नेपाल में क्यों फूंके गए पीएम मोदी के पुतले?

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नेपाल सरकार ने अपने नागरिकों के लिए एक कड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
पिछले कुछ दिनों से नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाए जाने के साथ - साथ भारत विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं. नेपाल सरकार ने इन प्रदर्शनों को रोकने के लिए ही ये चेतावनी जारी की है.
ये पहला मौका नहीं है जब हाल के सालों में भारत और नेपाल के बीच संबंधों में तनातनी की नौबत आई हो.
लेकिन सवाल ये उठता है कि अचानक ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से काठमांडू समेत अन्य जगहों पर भारत के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हुई.
इसका जवाब 30 जुलाई 2021 की उस घटना में मिलता है जिसमें एक तुइन के सहारे महाकाली नदी पार करते हुए एक नेपाली युवक जय सिंह धामी की मौत हो गयी.

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आख़िर क्या है मामला?
पिछले कुछ वर्षों से भारत और नेपाल के संबंधों में सीमा विवाद से लेकर तमाम अन्य मुद्दों को लेकर तनातनी देखी जा रही है. इनमें मधेसी आंदोलन से लेकर लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र पर हक़दारी का विवाद शामिल है.
लेकिन ताज़ा मामले ने भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में इन तमाम विवादों की वजह से खड़ी दीवार को और सख़्त कर दिया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, बीती 30 जुलाई को एक नेपाली युवक जय सिंह धामी एक तुइन (नदी के दोनों ओर बंधी रस्सी) के ज़रिए धारचुला क्षेत्र में महाकाली नदी को पार करने की कोशिश कर रहे थे.
लेकिन ये कोशिश नाकाम साबित हुई और इसके बाद से वह लापता हैं. अब धामी की गुमशुदगी को लेकर नेपाल और भारत के बीच विवाद बना हुआ है.
बीबीसी नेपाली सेवा के संवाददाता संजीव गिरी बताते हैं कि "जय सिंह धामी नेपाल के धारचुला ज़िले से भारत जा रहे थे. वह एक तुइन के सहारे महाकाली नदी को पार कर रहे थे. जाते वक़्त किसी तरह ये तुइन कट गया और उसके बाद से धामी के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
मौके पर मौजूद लोग दावा करते हैं कि सशस्त्र सीमा बल के जवानों ने तुइन को काट दिया जिसके बाद धामी महाकाली नदी में गिर गए. इसके बाद से वह लापता हैं."
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में पड़ने वाला धारचुला सीमावर्ती क्षेत्र है. काली नदी के इस पार भारतीय धारचुला है तो उस पार नेपाली धारचुला है. इस क्षेत्र में ज़्यादा पुल मौजूद नहीं हैं. इसकी वजह से लोग अवैध रूप से एक तुइन की मदद से नदी पार करते हैं और भारत में दाखिल हो जाते हैं.
इस घटना से पहले भी नदी के दोनों ओर इस तरह की अवैध तुइन देखी गयी हैं. और लोग पहले भी तुइन या टायर में बैठकर नदी पार करने की कोशिश करते रहे हैं.
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क्या कहती है नेपाल सरकार
इस घटना के बाद से नेपाल की राजधानी काठमांडु से लेकर धारचुला समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. लेकिन नेपाल सरकार ने भारत पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है.
गिरी बताते हैं, "नेपाल सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई थी जिसने अपनी रिपोर्ट नेपाल के गृह मंत्रालय को सौंप दी है. इसके बाद गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए एक बयान में बताया गया है कि घटना के वक़्त भारतीय सशस्त्र सीमा बल के जवान मौके पर मौजूद थे."
लेकिन इस एक विवाद के साथ ही नेपाल सरकार के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो गयी हैं. आम लोगों के साथ - साथ विपक्षी दलों द्वारा नेपाल सरकार पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसकी ओर से इस मामले में भारत के समक्ष पर्याप्त विरोध दर्ज नहीं कराया गया.
इसके बाद एक भारतीय हेलिकॉप्टर द्वारा कथित रूप से नेपाली सीमा क्षेत्र में उड़ान भरने से जुड़ी ख़बरों ने लोगों के गुस्से को भड़का दिया है.
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नेपाल सरकार के लिए नयी चुनौतियां
गिरी बताते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी का पुतला फूंके जाने की घटना हेलिकॉप्टर विवाद सामने आने के बाद ही हुई है.
वे कहते हैं, "नेपाल में लोग धामी के साथ जो कुछ हुआ, उस मुद्दे पर स्थिति साफ नहीं होने की वजह से पहले से नाराज़ थे. इसी बीच घटनास्थल पर भारतीय हेलीकॉप्टर उड़ने की न्यूज़ सामने आई है जिससे लोगों में काफ़ी गुस्सा देखा गया. इसी आक्रोश की वजह से बीते शुक्रवार अलग - अलग राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया है. और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत समाजवादी) के छात्र संगठन ने पीएम मोदी का पुतला फूंका है."
संजीव गिरी इसे रेखांकित करते हुए कहते हैं, "लोग एक तरफ तो जय सिंह धामी के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं. सड़कों पर उनके पक्ष में प्रदर्शन हो रहे हैं. लोग जानना चाहते हैं कि उस दिन उनके साथ असल में क्या हुआ था. लेकिन लोग हेलिकॉप्टर विवाद पर ख़ासे आक्रोशित हैं. उनका कहना है कि जो हेलिकॉप्टर नेपाल के क्षेत्र में आया था, वह नेपाल के मामले में हस्तक्षेप है. ये लोग चाहते हैं कि सरकार इस मामले में जोरदार ढंग से भारत के समक्ष विरोध दर्ज करे."
गिरी बताते हैं कि बीबीसी नेपाली सेवा से बात करते हुए राजनयिक मामलों के विशेषज्ञों ने कहा है कि सरकार को कम से कम भारतीय राजदूत को समन करना चाहिए था.
इस पर नेपाल सरकार ने कहा है कि वे विदेश मंत्रालय स्तर से संवाद स्थापित कर रहे हैं. यही नहीं, नेपाल सरकार ने बीते सोमवार कथित रूप से इस मामले में भारत सरकार को एक डिप्लोमेटिक नोट भी भेजा है. हालांकि, अब तक इस ख़बर की पुष्टि नहीं की जा सकी है.
लेकिन नेपाल में इन प्रदर्शनों को रोकने के लिए सरकार ने प्रदर्शनकारियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर ऐसी गतिविधियां जारी रहती हैं तो सख़्त कदम उठाए जाएंगे.
गिरि बताते हैं, "सरकार ने पुतला दहन को एक निंदनीय घटना करार देते हुए इसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए नेपाल के 77 ज़िलों के प्रशासन और नेपाल के सशस्त्र पुलिस बल को भी नोटिस दे दिया है."
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क्या कहती है भारत सरकार?
भारत सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है.
बीती 2 सितंबर को कांतिपुर प्रकाशन से जुड़े एक पत्रकार ने विदेश मंत्रालय प्रवक्ता अरिंदम बागची से पूछा था कि क्या भारत सरकार की ओर से इस मामले में कोई छानबीन की गयी है.
इस पर बागची ने कहा कि उन्हें इस बारे में आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी नहीं मिली है.
बीबीसी ने भी धारचुला और पिथौरागढ़ क्षेत्र में तमाम अधिकारियों से बात करके इस मुद्दे पर जानकारी हासिल करने की कोशिश की. लेकिन किसी भी अधिकारी ने रिकॉर्ड पर इस मुद्दे पर टिप्पणी नहीं दी.
धारचुला क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, नेपाल - भारत सीमा पर रहने वाले लोगों के बीच रोटी-बेटी के संबंधों को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट मानते हैं कि इस घटना पर जो आक्रोश नज़र आ रहा है, उसमें भारत-नेपाल के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी की एक भूमिका है.
भट्ट बताते हैं, "भारत और नेपाल के बीच इस क्षेत्र में रोटी-बेटी का संबंध है. लोग हमेशा से इस ओर से उस ओर आते जाते रहे हैं. कभी भी ऐसा कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ है. ये जो 30 जुलाई की घटना है, वो भी एक तरह से दुर्घटना ही है जिस पर सामान्य रूप से इतने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन नहीं होने चाहिए.
लेकिन दोनों देशों के बीच तनातनी एक लंबे वक़्त से चली आ रही है, ऐसे में इस मुद्दे को लेकर इतना विरोध दर्ज कराया जा रहा है. भारत और नेपाल के बीच इस क्षेत्र में एक पुल के निर्माण को लेकर भी एक करार हुआ था.
इस पुल के निर्माण से एक बड़ी आबादी को फायदा मिलेगा, कम से कम ढाई सौ किलोमीटर का चक्कर कम हो जाएगा. इस मामले में भारत की ओर से पैसा जारी भी कर दिया गया लेकिन पिछले कुछ समय से नेपाल की ओर से कोई रुचि न दिखाए जाने की वजह से ये योजना भी अधर में लटकी हुई है."
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