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दक्षिण अफ़्रीका: नेल्सन मंडेला के पसंदीदा रहे जैकब ज़ूमा जेल क्यों गए- दुनिया जहान
तारीख़ थी आठ जुलाई 2021.
दक्षिण अफ़्रीका में आधी रात के क़रीब का वक़्त था. सरकारी वाहनों का एक काफिला एस्टकॉट शहर की जेल की तरफ बढ़ रहा था. ये काफिला जिस ख़ास क़ैदी को जेल छोड़ने जा रहा था, वो थे दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा.
हालांकि, ज़ूमा के जेल जाने के मायने ये नहीं थे कि उनके और दक्षिण अफ़्रीकी प्रशासन के बीच जारी लड़ाई ख़त्म हो गई है. इधर, ज़ूमा जेल की मज़बूत दीवारों के पीछे क़ैद हुए और उधर, देश के सबसे घनी आबादी वाले दो राज्यों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.
इनमें से एक ज़ूमा का गृह राज्य क्वाज़ुलू-नटाल था. प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, आगज़नी और ज़ोरदार हिंसा देखने को मिली. दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद का दौर ख़त्म होने के बाद इस तरह की हिंसा कम ही दिखी थी.
कई विश्लेषकों की राय में ये हिंसा ज़ूमा की गिरफ़्तारी की वजह से भड़की जबकि कई दूसरे लोगों ने कहा कि असमानता और दूसरे सामाजिक मुद्दों ने हालात को काबू से बाहर कर दिया.
इस बार दुनिया जहान में पड़ताल इसी सवाल की कि आख़िर दक्षिण अफ्रीका में भड़के दंगों के पीछे वजह क्या थी?
ज़ूमा को जेल
दक्षिण अफ्रीका में तनाव और हिंसा की शुरुआत 79 बरस के पूर्व राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा की गिरफ़्तारी के बाद हुई.
अफ़्रीका एशिया डायलॉग के सीनियर फ़ेलो मिल्टन एनकोसी ने पूर्व राष्ट्रपति ज़ूमा के राजनीतिक जीवन को क़रीब से देखा है.
मिल्टन बताते हैं, " मैं पूर्व राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा को अच्छी तरह से जानता हूँ. मैं उनसे कई बार मिला हूँ. जब वो राष्ट्रपति थे, तब मैंने उनका साक्षात्कार भी लिया है."
बीबीसी के पूर्व संवाददाता मिल्टन के मुताबिक़ ज़ूमा काफ़ी मिलनसार और विनम्र हैं. ज़ूमा किसी समय दक्षिण अफ्रीका के सबसे चर्चित राजनीतिक व्यक्ति थे. 1963 में उन्हें दस साल की सज़ा हुई थी. तब वो रंगभेद के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे. साल 1975 से 1990 तक वो निर्वासन में चले गए. जब लौटे तो अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस यानी एएनसी में नेल्सन मंडेला ने उन्हें अहम ज़िम्मेदारी दी.
मिल्टन एनकोसी बताते हैं, "नेल्सन मंडेला ने जैकब ज़ूमा को क्वाज़ुलू नटाल में शांति कायम करने की जिम्मेदारी दी. रंगभेद नीति की विदाई के बाद उन्होंने शांति के लिए जो प्रयास किए उसकी बहुत तारीफ़ हुई."
ज़ूमा एक ऐसे नेता के तौर पर सामने आए जो एएनसी के लिए जन समर्थन जुटा सकते थे. वो पार्टी में तेज़ी के साथ तरक्की करने लगे. साल 2007 में वो पार्टी अध्यक्ष बने और 2009 में दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति चुने गए. तब भी वो भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे थे लेकिन उन्हें वोटरों का भरोसा हासिल था.
मिल्टन एनकोसी कहते हैं, "ज़ूमा की लोकप्रियता की वजह ये थी कि उन्होंने ख़ुद को जनता के आदमी के तौर पर पेश किया. स्टेज पर वो रंगभेद नीति के ख़िलाफ़ गाने गाते रहे हैं. दक्षिण अफ़्रीका में शायद हर कोई उनके पसंदीदा गाने से वाकिफ़ है, जिसका अनुवाद करें तो बोल होंगे, मेरी मशीनगन ले आओ. ज़ूमा हर राजनीतिक रैली में कम से कम एक बार ये गाना ज़रूर गाते थे. एक दौर ऐसा भी था जब वो अपना भाषण ख़त्म करके जाने को होते तो जनता उनसे गाने की फरमाइश करती थी."
लेकिन जल्दी ही उन्हें हासिल जनसमर्थन घटने लगा. मिल्टन एनकोसी बताते हैं कि ज़ूमा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के वजह से एएनसी दो धड़ों में बंट गई. ज़ूमा पर धोखाधड़ी, रैकेटिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप थे. ये 1990 के दशक में हुई कई अरब डॉलर की हथियार डील से जुड़े थे.
निजी मकान की सजावट पर खर्च की गई बड़ी रकम को लेकर भी ज़ूमा सवालों के घेरे में थे. तमाम आरोपों और एएनसी के अंदर से बने दबाव के कारण जैकब ज़ूमा को फरवरी 2018 में राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा. उनकी जगह सिरिल रामाफोसा ने ली. राष्ट्रपति के तौर पर ज़ूमा ने जो कुछ आख़िरी फ़ैसले लिए थे, उनमें ज़ोंडो कमीशन का गठन शामिल था. इसके लिए हाई कोर्ट ने आदेश दिया था.
मिल्टन एनकोसी बताते हैं, "दक्षिण अफ़्रीका में स्टेट कैप्चर का मतलब है, उद्योगपतियों के प्रभाव में सरकारी विभागों में किया गया भ्रष्टाचार. उद्योगपतियों ने लाभकारी सरकारी ठेके पाने के लिए रिश्वत दी. जैकब ज़ूमा जब राष्ट्रपति थे तब ऐसा बड़े पैमाने पर हुआ. बरसों तक चले भ्रष्टाचार की जांच शुरू हुई तो लोगों को लगा कि आख़िरकार भ्रष्टाचार करने वाले लोगों के नाम उजागर हो सकेंगे."
जांच कमीशन ने ज़ूमा को पेश होने का आदेश दिया. साल 2019 में वो कई बार पेश भी हुए. उसके बाद उन्होंने जाँच में सहयोग करना बंद कर दिया. इस साल की शुरुआत में उनके इनकार के बाद दक्षिण अफ़्रीका की संवैधानिक कोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी कर दिया.
कैसे भड़की हिंसा?
दक्षिण अफ़्रीका के अख़बार 'डेली मैवरिक' की एसोसिएट एडिटर फेरियल हफ़ाजी बताती हैं, "ज़ूमा की गिरफ़्तारी के ठीक बाद संगठित कैंपेन चलाया गया और लोगों ने नाराज़गी जाहिर की. दो दिन बाद सैंकड़ों ट्रकों को आग लगा दी गई. इसके बाद कई दिन तक अराजक स्थिति बनी रही."
फेरियल आगे कहती हैं, "मैं मानती हूं कि ये विरोध राजनीति से प्रेरित था. पूर्व राष्ट्रपति के समर्थकों ने पहले सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चलाया. हैशटैग फ़्री जैकेब ज़ूमा. यहां कई लोगों ने चेतावनी दी कि वो ज़ूमा को जेल भेजे जाने का बदला लेंगे."
इसके बाद दो राज्यों क्वाज़ुलू नटाल और गौतेंग में हिंसा भड़क गई. जोहान्सबर्ग, प्रिटोरिया और डरबन जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर लूटपाट की गई. शॉपिंग मॉल्स में आग लगा दी गई. उपद्रवियों ने पुलिस के साथ संघर्ष किया.
फेरियल हफ़ाजी बताती हैं, "हिंसा काबू करने के लिए शुरुआत में ढाई हज़ार सैनिक भेजे गए. इस तैनाती का कोई असर नहीं दिखा. इसके बाद पच्चीस हज़ार सैनिकों को तैनात किया गया. उन्हें हिंसा को काबू करते-करते तीन दिन लग गए. ये तीन दिन तीन बरस के समान थे."
हिंसा करीब आठ दिन चली. इस दौरान 330 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई. हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया. अनुमान है कि इससे अर्थव्यवस्था को करीब 1.4 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ. फेरियल और दूसरे एक्सपर्ट घटनाओं की कड़ी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वो ये पता करने की कोशिश में है कि क्या ये विरोध प्रदर्शन अपने आप शुरू हुआ या योजना बनाकर तैयारी की गई थी?
फेरियल ने बताया,"हम में से कई लोगों ने व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए पता लगाने की कोशिश की कि आखिर प्लानिंग कैसे की गई थी? मुझे लगता है कि उनकी कोशिश देश को अपाहिज करने की थी. सड़कों को रोका गया. बिजलीघरों और संचार के संयंत्रों को जिस तरह नुक़सान पहुंचाने की कोशिश की गई, वो भी इसी तरफ इशारा करता है. गोदामों में लूटपाट की गई. इनमें से कुछ घटनाएं संगठित तौर पर की गईं लगती हैं."
अगर ये सही माना जाए कि उपद्रव की शुरुआत ज़ूमा के समर्थकों ने की तो सवाल ये भी उठता है कि राष्ट्रपति पद छोड़ने के तीन साल बाद भी लोग ज़ूमा के पीछे कैसे खड़े हैं? फेरियल इसके जवाब में कहती हैं कि बहुत से लोगों के लिए वो एक प्रतीक हैं. लोगों को लगता है कि ज़ूमा की ही तरह उनके सपने भी सच हो सकते हैं. हालांकि, वो ये भी कहती हैं कि ज़ूमा की लोकप्रियता सिर्फ़ उनके गृह राज्य तक है.
दंगे की बुनियाद
डेमोक्रेसी वर्क्स फ़ाउंडेशन के संस्थापक विलियम गुमेडे कहते हैं, "हिंसा की शुरुआत भले ही योजना बनाकर हुई हो. लेकिन यहाँ, इस देश में कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से लूटपाट और अगजनी मुमकिन हो सकी."
साल 2018 में विश्व बैंक ने दक्षिण अफ़्रीका को ऐसा देश बताया था, जहाँ असमानता सबसे ज़्यादा है. देश की आधी से ज़्यादा आबादी अब भी गरीबी रेखा के नीचे है. 20 फ़ीसदी सबसे अमीर लोगों का देश के करीब सत्तर फ़ीसदी संसाधनों पर कब्ज़ा है.
विलियम गुमेडे कहते हैं, "अब यहाँ गोरे-काले के बीच विभाजन नहीं है. काले लोग नए अभिजात्य हैं और अर्थव्यवस्था के दो स्तर तैयार हो गए हैं. पहले गोरों की व्हाइट इकॉनमी थी. तब उनके पास उम्दा निजी स्वास्थ्य सेवाएं, निजी शिक्षा और निजी सुरक्षा होती थी. अब जो काले लोग अमीर हैं उनके पास निजी सुरक्षा, निजी स्वास्थ्य सेवा और निजी शिक्षा व्यवस्था है. जबकि कालों की बड़ी आबादी के पास पैसे नहीं होते. वो सरकारी सुविधाओं के भरोसे हैं. सरकारी सुविधाएं बिल्कुल लचर हैं. दक्षिण अफ्रीका में मज़ाक में कहा जाता है कि अगर आप सरकारी अस्पताल जाते हैं तो आप वहाँ मरने के लिए जा रहे हैं."
सवाल ये भी है कि दक्षिण अफ़्रीका में लोकतांत्रिक व्यवस्था आने के बाद भी असमानता दूर करने की कोशिश क्यों नहीं की गई?
विलियम गुमेडे कहते हैं, "इसका जवाब ये है कि रंगभेद का दौर ख़त्म होने के बाद संसाधनों को बर्बाद किया गया. उनकी लूट की गई. हमारे पास जो संसाधन हैं, उनका सही तरीके से प्रबंधन नहीं किया गया. बतौर राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा के कार्यकाल के नौ साल के दौरान तीन से चार लाख करोड़ दक्षिण अफ़्रीकी रेंट की रकम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई. दक्षिण अफ़्रीका का सालाना बजट एक से लेकर डेढ़ लाख करोड़ रेंट होता है. मुझे लगता है कि इसे लेकर लोग नाराज़ हैं. वो कहते हैं कि ठीक है मैंने फ्रिज लूटा लेकिन जैकब ज़ूमा के राष्ट्रपति रहते उनके करीबियों ने लाखों करोड़ की रकम लूट ली और वो मजे में घूम रहे हैं."
विलियम गुमेडे की राय में असमानता और अन्याय की भावना ने दक्षिण अफ़्रीका के लाखों लोगों को भड़का दिया. कोविड-19 महामारी ने चुनौती को और भी गंभीर बना दिया. दक्षिण अफ़्रीका में बेरोज़गारी की आधिकारिक दर इस साल की पहली तिमाही में 32.6 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. काले लोगों की कुल आबादी में से ज़्यादातर लोग गैर संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं. सख्त लॉकडाउन के दौरान न काम मिला और न ही कोई कमाई हुई.
विलियम गुमेडे कहते हैं, "जो लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, उनके पास बीमा नहीं होता. उनके पास बचत नहीं होती है. लेकिन काले लोगों को सबसे ज़्यादा नौकरियां इसी सेक्टर में मिलती हैं. लॉकडाउन की वजह से उनकी नौकरियां चली गईं. उसकी बेचैनी हालिया दंगों के दौरान दिखाई दी."
कोविड-19 टीकाकरण के लिए जो इंतजाम किए गए हैं, कुछ लोग उसे लेकर भी नाराज़ हैं. विलियम के मुताबिक इसकी योजना अमीरों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है. वो कहते हैं कि ज़्यादातर टीकाकरण केंद्र अमीरों के मुहल्ले में हैं. श्रमिकों की बस्तियों से अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी होगी.
कैसे होगी भरपाई?
ज़ुबेरा इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डेवलपमेंट में सीनियर रिसर्चर बेनेडिक्ट दुबे कहते हैं, "अमेरिका की राजनीति में जॉर्ज फ्लायड की कोई अहमियत नहीं थी लेकिन उनकी मौत एक बड़े बदलाव की वजह बनी. इस घटना का लोगों ने इस्तेमाल किया. ऐसे ही ज़ूमा की गिरफ़्तारी को भी चिंगारी भड़काने के लिए इस्तेमाल किया गया. असल में दक्षिण अफ़्रीका एक खदबदाते ज्वालामुखी की तरह है जो कभी भी फूट सकता है."
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने हालिया दंगों को एक 'नाकाम बगावत' बताया. हालांकि, दंगे भड़कने के बाद लचर प्रशासन को लेकर उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
दक्षिण अफ़्रीका में समाज को एक करना आसान नहीं दिखता है. वहां करीब नौ नस्लीय समूहों के लोग रहते हैं और लोग नस्लीय आधार पर वोट डालते हैं. इनमें वेंडा और ज़ुलू नस्लीय समूहों के लोग शामिल हैं.
बेनेडिक्ट दुबे कहते हैं, "कई लोग रामाफोसा को राष्ट्रपति के बजाए वेंडा समूह के सदस्य के तौर पर देखते हैं. ये लोग घिसेपिटे अंदाज़ में सोचते हैं. अगर आप जैकब ज़ूमा को देखें तो उनका पूरा सुरक्षा घेरा ज़ुलू लोगों का था. अब अगर सिरिल रामाफोसा की बात करें तो उनके इर्द गिर्द भी वेंडा समूह के लोग दिखते हैं."
एएनसी ने करीब 27 साल पहले दक्षिण अफ़्रीका को उत्पीड़न से आज़ादी दिलाई थी. शांति और अनंत संभावनाओं का दरवाज़ा खोला था. बेनेडिक्ट दुबे कहते हैं कि अब एएनसी के लिए हवा रुख बदल गया है और बदलाव की आहट सुनाई देती है.
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि एएनसी दक्षिण अफ़्रीका के लिए दिक्क़त की वजह बन गई है. जिस चुनाव में सिरिल रामाफोसा राष्ट्रपति निर्वाचित हुए, उसमें साफ़ हुआ कि हर चुनाव के साथ एएनसी की हालत पतली हो रही है. हमारे देश में अच्छा ये है कि अब लोग गर्वनेन्स के नए तरीके को आजमाना चाहते हैं वो एएनसी को परे हटा रहे हैं."
वो आगे कहते हैं, "जहां भी बदलाव की ज़रूरत है, वहां संवाद के जरिए ही चीजें बदली जानी चाहिए. इस ज्वालामुखी को नस्लीय समूहों के बीच ईमानदार संवाद के जरिए ही ठंडा किया जा सकता है. राजनेता इसे शांत नहीं कर सकते. जैकब ज़ूमा भी समाधान नहीं निकाल सकते हैं."
दक्षिण अफ़्रीका में भड़के दंगों के दौरान मौजूदा सरकार को योजनाबद्ध तरीके से अस्थिर करने की कोशिश हुई. निहित स्वार्थ के लिए आग भड़काई गई. जन उबाल की सही वजह सामने आने में वक्त लगेगा. लेकिन जानकारों की राय है कि फिलहाल फोकस पुनर्निर्माण पर होना जाना चाहिए. उन समस्याओं को हल किया जाना चाहिए जिनकी वजह से समाज में असंतोष है. और जैसा कि हमारे तीसरे एक्सपर्ट विलियम गुमेडे आगाह करते हैं कि देश के इतिहास में इस दौर को कमतर करके नहीं देखना चाहिए. इसे भी समझना होगा.
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