पाकिस्तान को परमाणु बम देने वाले डॉ क़दीर ख़ान पीएम इमरान ख़ान से निराश

इमेज स्रोत, Getty Images
पाकिस्तान परमाणु वैज्ञानिक डॉ अब्दुल क़दीर ख़ान पिछले कई दिनों से इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हैं.
डॉ ख़ान को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का जनक भी कहा जाता है. उन्होंने सोमवार को अपने इलाज में पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाया है.
डॉ ख़ान ने पाकिस्तान के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार डॉन से कहा है, ''मैं बहुत निराश हूँ. न तो प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और न ही उनकी कैबिनेट के किसी सदस्य ने मेरी सेहत के बारे में पूछताछ की.''
डॉ क़दीर ख़ान को पाकिस्तान में 'मोहसिन-ए-पाकिस्तान' यानी पाकिस्तान का रक्षक भी कहा जाता है.
डॉन से डॉ ख़ान ने कहा कि जब पूरा पाकिस्तान उनकी सेहत के लिए प्रार्थना कर रहा है, तब सरकार की तरफ़ से किसी ने एक फ़ोन तक नहीं किया. पाकिस्तान की सरकारी समाचार एजेंसी असोसिएटेड प्रेस ऑफ पाकिस्तान (AAP) के अनुसार 85 साल के डॉ ख़ान को 26 अगस्त को रिसर्च लेबोरेटरिज हॉस्पिटल में कोविड संक्रमित होने के बाद भर्ती किया गया था.
इसके बाद उन्हें रावलपिंडी में सेना के एक अस्पताल में भर्ती किया गया था.

इमेज स्रोत, Getty Images
पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार इससे पहले उन्हें इन्फेक्शन बढ़ने के कारण वेंटिलेटर पर रखा गया था. लेकिन अब कहा जा रहा है कि उनकी सेहत में सुधार हो रहा है और जल्द ही उन्हें घर में शिफ़्ट किया जा सकता है.
डॉन से डॉ ख़ान ने कहा कि उनकी स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है और उन्हें अब अलग से ऑक्सीजन लेने की ज़रूरत नहीं है. डॉ ख़ान ने कहा कि कई बार उन्हें अलग से ऑक्सीजन देनी पड़ रही है तो कई बार ऐसे ही काम चल जा रहा है.
डॉक्टरों को आज फ़ैसला करना है कि परमाणु वैज्ञानिक डॉ ख़ान अस्पताल में ही रहेंगे या उन्हें घर भेज दिया जाएगा. शुक्रवार को डॉ ख़ान की मौत की अफ़वाह सोशल मीडिया पर चलने लगी थी.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
हालाँकि डॉ ख़ान ने वीडियो मेसेज में शनिवार को कहा था, ''कुछ कृतघ्न लोग मेरी मौत की फ़र्ज़ी ख़बर चला रहे हैं. लेकिन मैं अपने प्रशंसकों से कहना चाहता हूँ कि मैं ज़िंदा हूँ और मेरी सेहत ठीक हो रही है.''
जब डॉ ख़ान को अस्पताल में भर्ती किया गया था तो पाकिस्तान के मुख्य विपक्षी नेता शहबाज़ शरीफ़ ने चिंता जताते हुए एक ट्वीट किया था.
अपने ट्वीट में शरीफ़ ने लिखा था, ''फ़ख्र-ए-पाकिस्तान डॉ अब्दुल क़दीर ख़ान के वेंटिलेटर पर शिफ़्ट होने की ख़बर बहुत दुखद है. मैं मुल्क से अनुरोध करता हूँ कि डॉ ख़ान की सेहत के लिए दुआ करें.''
शनिवार को पाकिस्तान के जिओ टीवी ने डॉ ख़ान के परिवार के हवाले से ख़बर प्रकाशित की थी कि उनकी सेहत पहले से ठीक है.

इमेज स्रोत, Getty Images
कौन हैं डॉ अब्दुल क़दीर ख़ान?
डॉ क़दीर ख़ान का जन्म अविभाजित भारत के भोपाल शहर में हुआ था. 1947 में विभाजन के बाद पाकिस्तान बनने पर डॉ ख़ान पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान आ गए थे.
पाकिस्तानी पत्रकार उमर फ़ारुक़ ने बीबीसी उर्दू के लिए इसी साल जनवरी में एक लेख लिखा था. इसमें उन्होंने डॉ क़दीर ख़ान से बात का ज़िक्र किया था, जिसमें भारतीय पत्रकार कुलदीप नैयर और डॉ ख़ान की बातचीत शामिल थी.
उमर फ़ारुक़ से डॉ ख़ान ने अतीत को याद करते हुए, कुलदीप नैयर की वो बात दोहराई थी. कुलदीप नैयर ने कहा था, "मैं सियालकोट से हूँ और अब नई दिल्ली में रहता हूँ. आप (डॉक्टर ख़ान) भोपाल से हैं और अब इस्लामाबाद में रहते हैं."
डॉ क़दीर के अनुसार कुलदीप नैयर का कहना था कि भारत का विभाजन एक 'श्राप' था.
डॉ ख़ान ने इस पर कहा था, ''मैंने जवाब में उनसे कहा था कि आपने जो कहा है, वह अब इतिहास का हिस्सा है और इतिहास को कोई भी बदल नहीं सकता है. आगे बढ़ो और इस सच को स्वीकार करो."
इस पर कुलदीप नैयर ने कहा था, "अगर आप दस बम बनाते हैं, तो हम एक सौ बनाएंगे." डॉ क़दीर का जवाब था, "इतनी बड़ी संख्या में बम बनाने की ज़रूरत नहीं है. दोनों तरफ़ तीन या चार ही काफ़ी होंगे."
डॉक्टर ख़ान ने कहा था, ''हम इस क़ाबिल हैं कि कम से कम समय में बम बना लेंगे."

इमेज स्रोत, Getty Images
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक
डॉ. अब्दुल क़दीर ख़ान को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है. इस साल एक अप्रैल को डॉ. ख़ान 85 साल के हो गए.
पेशे से इंजीनियर डॉ. ख़ान एक दशक से अधिक वक़्त तक परमाणु बम बनाने की तकनीक, मिसाइल बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन, मिसाइल में लगने वाले उपकरण और पुर्ज़ों के व्यापार में काम कर चुके हैं.
यूरोप में सालों तक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में पढ़ाई और काम कर चुके डॉ. ख़ान को मिसाइल बनाने का तरीक़ा भी आता था.
कहा जाता है कि डॉ. ख़ान ने परमाणु तकनीक की जानकारी और अपनी सेवाएं पाकिस्तान के अलावा लीबिया, उत्तर कोरिया और ईरान को दीं. इन देशों के परमाणु कार्यक्रम में वो एक अहम नाम बनकर उभरे.
लेकिन ये पाकिस्तान ही था, जहाँ उन्हें काफ़ी शोहरत हासिल हुई. कहा जाता था कि 1980 और 1990 के दशक में इस्लामाबाद के सबसे ताक़तवर व्यक्ति डॉ. ख़ान ही थे.
स्कूलों की दीवारों पर उनकी तस्वीरें दिखती थीं, उनकी तस्वीरें सड़कों-गलियों में पोस्टरों पर दिखती थीं. उन्हें 1996 और 1999 में दो बार देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ से भी नवाज़ा गया.

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत से लेकर यूरोप तक का सफ़र
डॉ. अब्दुल क़दीर ख़ान का जन्म अविभाजित भारत के भोपाल में 1935 में एक साधारण परिवार में हुआ था. उस वक़्त यहां ब्रितानी हुक़ूमत थी. जब भारत आज़ाद हुआ को ख़ान परिवार पाकिस्तान में जाकर बस गया.
1960 में पाकिस्तान के कराची विश्वविद्यालय से मेटालर्जी यानी धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद ख़ान ने परमाणु इंजीनियरिंग से संबंधित और पढ़ाई करने के लिए पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड्स का रुख़ किया.
साल 1972 में उन्हें एमस्टरडैम में मौजूद फिज़िकल डायनमिक्स रीसर्च लेबोरेटरी में नौकरी मिली. कंपनी छोटी थी लेकिन एक मल्टिनेशनल कंपनी यूआरइएनसीओ (यूरेन्को) के साथ इसका करार था. बाद में परमाणु उपकरणों और ख़ुफ़िया जानकारी के बाज़ार की दुनिया में डॉ. ख़ान के लिए उनका ये काम अहम रहा.
साल 1974 में जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, पाकिस्तान के ये इंजीनियर फिज़िकल डायनमिक्स रीसर्च लेबोरेटरी में ही काम कर रहे थे.
अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफ़ेयर्स में साल 2018 में छपे एक लेख में कहा गया था, "इस घटना ने डॉ ख़ान के भीतर छिपे राष्ट्रवाद को एक तरह से चुनौती दी और पड़ोसी मुल्क से बराबरी करने में पाकिस्तान की मदद करने की कोशिश करने लगे."
इसी साल उन्होंने पाकिस्तानी खुफ़िया विभाग के साथ काम करना शुरू कर दिया था.
पत्रिका के अनुसार सीआईए और डच की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने उनकी हरकतों पर नज़र रखना शुरू कर दिया था. लेकिन उन्हें रोकने की बजाय उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु हथियार बनाने की कोशिश और तस्करी के नेटवर्क के बारे में पता लगाने के लिए उनकी जासूसी करने का फ़ैसला किया.
पत्रिका में लिखा गया है, "इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि डॉ. ख़ान को उनकी जासूसी होने का पता था या नहीं. लेकिन दिसंबर 1975 में एक दिन अचानक डॉ ख़ान और उनक परिवार हॉलैंड छोड़कर पाकिस्तान चला गया."

इमेज स्रोत, Getty Images
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में डॉ. ख़ान की भूमिका
पाकिस्तान जाने के बाद सेंट्रीफ्यूज़ के जर्मन डिज़ाइन के आधार पर डॉ ख़ान ने एक प्रोटोटाइप बनाया. सेंट्रीफ्यूज़ के पुर्जे़ मंगवाने के लिए उन्होंने यूरोपीय कंपनियों से भी संपर्क किया.
इस दौरान उन्होंने बार-बार कहा कि उनके कार्यक्रम के पीछे सेना का कोई उद्देश्य नहीं है. लेकिन 1998 में हुए परमाणु परीक्षण के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि "मुझे कभी कोई संदेह नहीं था कि हम एक बम बना रहे हैं, हमें ये करना ही था."
लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान में उनका मिशन ख़त्म हो चुका था.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















