नेपाल-भारत संबंध: ओली के कार्यकाल में आई खटास कम कर पाएँगे शेर बहादुर देउबा?

इमेज स्रोत, NISHA BHANDARI/AFP via Getty Images
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
नेपाल में कई महीने से चल रही राजनीतिक उठापटक के बाद अब नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने हैं. अभी उन्हें सदन का विश्वास हासिल करना है. लेकिन उनके सत्ता संभालने के बाद भारत के साथ संबंधों को लेकर चर्चा का दौर शुरू हो गया है.
केपी शर्मा ओली के प्रधानमंत्री रहते दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी उतार-चढ़ाव वाले रहे. लेकिन क्या शेर बहादुर देउबा रिश्तों में बेहतरी ला पाएँगे? अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार कहते हैं कि ये मान लेना कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, जल्दबाज़ी होगी. क्योंकि अब भी नेपाल में राजनीतिक स्थिरता को लेकर कई सवाल बरकरार हैं.
हालाँकि काठमांडू स्थित वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे ये मानते हैं कि केपी शर्मा ओली और देउबा की कार्यशैली में काफ़ी अंतर है. यही विचार भारत और नेपाल के रिश्तों पर लंबे समय से नज़र रखने वालों का भी है.
केपी ओली का भारत को लेकर जो रवैया रहा है, उस पर बहस होती रही है. लेकिन उनके इस रवैए ने आम नेपाली मतदाताओं के बीच उनकी पैठ को मज़बूत करने और उन्हें एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित करने में मदद की है, जानकार इससे इनकार नहीं करते.
रिश्तों में कैसे आई खटास

इमेज स्रोत, Rojan Shrestha/NurPhoto via Getty Images
भारत में 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी, तो भारत-नेपाल रिश्तों में और बेहतरी आने की बात कही गई थी. लेकिन एक साल बाद ही स्थिति ने करवट बदली. दोनों देशों के बीच अमूमन सामान्य रहने वाले रिश्तों में खटास पैदा होने लगी. वर्ष 2015 में नेपाल के नए संविधान को लेकर भारत और नेपाल के बीच पहला विवाद शुरू हुआ था.
ओली ने उसी साल अक्तूबर महीने में ही प्रधानमंत्री का पद संभाला था. लेकिन सत्ता में आते ही उन्हें भारत की ओर से की गई 'आर्थिक नाकेबंदी' से पैदा हुए हालात का सामना करना पड़ गया. दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ता गया.
ओली ने उसी दौरान चीन के साथ व्यापार और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए दरवाज़े खोलने का काम किया. उन्होंने 'भारत पर नेपाल की निर्भरता' को भी ख़त्म करने के लिए चीन के साथ कई और समझौते कर डाले.
ओली ने भारत को लेकर कई और क़दम उठाए या बयान दिए, जिससे समझा जाने लगा कि उनका झुकाव चीन की तरफ़ ज़्यादा हो गया है.
उनका एक बयान तो भगवान राम को लेकर दिया गया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि श्रीराम का जन्म नेपाल में हुआ था और भारत ने "झूठा अयोध्या" बनाया है. ये बात पिछले साल की है, जब कोरोना महामारी ने पाँव पसारने शुरू कर दिए थे. इसी बीच उन्होंने ये भी कहा था कि "भारत का वायरस, चीन या इटली के वायरस से ज्यादा खतरनाक है."
उसी साल, ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने देश का नया मानचित्र जारी भी किया, जिसमे कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया. धीरे-धीरे नेपाल की जनता के बीच उनकी छवि भारत को चुनौती देने वाले नेता की बनने लगी.

इमेज स्रोत, HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES
विदेश मामलों के जानकार और लंदन के किंग्स कॉलेज के प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत कहते हैं कि भारत के दृष्टिकोण से अगर देखा जाए, तो ओली के हटने का मतलब ही है कि नेपाल और भारत के बीच संबंधों में नरमी आएगी. बीबीसी से बातचीत में पंत कहते हैं कि बतौर प्रधानमंत्री, अपने पिछले चार कार्यकालों में शेर बहादुर देउबा ने दोनों देशों के बीच रिश्तों को कभी ख़राब नहीं होने दिया था.
वो कहते हैं, "हालाँकि अपने कार्यकाल के बाद के दिनों में ओली ने भारत से संबंध बेहतर करने के दिशा में काफ़ी कोशिश भी की थी. लेकिन भारत ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया. ओली के रहते दोनों देशों के बीच रिश्तों ने बहुत सारे उतार चढ़ाव देखे."
परिपक्व नेता

इमेज स्रोत, Rojan Shrestha/NurPhoto via Getty Images
भारत के राजनयिक हलकों में देउबा को एक परिपक्व राजनेता के रूप में देखा जाता रहा है.
विदेश मामलों के जानकार ये भी मानते हैं कि ओली के कार्यकाल में ही नेपाल के मामलों में चीन ने ज़्यादा दिलचस्पी लेनी शुरू की थी. चीन की ही पहल पर नेपाल के सभी वाम दल एक गठबंधन में बंधे और जब ओली सरकार पर संकट आया, तो चीन ने अपनी कम्युनिस्ट पार्टी के विदेश विभाग के उप मंत्री गुओ येज़हाउ को वहाँ भेजा था.
ये भी माना जाता है कि चीन की ही पहल पर नेपाल की राजनीति के दो ध्रुव माओवादी नेता प्रचंड और ओली एक साथ आ पाए.
सत्ता की बागडोर बेशक अब देउबा के हाथों में आ गई हो, लेकिन नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे कहते हैं कि जो देश के ज्वलंत मुद्दे हैं, उन पर देउबा भी राष्ट्रीय भावनाओं को ही प्राथमिकता देंगे.
घिमिरे कहते हैं, "ये सही है कि विदेश मामलों को लेकर देउबा ज़्यादा परिपक्वता से काम लेते हैं और वो ओली की तरह भावनाओं में बहकर काम नहीं करेंगे. लेकिन ये भी समझना होगा कि नेपाल इस समय राजनीतिक उथल पुथल के दौर से गुज़र रहा है. अभी ये स्थिति लंबे समय तक बनी रहेगी. अभी देउबा के सामने सदन में विश्वासमत भी हासिल करने की चुनौती है. ऐसे में विदेश नीति में यथास्थिति बनी रहने की ही संभावना ज़्यादा है."
फ़िलहाल पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (संगठित मार्क्सवादी लेनिनवादी) के नेता माधव नेपाल ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं. इसलिए देउबा के सामने विश्वासमत हासिल करना बड़ी चुनौती है.

इमेज स्रोत, PRAKASH SINGH/AFP via Getty Images
भारत के कूटनीतिक हलकों में भी नेपाल में चल रही राजनीतिक उथल पुथल को लेकर विशेषज्ञों ने नज़र बनाई हुई है, क्योंकि चीन की भारत के इस पड़ोसी देश में दिलचस्पी बढ़ रही है.
हर्ष पंत के अनुसार भारत ने नेपाल को लेकर "कुछ नीतिगत ग़लतियाँ" ज़रूर कर डाली हैं, जिसको लेकर नेपाल की युवा पीढ़ी में तेज़ी से भारत विरोधी भावनाएँ बढ़ी हैं. वो ये भी मानते हैं कि भारत को इसे गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि नेपाल भारत से सांस्कृतिक रूप से जुड़ा रहा है. नेपाली इसे "बेटी-रोटी के साथ" के रूप में दखते रहे हैं.
वो कहते हैं कि भारत को चाहिए कि वो नेपाल के साथ रिश्ते बेहतर करने के लिए एक दीर्घकालिक नीति बनाए और वहाँ के मौजूदा राजनीतिक संकट को लेकर कोई जलदबाज़ी ना करे.
जानकार कहते हैं कि सीमा पर चीन के साथ पैदा हुई स्थिति को देखते हुए भारत को भी नेपाल से संबंध सुधारने की दिशा में काम शुरू कर देना चाहिए.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)













