकम टैक्स नहीं बनेगा. शेयर और संपत्ति बेचने से हुई आय पर भी टैक्स लगता है. लेकिन अगर बिना कुछ बेचे आय होती है वो इनकम नहीं है और इसलिए उस पर टैक्स नहीं लगेगा.

वीडियो कैप्शन, बजट 2021: समझिए टैक्स और इकोनॉमी के एक्सपर्ट से

आइसिंगर के विश्लेषण के अनुसार 2014 से 2018 के बीच दुनिया के 25 रईसों ने इनकम टैक्स में अपनी आय का केवल 3.4 फ़ीसदी ही दिया.

वे कहते हैं, "अगर स्टॉक मार्केट में अमेज़न या टेस्ला के शेयर ऊपर जाते हैं तो जेफ़ बेज़ोस, एलन मस्क और अमीर होंगे, लेकिन ये उनकी आय नहीं मानी जाएगी."

लेकिन सवाल ये है कि अगर ये अरबपति मोटी तन्ख़्वाह नहीं लेते या शेयर नहीं बेचते तो गुज़ारा कैसे करते हैं.

आइसिंगर समझाते हैं, "आप अपनी संपत्ति गिरवी रख कर कर्ज़ ले सकते हैं. ये लोग अलग तरह से अपनी संपत्ति बनाते हैं, इस तरीके को बाय-बॉरो-डाय कहा जाता है. पहले संपत्ति बनाइए, फिर उसे गिरवी रखकर कर्ज़ लीजिए. इस तरीके में आपने कुछ बेचा ही नहीं तो इनकम टैक्स का सवाल ही नहीं."

हालांकि ये टैक्स की चोरी नहीं है, यानी ये नहीं माना जाएगा कि आपने कमाई तो की पर जानबूझ कर टैक्स नहीं दिया. इसलिए ये अपराध नहीं होगा. आप इसे क़ानून की ख़ामियों का फ़ायदा लेना कह सकते हैं.

आइसिंगर कहते हैं, "ये क़ानूनन वैध है और यही सिस्टम है. अरबपति व्यक्ति टैक्स देने से भी बच सकता है और अपनी ज़िंदगी ऐशो-आराम से बिता सकता है."

तो फिर अगर इनकम पर टैक्स लगाने का तरीक़ा काम नहीं कर रहा है तो क्या संपत्ति पर टैक्स लगाने के बारे में सोचा जाना चाहिए.

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अरबपतियों पर टैक्स

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अरबपतियों के लिए बने अलग क़ानून

मॉरिस पर्ल पैट्रियोटिक मिलियनेयर नाम के एक संगठन के चेयरमैन हैं. क़रीब सौ अरबपतियों का ये संगठन उचित टैक्स के लिए क़ानून में बदलाव की वकालत करता है.

मॉरिस ब्लैक रॉक नाम की फाइनेंस कंपनी में भी काम कर चुके हैं जो दुनिया की सबसे बड़ी मनी मैनेजिंग कंपनियों में शुमार है.

साल 2013 में वो ग्रीस सरकार के आर्थिक संकट के दौरान बैंकों के बेलआउट करने की एक योजना पर काम कर रहे थे. मॉरिस मानते हैं कि आय के आधार पर टैक्स लेने की व्यवस्था सही नहीं है और इसे बदले जाने की ज़रूरत है.

वे कहते हैं, "कुछ हज़ार अरबपतियों पर हम थोड़ा-सा संपत्ति टैक्स लगा सकते हैं, इससे अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होगा. हम लोगों से ख़ुद आगे बढ़कर टैक्स देने को नहीं कह रहे, लेकिन हम सरकार से कह रहे हैं कि वो क़ानूनों में बदलाव करे."

एक सवाल ये भी है कि अरबपति के द्वारा किए जा रहे दान यानी चैरिटी को कैसे देखा जाए, क्या इसे संपत्ति मान कर टैक्स के दायरे में लाया जाए? फिलहाल चैरिटी पर इनकम टैक्स में रियायत मिलती है.

वे कहते हैं, "कई अरबपति दान देते हैं लेकिन ये उनकी संपत्ति का बेहद छोटा हिस्सा होता है. ये टैक्स देने से बचने की वजह नहीं हो सकता. अगर कारखाने बनाना ज़रूरी है तो स्कूल और अस्पताल बनाना भी ज़रूरी है. हम समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते."

अरबपतियों से ज़्यादा टैक्स वसूलने के क़ानून का विरोध करने वालों की दलील है कि इससे इनोवेशन ख़त्म होगा, टैलेन्ट ड्रेन होगा और रोज़गार के मौक़े कम होंगे. मॉरिस इन दलीलों को बेबुनियाद बताते हैं.

मॉरिस कहते हैं, "एप्पल कंपनी में नौकरियां उन लोगों के कारण पैदा नहीं हुईं जो कंपनी चलाते हैं बल्कि मध्यवर्ग के उन लोगों के कारण पैदा हुईं जो कतार में खड़े हो कर आईफ़ोन ख़रीदते हैं. रोज़गार के मौक़े ऐसे उपभोक्ताओं के कारण पैदा होते हैं जो खर्च करते हैं और अर्थव्यवस्था की गति देते हैं."

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मॉरिस कहते हैं कि संपत्ति पर टैक्स लगाना, ख़ास कर निजी संपत्ति पर मुश्किल हो सकता है पर नामुमकिन नहीं.

वो समझाते हैं, "हमारे पास पहले से ही टैक्स का हिसाब करने के तरीके मौजूद हैं और इच्छाशक्ति हो तो इससे क़ानूनी जामा पहनाना भी संभव है. किसी अरबपति के लिए ये हिसाब लगाना मुश्किल हो सकता है कि उसे कितना टैक्स देना चाहिए लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि वो टैक्स दे ही न."

लेकिन एक आशंका ये भी है कि अगर संपत्ति पर टैक्स लगाने की बात की जाएगी तो कुछ लोग टैक्स चोरी करने के लिए सरकार से अपनी संपत्ति छिपा सकते हैं.

मॉरिस कहते हैं "हां, ये दलील दी जाती है कि कुछ लोग क़ानून तोड़ सकते हैं. लोग नशे में गाड़ी चलाकर एक्सीडेंट कर बैठते हैं, पर कोई ये नहीं कहता कि इस कारण क़ानून बदलकर नशे में गाड़ी चलाने को वैध कर दिया जाए. क़ानून तोड़े जाने पर सज़ा का प्रावधान होना चाहिए, न कि क़ानून न बनाने की दलील दी जानी चाहिए."

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसी सप्ताह कहा कि देश के सबसे अमीर एक फ़ीसदी लोग हर साल क़रीब 160 अरब डॉलर का टैक्स देने से बच रहे हैं. उन्होंने किसी नए टैक्स की बात नहीं की लेकिन कहा कि वक़्त आ गया है वो अपने हिस्से का टैक्स चुकाएं.

इस बदलाव को मॉरिस उम्मीद की किरण मानते हैं.

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एक मध्यवर्गीय परिवार

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अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

एलिसन श्रेगर अर्थशास्त्री हैं और मैनहैटन इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं.

अरबपतियों पर संपत्ति टैक्स लगाने को वो समस्या का हल नहीं मानतीं. वो कहती हैं कि "जब भी आप किसी एक से पैसा लेकर किसी और को देते है, आप स्थितियों को तोड़-मरोड़ देते हैं. लोगों का व्यवहार बदलता है और अर्थव्यवस्था के बढ़ने का तरीक़ा भी बदल जाता है."

वे कहती हैं कि एक अच्छी टैक्स व्यवस्था वो होती है जिसमें राजस्व खाते में अधिक से अधिक टैक्स आए लेकिन व्यवसायियों को जोखिम उठाने और बिज़नेस बढ़ाने के लिए हतोत्साहित न किया जाए. उनका मानना है कि रईसों पर टैक्स से अर्थव्यवस्था को नुक़सान अधिक होगा क्योंकि इससे इनोवेशन के रास्ते बंद होंगे. हो सकता है कि कंपनी में निवेश करने के लिए रखे धन का इस्तेमाल टैक्स देने में हो.

वे कहती हैं "अगर आप अपनी मेहनत से बनाई कंपनी के लिए संपत्ति टैक्स देंगे तो फिर आप उसे जल्दी बेचने के बारे में सोचेंगे. मतलब ये कि आप निजी इक्विटी या फिर पब्लिक स्टॉक मार्केट में जाएंगे. और जब हज़ारों लोग आपको सलाह देने लगेंगे तो शायद इनोवेशन ही बंद हो जाएगा."

एलिसन कहती हैं कि इसमें एक और मूलभूत समस्या भी है जिसका समाधान ज़रूरी है.

वे कहती हैं, "संपत्ति टैक्स व्यवस्था को लागू करना बेहद मुश्किल है. सबसे पहले तो ये तय करना होगा कि संपत्ति को कैसे परिभाषित करना है. उदाहरण के लिए आपके पास जो स्टॉक है उसकी कीमत बढ़ रही है, लेकिन आपने उसे बेचा नहीं. मान लीजिए सरकार ने बाज़ार की दर से टैक्स का हिसाब किया और टैक्स चुकाने के लिए आपको कुछ महीनों का वक़्त दिया. इस बीच अगर स्टॉक मार्केट गिर गया तो? क्या बिज़नेसमैन अपनी बचत का पैसा टैक्स में देगा. और क्या सरकार टैक्स रीफंड भी देगी."

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एक मुश्किल ये भी है कि टैक्स बचाने के लिए अरबपति फाइनेंस एक्सपर्ट की मदद लेते हैं और ये रुकेगा नहीं.

ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि अगर इनकम टैक्स के दायरे से लोग बच सकते हैं और संपत्ति टैक्स लागू करना मुश्किल है तो फिर राजस्व कैसे बढ़ेगा. क्या उन वस्तुओं पर टैक्स लगाया जाए जिन्हें अरबपति ख़रीदना पसंद करते हैं?

एलिसन कहती हैं, "लेकिन अगर अरबपति ऐसा न करने का फ़ैसला करे तो हो सकता है कि वो इस बचे पैसे को ऐसी कंपनी में लगाए जिससे अर्थव्यवस्था को फ़ायदा हो या फिर वो इसका इस्तेमाल अपनी कंपनी को बेहतर बनाने में करे."

तो फिर क्या आने वाले वक़्त में अरबपतियों से अधिक टैक्स वसूल करने का कोई रास्ता मिलने की संभावना है.

एलिसन कहती हैं, "मुझे लगता है कि ऐसा करना बिल्कुल संभव है, लेकिन मैं ये नहीं मानती कि इसके लिए नीतियां बदलने से अर्थव्यवस्था प्रभावित नहीं होगी और वाकई सरकारों को अधिक राजस्व मिल सकेगा."

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मुद्रा, करेंसी, नोट

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कोई पुख़्ता हल नहीं

सारा परेज़ ओईसीडी में सेंटर फ़ॉर टैक्स पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन की प्रमुख हैं. वो आर्थिक सुधारों और असमानता जैसे मुद्दों पर काम करती हैं.

1982 में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांसुआ मितरौं ने संपत्ति टैक्स लागू किया. इसे टैक्स ऑन लार्ज फ़ॉर्च्यून यानी अधिक संपत्ति पर टैक्स कहा गया. 2017 में आख़िरकार राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे ख़त्म कर दिया.

सारा कहती हैं, "इस टैक्स सिस्टम के तहत अगर आपकी कुल संपत्ति का मूल्य 13 लाख यूरो से अधिक है तो आपको टैक्स देना होगा."

एक अनुमान के अनुसार इस टैक्स के कारण 2000 से 2012 के बीच 42 हज़ार अरबपतियों ने फ्रांस छोड़ दिया.

टैक्स क़ानून में संशोधन होते गए. इसमें कई तरह की रियायतें दी जाने लगी. धीरे-धीरे ये सूची बढ़ती गई और ये टैक्स सफल नहीं हो पाया.

सारा कहती हैं, "एक तरफ संपत्ति टैक्स से मिलने वाला राजस्व कम हो रहा था तो दूसरी तरफ जैसी रियायतें दी जा रही थीं उससे इसे ज़मीनी स्तर पर लागू करना मुश्किल हो रहा था. वैसे भी इन रियायतों का लाभ धनी वर्ग ही उठा रहा था."

सारा सवाल करती हैं कि ये मान कर अगर रियायतें न दी गईं तो ऐसी रईस बुज़ुर्ग महिलाओं का क्या होगा जो अकेली हैं.

वे कहती हैं, "ऐसी रईस महिलाओं को टैक्स केवल इसलिए देना पड़ता था क्योंकि उनके पास घर था लेकिन सही मायने में उनके पास आय का कोई ज़रिया नहीं था. ये भी एक तरह की चुनौती थी."

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हालांकि फिर भी हम ये नहीं कह सकते कि यूरोप में संपत्ति टैक्स का मॉडल सफल नहीं हो सका तो ये कहीं और भी काम नहीं करेगा.

सारा कहती हैं, "अमेरिका में जिस तरह के संपत्ति टैक्स की चर्चा हो रही है उसका ढांचा यूरोपीय टैक्स से अलग है. यूरोपीय टैक्स व्यवस्था की नाकामी से भी काफी कुछ सीखा जा सकता है."

इसी साल मार्च में सीनेटर एलिज़ाबेथ वॉरेन और बर्नी सैंडर्स समेत कुछ डेमोक्रेट नेताओं ने अल्ट्रा मिलियनेयर टैक्स क़ानून का प्रस्ताव दिया. इसमें पांच करोड़ से अधिक की संपत्ति पर दो फ़ीसदी और एक अरब से अधिक पर तीन फ़ीसदी के टैक्स का प्रस्ताव है.

सारा कहती हैं, "ये एक अलग तरह के संपत्ति टैक्स का प्रस्ताव है जिसमें अरबपतियों को अलग-अलग स्तरों में बांट कर देखा जा रहा है. और जब आप केवल ज़्यादा रईस लोगों पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो इससे जुड़े प्रशासनिक काम कम होंगे और अधिक लोगों को परेशानी नहीं होगी."

हालांकि ये बात भी सच है कि संपत्ति टैक्स की परिभाषा विस्तृत हो सकती है और इसके कई रूप हो सकते हैं. लेकिन अब तक इस पर सहमति नहीं बन पाई है कि क्या ये टैक्स सरकार की सभी मुश्किलों का हल हो सकता है.

सारा कहती हैं, "संपत्ति टैक्स सभी मुश्किलों का समाधान नहीं. कैपिटल गेन या विरासत में मिली पूंजी पर टैक्स लगाने भर से काम नहीं बनेगा. इसके लिए कई स्तरों पर काम करना होगा ताकि सामाजिक असमानता को ख़त्म किया जा सके और ये काफी हद तक मुल्कों और उनकी सरकारों पर निर्भर करता है. हर विकल्प के अपने फायदे और नुक़सान होते हैं."

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लौटते हैं अपने सवाल पर, अरबपतियों से सरकारें ज़्यादा टैक्स कैसे वसूल कर सकती हैं.

मध्यवर्ग के करोड़ों लोग क़ानूनी तौर पर इनकम टैक्स चुकाने के लिए बाध्य होते हैं लेकिन अरबपति इससे साफ़ बच जाते हैं. ये लोग ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि वो क़ानून की ख़ामियों का फ़ायदा ले पाते हैं.

ऐसे में अगर उनकी आय की बजाय संपत्ति पर टैक्स लगाया जाए, तो इसका थोड़ा-बहुत विरोध होगा ज़रूर लेकिन इससे फ़ायदा भी होगा.

इससे कम से कम उन लोगों को भरोसा मिलेगा जिनके पास टैक्स देने से बचने का कोई रास्ता नहीं है.

प्रोड्यूसर: मानसी दाश

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