कोरोना इकोनॉमीः 'सुपर-रिच' ज़्यादा टैक्स देना चाहते हैं पर उन्हें कौन रोक रहा है?

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कोरोना महामारी ने दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था को गहरा नुक़सान पहुंचाया है.
महामारी के कारण दुनिया भर में कई देशों की सरकारों को महामारी रोकने और लोगों और कारोबार को बचाने के लिए बड़ी वित्तीय मदद की पेशकश करनी पड़ी है.
पर सवाल उठता है कि ये पैसा कहां से आएगा? इसीलिए दुनिया भर के रईसों से ये मांग की जा रही है कि वो अपनी जेबें ढीली करें.
ऐसी मांग हमेशा से होती रही है कि लेकिन इस बार नई बात ये है कि अमीर लोग इस मांग का समर्थन कर रहे हैं.
83 अरबपतियों के एक समूह ने इस हफ़्ते एक चिट्ठी लिखी है जिसमें दुनिया भर की सरकारों से उन पर ज़्यादा टैक्स लगाने की अपील की गई है ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की गाड़ी जल्दी पटरी पर आ सके.
उन्होंने चिट्ठी में लिखा है, "ये काम किया जाए. मज़बूती से किया जाए और स्थाई रूप से हो. कोरोना महामारी से पूरी दुनिया जूझ रही है. दुनिया के जख़्म भरने में हम जैसे लोगों की एक अहम भूमिका है."
इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वाले लोगों में मॉरिस पर्ल भी शामिल हैं. अमरीकी बैंकर मॉरिस पर्ल दुनिया के सबसे बड़े निवेश बैंकों में से एक ब्लैकरॉक की कमान संभाल चुके हैं.

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न्यूयॉर्क में मौजूद मॉरिस पर्ल ने फ़ोन पर बीबीसी को बताया, "बात ये नहीं है कि मैं ज़्यादा टैक्स देना चाहता हूं या फिर मैं विशुद्ध रूप से परोपकारी हूं. बाहर लोग भूख से बेहाल हैं या उनके पास जीवन जीने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है."
मॉरिस पर्ल साल 2013 से ही 'पैट्रिओटिक मिलियनरीज़' नाम के एक समूह के साथ काम कर रहे हैं. ये समूह कुछ बड़े रईसों और अमरीकी सरकार के साथ मिलकर देश में समाज में असमानता को कम करने के लिए काम करता है. इस समूह का ये भी कहना है कि धन पर नए टैक्स लगाए जाएं.
मॉरिस पर्ल कहते हैं, "मैं ऐसी दुनिया में नहीं रहना चाहता हूं जहां कुछ अमीर लोग हों और बहुत सारे ग़रीब लोग. जिस दुनिया में मैं पला-बढ़ा हूं, वो वैसी नहीं थी और मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे और उनके बच्चों की परवरिश ऐसे माहौल में हो."
लेकिन इसके बावजूद मॉरिस पर्ल जो कह रहे हैं, वो सुनने में आसान लगता है लेकिन अमल में लाना उतना ही मुश्किल है. और इसकी वजह भी है.
'सुपर-रिच' लोगों की दुनिया में टैक्स देने के मामले में उदार माने जाने वाले करोड़पति और अरबपति अपवाद माने जाते हैं, ज़्यादातर रईस इस जमात से नहीं आते हैं. लेकिन बात इतनी भर भी नहीं है.

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'सुपर-रिच' कौन हैं?
'सुपर-रिच' उन अमीरों को कहा जाता है जो 'अल्ट्रा हाई नेट-वर्थ इंडिविजुअल' (UHNWI) कहलाते हैं. इसका मतलब जिनके पास 30 मीलियन डॉलर या उससे ज़्यादा की संपत्ति है.
ये एक ख़ास समूह है, जिसमें स्विस बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर के महज़ पांच लाख लोग शामिल हैं.
'सुपर-रिच' दुनिया की आबादी का महज़ 0.003% हैं, लेकिन उनके पास दुनिया का 13% धन है.
अगर आप ये समझना चाहते हैं कि इस मामले में दुनिया में कितनी असमानता है तो ये जान लीजिए कि हमारी दुनिया के ज़्यादातर व्यस्कों (क़रीब तीन अरब लोग) के पास 10 हज़ार डॉलर से भी कम की संपत्ति है.
और ये 'सुपर-रिच' लोग रहते कहां हैं?
ब्रिटेन की एक रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म 'नाइट फ्रैंक' का अनुमान है कि ज़्यादातर 'सुपर-रिच' (240,000 या लगभग आधे) अमरीका में रहते हैं. इसके बाद चीन (61,500), जर्मनी (23,000) और फ्रांस (18,700) में रहते हैं.
तो 'सुपर-रिच' लोग बहुत सारा टैक्स देते होंगे. है, ना?
दुनिया के हर देश में टैक्स कमाई का एक अहम ज़रिया है. सबसे अहम, ये पैसा ग़रीबी और असमानता कम करने में सरकार की मदद करता है.
सरकार इस पैसे को स्वास्थ्य या शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश करती है. लेकिन इसकी प्रणालियां बहुत जटिल और विविध हैं.
सामान्य सिद्धांत कहता है कि ज़्यादा अमीर लोगों को अपनी आय पर ज़्यादा टैक्स देना चाहिए - जिसे वो हर साल श्रम (लेबर), लाभांश और किराए जैसे ज़रिए से कमाते हैं.
लेकिन उनके धन पर हमेशा इस तरह से टैक्स नहीं लिया जाता - यानी घर और स्टॉक जैसी चीज़ों पर उनकी कीमत के हिसाब से टैक्स नहीं लिया जाता. ज़्यादातर देशों में वेल्थ टैक्स नहीं लिया जाता.
और चिट्ठी लिखने वाला 83 अरबपतियों का समूह यही चाहता है कि इस तरह का अतिरिक्त टैक्स लिया जाए ताकि अर्थव्यस्था पर कोविड-19 महामारी के असर को कम किया जा सके.

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क्या पांच फीसदी बहुत कम लगता है...
सामान्य रूप से कहें तो बीते कुछ दशकों में अमीर लोगों पर लगाया जाने वाला इनकम टैक्स कम हुआ है.
साल 1966 में म्यूज़िक ग्रुप बीटल्स ने जॉर्ज हैरीसन का लिखा गीत 'टैक्समैन' गाया था. इस गीत में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हैरल्ड विल्सन द्वारा अमीरों पर लगाए गए 95 फीसदी टैक्स रेट को लेकर शिकायत की गई थी. आज कल ये टैक्स रेट 45 फीसदी के करीब है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के अर्थशास्त्री इमैनुएल साएज़ और गैब्रियल ज़ुकमैन ने एक स्टडी की थी जिसके मुताबिक़ साल 2017 में अमरीका के 400 सबसे रईस परिवारों ने 23 फीसदी की दर से टैक्स भुगतान किया जबकि देश के सबसे ग़रीब परिवारों को 24 फीसदी की दर से टैक्स देना पड़ा.
ये कैसे संभव हुआ? इमैनुएल साएज़ और गैब्रियल ज़ुकमैन बताते हैं कि अमरीका के जनप्रतिनिधियों ने बीते सालों में अमीर लोगों के लिए टैक्स कटौती को मंज़ूरी दी थी. इस कटौती को एक साथ जोड़े जाने के कारण ऐसा हुआ. देश के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने गरीब परिवार की तुलना में कम टैक्स दिया.
हालांकि दुनिया में ऐसे देश भी हैं जहां अमीर लोगों से टैक्स के रूप में ज़्यादा वसूली की जाती है. जैसे-स्वीडन जहां टैक्स रेट 60 फीसदी के क़रीब है.
क्या अमीर लोग सरकारी खजाने में ज़्यादा पैसा नहीं देते?
हां, वो ऐसा करते हैं लेकिन कौन कितना कमा रहा है, अगर इस पर ग़ौर करें तो ग़रीब परिवारों की कुर्बानी ज़्यादा बड़ी है.
'सुपर-रिच' लोगों का एक तबका तो एकाउंटिंग की तिकड़मों में लग जाता है कि ताकि उनकी टैक्स देनदारी कम की जा सके.
इसमें 'टैक्स हैवन' कहे जाने वाली जगहों पर पैसे पहुंचाने के तरीके भी शामिल हैं. 'टैक्स हैवन' उन देशों या जगहों को कहा जाता है जहां कम टैक्स या न के बराबर टैक्स लगाया जाता है और निवेशकों की गोपनीयता भी बरकरार रखी जाती है.
कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इस मॉडल की आलोचना की है. उन्हें लगता कि इसे अवैध लेन-देन को बढ़ावा मिलता है.
कुख्यात पनामा पेपर वाले स्कैंडल में ये बात सामने आई थी कि टैक्स धोखाधड़ी के मामलों के तार कई अमीर लोगों से जुड़े हुए हैं.

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सरकार 'सुपर-रिच' लोगों पर ज़्यादा टैक्स क्यों नहीं लगाती है?
इसकी एक वजह तो ये है कि टैक्स पॉलिसी राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा माना जाता है. इस पर लोगों की राय बंटी रहती है और इतिहास गवाह है कि टैक्स के मुद्दे पर राजनेता चुनाव हारते या जीतते रहे हैं.
इस बात को लेकर चिंता भी जताई जाती है कि 'सुपर-रिच' लोगों पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है.
लंदन स्थित इंस्टीट्यूट फ़ॉर फिस्कल स्टडीज़ के डिप्टी डायरेक्टर और टैक्स मामलों की जानकार हेलेन मिलर कहती हैं, "केवल 'सुपर-रिच' लोगों को टारगेट करने से देशों की समस्या का हल निकलने वाला नहीं है क्योंकि ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा नहीं है."
"मैं ये नहीं कह रही हूं कि उन्हें अकेला छोड़ दीजिए. लेकिन इसके बदले हमें बड़े टैक्स सुधारों पर काम करना चाहिए."
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि 'सुपर-रिच' लोगों पर जिस तरह से टैक्स लगाया जाता है, उसमें जरा सा भी बदलाव दूर की कौड़ी है.
पिछले साल अमरीकी सिनेटर एलिज़ाबेथ वॉरेन ने इस सिलसिले में एक योजना की रूपरेखा थी. एलीज़ाबेथ साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ से नोमिनेट होने के लिए कोशिश कर रही थीं लेकिन वो रेस से बाहर हो गईं. हालांकि जोए बाइडेन ने भी 'सुपर-रिच' लोगों पर टैक्स लगाने का ऐसा ही वादा किया है.

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ज़्यादा टैक्स देने को लेकर 'सुपर-रिच' क्या सोचते हैं?
दुनिया भर में हुए पोल दिखाते हैं, बहुत लोग इस बात का समर्थन करते हैं कि अमीरों के लिए टैक्स बढ़ाया जाए. ऐसा कहने वालों में कुछ अमीर लोग खुद भी शामिल हैं.
पिछले साल दिसंबर में अमरीकी बिज़नेस न्यूज़ चैनल सीएनबीसी ने एक सर्वे किया था जिसमें सामने आया था कि करीब 60 प्रतिशत अमरीकी करोड़पतियों ने इस बात का समर्थन किया था कि 50 मीलियन डॉलर से ज़्यादा धन वाले लोगों पर वेल्थ टैक्स लगाया जाए.
हालांकि जब 10 मीलियन डॉलर वाले लोगों से शुरुआत करने की बात हुई तो ये समर्थन घटकर 52 प्रतिशत हो गया.
एमा एजेमेंग एक ब्रितानी पत्रकार हैं जो 'फाइनेंशियल टाइम्स' अख़बार के लिए टैक्स अफेयर पर रिपोर्ट्स लिखती हैं. वो कहती हैं कि हमारे ज़्यादातर पाठक औसत वयस्कों से ज़्यादा अमीर हैं और वो वेल्थ टैक्स के पक्ष में नहीं हैं "लेकिन उन्हें लगता है कि ये (किसी तरह का वेल्थ टैक्स) अब लग सकता है."
टैक्स बढ़ाने के विरोध में दिया जाने वाले एक तर्क के अनुसार 'सुपर-रिच' लोगों को ग़लत तरीके से अलग करके देखा जाता है.
पिछले साल मार्च में अमरीकी अरबपति और न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने टैक्स बढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ अपने विचार रखे थे.
उन्होंने कहा था कि "हमें एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था की ज़रूरत है और हमें अपने सिस्टम पर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए. यदि आप एक ऐसे सिस्टम को देखना चाहते हैं जो गैर पूंजीवादी है, तो उस देश को देखिए जो शायद कभी दुनिया में सबसे अमीर था और आज वहां लोग भूख से मर रहे हैं. वो देश है वेनेज़ुएला."

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क्या 'सुपर-रिच' सच में चैरेटी को लेकर इतने उदार होते हैं?
ये सच है कि कुछ अमीर लोग धर्मार्थ के कामों के लिए दान देते हैं. जैसे माइक्रोसोफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और उनकी पत्नी मिलिंडा, वैक्सीन के रिसर्च और डेवलपमेंट जैसे कामों के लिए 1994 से अब तक करीब 50 अरब डॉलर दान कर चुके हैं.
हालांकि पिछले कुछ सालों में ये मांग उठी है कि 'सुपर-रिच' धर्मार्थ के कामों के लिए दान देने के बजाए ज़्याद टैक्स दें.
आलोचकों का कहना है कि चैरेटी संस्थाओं के बजाए सरकारें इस संसाधनों का सबसे अच्छा इस्तेमाल करने का सर्वश्रेष्ठ ज़रिया है.
उनका ये भी कहना है कि हो सकता है कि डोनेशन देने की अपनी अलग वजहें हों जैसे डोनर अपनी पसंद के किसी खास कारण के लिए डोनेशन दे रहा हो. और ये बात भी है कि चैरेटी को कानूनी फायदा भी उठाया जा सकता है, जिसे दिखाकर टैक्स कम देना पड़े.

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कॉरपोरेट टैक्स का क्या?
दुनिया भर में कारोबार करने वाले लोगों को अपने मुनाफे पर टैक्स देना होता है. लेकिन कॉर्पोरेट टैक्स एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है.
'सुपर-रिच' लोगों से जुड़ी कंपनियों ने हाल के सालों में टैक्स क़ानूनों की कमियों का फ़ायदा उठाते हुए कम टैक्स दिया या फिर टैक्स दिया ही नहीं. क्योंकि उन्होंने टैक्स छूटों, दूसरे प्रावधानों और क़ानून में कमियों का फ़ायदा उठाया.
ग़ैर सरकारी संस्था ऑक्सफ़ैम का अनुमान है कि ग़रीब देशों में बड़ी कंपनियां टैक्स बचाने में कामयाब होकर अपनी सरकारों को कम से कम 100 मिलियन अमरीकी डॉलर का राजस्व में नुक़सान पहुंचाती हैं.
इस रकम से 124 मिलियन बच्चों को शिक्षा मुहैया कराई जा सकती है या उन 80 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है जिनकी मौत प्रसव के दौरान हो जाती है. इनमें बच्चे और माताएं दोनों शामिल हैं.
दुनिया के सबसे अमीर आदमी जेफ बेज़ोस की कंपनी एमेजॉन ने साल 2018 में फेडरल इनकम टैक्स के नाम पर ज़ीरो डॉलर का भुगतान किया था.
और ये सुविधा पाने वाली एमेजॉन अकेली कंपनी नहीं थी. स्टारबक्स, आईबीएम, नेटफ्लिक्स जैसी 90 बड़ी कंपनियों ने उस साल यही किया था.
इन कंपनियों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के टैक्स कटौती प्रस्तावों का फायदा मिला था.
साल 2019 में एमेजॉन ने फेडरल टैक्स के नाम पर 162 मिलियन डॉलर का भुगतान किया. टैक्स के रूप में चुकाई गई ये रकम कंपनी के सालाना मुनाफे के दो फीसदी से भी कम था.
टैक्स एक्सपर्ट हेलेन मिलर कहती हैं, "कंपनियां जहां तक हो सके नियमों को तोड़-मरोड़ रही हैं. लेकिन इसमें कुछ भी गलत नहीं है. ज़रूरत तो इस बात की है कि नियम ही बदल दिए जाएं."
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