होमी जहांगीर भाभा की भविष्यवाणी क्या ब्रिटेन में सच साबित होने जा रही है?

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- Author, पीटर रे एलिसन
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
ब्रिटेन ने 2040 तक फ्यूज़न रिएक्टर वाला व्यावसायिक बिजलीघर बनाने का एलान किया है. क्या यह मुमकिन है?
न्यूक्लियर फ्यूज़न (संलयन) का विज्ञान 1930 के दशक से ही मालूम है जब प्रयोगशाला में हाइड्रोजन आइसोटोप के परमाणुओं का फ्यूज़न कराया गया था.
हम रोज़ाना इसे घटित होते देखते हैं. सूरज एक विशाल आत्मनिर्भर फ्यूज़न रिएक्टर की तरह काम करता है. इसी तरह दूसरे तारे भी.
तारों में फ्यूज़न उनके विशाल गुरुत्वाकर्षण बल से संचालित होता है जो परमाणुओं को एक-दूसरे में मिलाकर भारी परमाणु में बदल देता है. इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है.
धरती पर फ्यूज़न रिएक्टर बनाकर इस प्रक्रिया को दुहराना जटिल काम है. इसमें इंजीनियरिंग की चुनौतियां सामने आती हैं.
कई मायनों में फ्यूज़न की ख़ूबियां कीमिया (रसायन विज्ञान) से मिलती-जुलती हैं. प्राचीन फ़ारस के कीमियागर (रसायनशास्त्री) अपनी ज़िंदगी के कई दशक दूसरे धातुओं से सोना बनाने में खपा देते थे.
फ्यूज़न उसी तरह की प्रक्रिया है जिसमें हल्के परमाणुओं के नाभिक एक-दूसरे से जुड़कर भारी नाभिक में बदल जाते हैं और एक अलग रासायनिक तत्व का निर्माण होता है.

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बिजली बन सकती है, सोना नहीं
कीमियागरों को यह बात मालूम थी कि चूंकि सोना उनकी आँखों के सामने मौजूद है, वह किसी न किसी तरीक़े से बनाया गया होगा. उनको इस बात का अहसास नहीं था कि भारी तत्व, जैसे सोना, असल में फ्यूज़न से बने हैं. मरते हुए तारों में विस्फोट से ऐसे धातु अंतरिक्ष में बिखर गए हैं.
परमाणुओं के बीच फ्यूज़न शुरू कराने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए धरती पर हल्के तत्वों का फ्यूज़न ही कामयाब हो सकता है, जिसमें सोना नहीं बन सकता.
फ्यूज़न रिएक्टर में हाइड्रोजन आइसोटोप को डेढ़ करोड़ डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर गर्म किया जाता है जो सूरज की गर्मी के बराबर है. इससे प्लाज्मा बनता है जो पदार्थ की चौथी अवस्था है.
प्लाज्मा को चुंबकीय ताक़त से दबाया जाता है, जिससे हाइड्रोजन के आइसोटोप जुड़कर हीलियम में बदल जाते हैं और तीव्र गति वाले न्यूट्रॉन बाहर निकलते हैं. इस प्रतिक्रिया से 17.6 मेगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा मुक्त होती है जो सामान्य रासायनिक दहन से मिलने वाली ऊर्जा से एक करोड़ गुणा ज़्यादा है.
न्यूक्लियर फ़िशन (विखंडन) में भारी परमाणु टूटकर हल्के परमाणुओं में बदलते हैं. इसके उलट न्यूक्लियर फ्यूज़न में हल्के परमाणु जुड़कर भारी परमाणु में बदलते हैं.
इसका मतलब है फ्यूज़न में हानिकारक अपशिष्ट कम निकलते हैं. न्यूट्रॉन की बमबारी से फ्यूज़न प्लांट थोड़ा रेडियोधर्मी हो जाता है लेकिन ये रेडियोधर्मी उत्पाद अल्पकालिक होते हैं.
फ्यूज़न से प्रदूषण-रहित, जलवायु-अनुकूल ऊर्जा पैदा की जा सकती है. इसमें रेडियोधर्मी कचरा निकलने का ख़तरा भी नहीं है.
डिज़ाइन की चुनौती
परीक्षण रिएक्टरों, जैसे इंग्लैंड में कल्हम के जॉइंट यूरोपियन टोरस (JET) ने साबित किया है कि फ्यूज़न मुमकिन है, भले ही थोड़े समय के लिए.
चुनौती यह है कि इन परीक्षण रिएक्टरों को लगातार काम करने वाले बिजलीघरों में कैसे बदला जाए जो व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक भी हो. इसके लिए ज़रूरी है कि फ्यूज़न रिएक्टर चलाने में जितनी बिजली लगे उससे अधिक बिजली पैदा की जाए.
दशकों तक हमसे वादा किया गया कि व्यावसायिक फ्यूज़न बिजलीघर अगले 30 साल में हक़ीक़त बन जाएंगे.
1955 में भौतिक विज्ञानी होमी जहांगीर भाभा ने दावा किया था कि दो दशक के अंदर हमें फ्यूज़न से बिजली मिलने लगेगी. यह दावा और इसके बाद किए गए कई दावे पूरे नहीं हो पाए. हमेशा यही लगता रहा कि फ्यूज़न बस थोड़ी दूर है.
हमें मालूम है कि आदर्श स्थितियों में फ्यूज़न कैसे काम करता है. दुर्भाग्य से, वास्तविकता शायद ही कभी आदर्श होती है. फ्यूज़न इंजीनियरिंग की चुनौती है, वैज्ञानिक चुनौती नहीं.
ब्रिटेन के न्यूक्लियर एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग रिसर्च सेंटर के मुख्य कार्यकारी एंड्रयू स्टोरर कहते हैं, "चुनौती विज्ञान को लेकर नहीं है. वैज्ञानिकों को अब व्यावहारिक तौर पर काम करने वाली चीज़ तैयार करनी है."
हालात बदल रहे हैं
2019 में ब्रिटिश सरकार ने 2040 तक पूरी तरह से काम करने वाले फ्यूज़न रिएक्टर तैयार करने की योजना का ऐलान किया था.
इसका पहला चरण फ्यूज़न रिएक्टर में बिजली उत्पादन के लिए गोलाकार टोकामैक (STEP) का मास्टरप्लान विकसित करना है. यह डिज़ाइन ब्रिटिश फ्यूज़न रिसर्च के लिए ख़ास है. अब ब्रिटेन में STEP रिएक्टर के लिए सही जगह ढूंढ़ी जा रही है.
मगर 20 साल में पूरी तरह के सुचारू व्यावसायिक रूप से सफल फ्यूज़न रिएक्टर बनाना बड़ा काम है.
तुलना के लिए, हिंकले पॉइंट सी न्यूक्लियर फ़िशन रिएक्टर के 2025 तक तैयार हो जाने की उम्मीद है. प्रस्ताव से लेकर निर्माण तक इसमें 15 साल लग रहे हैं जबकि इसमें 1950 के दशक से चली आ रही फ़िशन तकनीक का इस्तेमाल होने वाला है.
इस बीच, फ्रांस में ITER फ्यूज़न रिएक्टर 70 फ़ीसदी बन चुका है. उम्मीद है कि 2025 में यहां प्लाज्मा तैयार हो जाएगा. यहाँ से 500 मेगावॉट बिजली मिलेगी, जो लिवरपूल के आकार के शहर के लिए पर्याप्त होगी.
यूके एटॉमिक एनर्जी अथॉरिटी के मुख्य कार्यकारी इयान चैपमैन कहते हैं, "ITER के बारे में बहुत कुछ ऐसा है जो विज्ञान गल्प की तरह लगता है."
"वहाँ एक बहुत बड़ा चुंबक बनाया गया है. उसकी चुंबकीय शक्ति इतनी जबर्दस्त है कि वह समुद्र से एक विमान को उठा सकती है."
ITER की डिज़ाइन ब्रिटेन के STEP रिएक्टर से बहुत अलग है. ITER का आकार डोनट जैसा है जबकि STEP में गोलाकार टोकामैक कॉम्पैक्ट डिज़ाइन का इस्तेमाल होगा. आकार घटने का अर्थ है चुंबक बहुत छोटे हो सकते हैं जिससे करोड़ों पाउंड की बचत होगी.
STEP रिएक्टर के निर्माण की योजना के एक हिस्से के तौर पर रॉदरहैम में न्यूक्लियर AMRC (एडवांस मैन्युफैक्चरिंग रिसर्च सेंटर) के पास नई फ्यूज़न रिसर्च फैसिलिटी बनाई जाएगी.
यहां रिएक्टर की अवधारणा डिज़ाइन को उपलब्ध निर्माण सामग्रियों से बनाई जा सकने वाली इमारत की डिज़ाइन में तब्दील किया जाएगा.
हक़ीक़त बनेगी फ्यूज़न बिजली
STEP रिएक्टर को हक़ीक़त बनाने वाली तकनीकों में से एक है सुपर-एक्स डायवर्टर. फ्यूज़न में सूरज के तापमान के बराबर गर्मी लगती है, इसलिए इस गर्मी को कहीं न कहीं जाना पड़ता है.
यदि यह गर्मी रिएक्टर की दीवारों तक पहुंच जाए तो वे तुरंत पिघल जाएंगी जिससे फ्यूज़न नाकाम हो जाएगा. इसकी बजाय प्लाज्मा की गर्मी डायवर्टर की ओर भेज दी जाती है.
चैपमैन कहते हैं, "प्लाज्मा निकास तैयार करना फ्यूज़न की प्रमुख तकनीकी चुनौतियों में से एक है. आसपास की सतह को नुक़सान पहुंचे बिना सह-उत्पादों और प्लाज्मा की अतिरिक्त गर्मी को हटाने की ज़रूरत होगी."
"MAST (Mega Ampere Spherical Tokamak) अपग्रेड में हम जिस नई तकनीक का परीक्षण कर रहे हैं उसमें तापमान घटकर कार इंजन के तापमान के बराबर आना चाहिए."
यह डायवर्टर फ्यूज़न प्रक्रिया में बनने वाली अपशिष्ट सामग्रियों को रिएक्टर से बाहर निकालने में मदद करता है.
जब अत्यधिक ऊर्जा वाले प्लाज्मा कण लक्ष्य से टकराते हैं तो उनकी गतिज ऊर्जा ऊष्मीय ऊर्जा में बदल जाती है जिसे विभिन्न तरीकों से ठंडा किया जाता है.
MAST अपग्रेड ने कुल्हम में पहला प्लाज्मा अक्टूबर 2020 में हासिल कर लिया.
मौजूदा बिजलीघर का इस्तेमाल
2040 तक लक्ष्य हासिल करने का एक तरीका मौजूदा बिजलीघर का इस्तेमाल करना भी हो सकता है जहां बिजली उत्पादन की पुरानी व्यवस्था को हटाकर नया STEP रिएक्टर लगा दिया जाए. इसका फ़ायदा यह है कि ऊर्जा रूपांतरण से बिजली बनाने की प्रक्रिया वही रहेगी.
स्टोरर कहते हैं, "यदि किसी मौजूदा टर्बाइन बिल्डिंग साइट पर टोकामैक बनाने का फ़ैसला किया जाता है तो मेरे लिए यह बहुत आसान हो जाएगा. बहुत सारा समय और पैसा पहले ही लग चुका है."
मुख्य बाधा नए फ्यूज़न रिएक्टर और मौजूदा बिजलीघर के बीच इंटरफेस बनाने की है. अफसोस की बात ये है कि बिजली घरों के लिए यूएसबी पोर्ट जैसी कोई चीज़ नहीं होती. फिर भी, पूरी तरह नया बिजलीघर बनाने में बहुत अधिक समय और पैसा लगता है. तुलनात्मक रूप से छोटे STEP रिएक्टर बनाना भी फ़ायदेमंद है.
"सूरज को बोतल में बंद करने" का वादा सच करने के लिए वर्षों का समय, ऊर्जा और संसाधन लगाए गए ताकि स्वच्छ और कभी न ख़त्म होने वाला ईंधन हासिल किया जा सके. 1930 के दशक में फ्यूज़न को मूर्खतापूर्ण समझा जाता होगा, लेकिन अब यह कुछ ही दशक दूर है.
(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप बीबीसी फ्यूचर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं)
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