पुतिन रूस के चुनाव को आख़िर कैसा बनाना चाहते हैं?

पुतिन

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    • Author, एडम रॉबिनसन
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

19 सितंबर को होने वाले रूस के निचले सदन के चुनाव ने देश के राजनैतिक पटल पर काफ़ी गहरा प्रभाव छोड़ा है, वो भी तब, जब अभी तक एक भी वोट नहीं पड़ा है.

राष्ट्रपति पुतिन के सत्ता में आने के बाद रूस में चुनाव नाममात्र के ही रह गए हैं, क्योंकि देश के राजनैतिक समीकरणों पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.

इस सबके बावजूद, रूस इस बार बहुत कड़े क़दम उठा रहा है, ताकि इस बार के चुनाव भी पिछले चुनावों की तरह कोई परिवर्तन ना ला सकें और इसी के साथ रूस की राजनीति एक नई, और भी ज़्यादा सत्तावादी दिशा में बढ़ रही है.

इससे पहले, रूस प्रशासन ने लोगों को कुछ हद तक विरोध करने की क्षमता दी हुई थी, जो वहाँ तक सीमित थी, जहाँ उसका प्रभाव किसी राजनीतिक परिस्थिति पर ना पड़े.

विपक्ष

रूसी प्रशासन के इस क़दम का मुख्य लक्ष्य कथित तौर पर अव्यवस्थित विपक्ष रहा है, जिसका नेतृत्व विपक्ष के नेता और भ्रष्टाचार विरोधी प्रचारक एलेक्सी नवेलनी हैं.

नवेलनी के इस अभियान के दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं. पहला, उनकी भ्रष्टाचार विरोधी फ़ाउंडेशन एफबीके और दूसरा, उनके क्षेत्रीय समर्थकों का मज़बूत नेटवर्क, जिसे इस साल की शुरुआत में अतिवादी घोषित कर दिया गया था, जिसके चलते दोनों को ही आधिकारिक रूप से तोड़ना पड़ा.

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नवेलनी के आंदोलन के खिलाफ़ ये क़दम तब उठाया गया, जब उन्हें दो साल और आठ महीने के लिए जेल की सज़ा सुनाई गई थी, जिसे राजनैतिक बदले के रूप में देखा जाता है.

नवेलनी के संगठनों को अतिवादी घोषित करने के कुछ समय बाद ही एक क़ानून पारित किया गया, जिसके अंतर्गत कोई भी ऐसा व्यक्ति रूस में चुनाव नहीं लड़ सकता, जो किसी आंदोलन से जुड़ा हुआ हो.

यह एक ऐसा क़दम था, जिसका निशाना साफ़ तौर पर नवेलनी और उनसे जुड़े हुए लोग थे.

इससे पहले चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवारों को खड़ा होने से रोकने के लिए यह शर्त थी कि वे बड़ी संख्या में मतदाताओं का हस्ताक्षर लेकर आएँ. किसी भी साधारण प्रत्याशी के लिए, बिना रूसी सरकार की सहायता के ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल होता था.

लेकिन इस तरीक़े ने 2018 के मॉस्को सिटी काउंसिल चुनाव में काफ़ी समस्याएँ खड़ी कीं, जब बहुत से विपक्षी नेताओं ने चुनाव में खड़े होने लायक हस्ताक्षर जुटा लिए.

उन्हें चुनाव लड़ने से तभी रोका जा सका, जब चुनाव अधिकारियों ने बड़ी संख्या में हस्ताक्षरों को जलसाज़ी बताते हुए, उन्हें ख़ारिज कर दिया, जिसके बाद वहाँ बड़ी संख्या में प्रदर्शन हुए.

अतिवादी घोषित किए जाने पर, चुनाव लड़ने पर लगने वाले प्रतिबंध का असर रूस में देखा जा सकता है.

जून के अंत में, इल्या याशीन जो एक विपक्षी नेता हैं और पहले नेवेलनी के साथ काम कर चुके हैं - उन्होंने बताया कि उन्हें 2022 के मॉस्को सिटी इलेक्शन में हिस्सा लेने से मना कर दिया गया और उन्हें मतदाताओं से हस्ताक्षर लेने की अनुमति भी नहीं दी गई.

याशीन ने बताया कि उनका पक्ष सुने बिना ही चुनाव अधिकारियों ने रूसी प्रशासन के निर्णय को सही मान लिया, जिसने मुझपर अतिवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था.

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'टेक्टिकल वोटिंग' का ख़तरा?

ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि नवेलनी के आंदोलन की एक पहल- 'स्मार्ट वोटिंग' भी रूसी सरकार के निशाने पर आ सकती है.

स्मार्ट वोटिंग एक तरीक़े की टेक्टिकल वोटिंग है, जो लोगों को एक व्यक्ति विशेष को वोट देने के लिए प्रेरित करती है, ना कि उनकी पार्टी को और रूस की मौजूदा सरकार को हराने का यह सबसे असरदार तरीक़ा हो सकता है.

बहुत सारे जानकारों के मुताबिक़, रूस में लोगों पर अतिवादी होने का आरोप लगाया जा रहा है ताकि वे चुनाव में ना खड़े हो सकें.

रूसी मीडिया की वॉच-डॉग संस्था रोस्कोमनादज़ोर पहले ही गूगल पर दबाव बना रही है ताकि वो स्मार्ट वोटिंग से जुड़ी हुई वेबसाइटों का समर्थन ना करें.

जहाँ एक तरफ जानकारों और रूसी अधिकारियों को शक है कि समार्ट वोटिंग का चुनाव पर कोई प्रभाव पड़ सकता है, वहीं रूस की जानी-मानी वेबसाइट मेडूज़ा ने अनाम रूसी अधिकारियों का हवाला देते हुए नवंबर 2020 में कहा था कि राष्ट्रपति पुतिन यह मानते हैं कि स्मार्ट वोटिंग एक ख़तरा साबित हो सकती है.

साथ ही साथ राजनैतिक विरोधियों के अलावा रूसी सरकार यह कोशिश भी कर रही है कि बड़े और प्रभावशाली स्वतंत्र मीडिया संस्थानों पर भी शिकंजा कसा जाए.

उनकी इस पहल का सबसे पहला शिकार रहा है - लातविया में स्थित मेडूज़ा, जो रूस की सबसे बड़ी ऑनलाइन न्यूज़ साइट्स में से एक है.

मेडूज़ा को 'फ़ॉरेन एजेंट' घोषित कर दिया गया था. रूस में फ़ॉरेन एजेंट उन संस्थाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो राजनैतिक रूप से सक्रिय हैं और विदेश से फ़ंड पाती हैं.

इस निर्णय के बाद ही मेडूज़ा को सक्रिय रहने के लिए डोनेशन पर आश्रित होना पड़ा क्योंकि विज्ञापनदाताओं ने अपने हाथ उनसे खींच लिए.

विपक्ष और स्वतंत्र मीडिया पर लगातार हो रहे हमलों के साथ-साथ आरोपों की एक झड़ी भी लगी हुई है जिसके तहत इन दोनों को ही रूस को राजनैतिक रूप से अस्थिर करने के पश्चिमी देशों के प्रयासों के नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है.

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ग़लती की कोई गुंज़ाइश नहीं

चुनावी प्रक्रिया की तरफ देखें तो भी रूसी सरकार कुछ भी किस्मत पर नहीं छोड़ना चाहती और ऐसे कई तरीक़े अपनाती हुई दिख रही है, जिससे चुनावों के नतीजे उनके मुताबिक़ ही रहें.

इन तरीक़ों के साथ ही पहले से चले आ रहे तरीक़े, जैसे कि बैलेट-स्टफ़िंग, क्राउसल वोटिंग और सरकारी कर्मचारियों को मौजूदा रूसी सरकार के उम्मीदवारों को ही वोट देने के लिए मजबूर करने जैसे काम किए जा रहे हैं.

अब नये नियम के अनुसार, चुनाव तीन दिन तक चल सकते हैं और वोट ऑनलाइन भी डाले जा सकते हैं.

हालांकि, इस तरीक़े के क़दम एक लोकतांत्रिक देश में विवादित नहीं हो सकते हैं, लेकिन रूस जैसे देश में, जहाँ चुनावी फ़र्ज़ीवाड़ों का इतिहास रहा है, वहाँ ऐसे नियम स्वतंत्र पर्यवेक्षकों के लिए चुनाव पर नज़र रख पाना मुश्किल कर देंगे.

मेडूज़ा में नवंबर में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, मौजूदा रूसी सरकार के अधिकारी यह उम्मीद कर रहे हैं कि तीन दिन तक चुनाव होने से उन्हें चुनाव के नतीजों को 'ठीक' करने का मौक़ा मिल जाएगा और वो अपने मन मुताबिक़ नतीजे बना पाएँगे.

चुनाव प्रक्रिया में किए गए बदलावों का एक परीक्षण 2020 में ही हो गया था, जब देश भर से इस बात पर वोट माँगा गया था कि देश के संविधान में कुछ बदलाव किए जाएँ, ताकि राष्ट्रपति पुतिन अगले दो (छह-छह साल के) टर्म भी चुनाव लड़ पाएँ.

उस चुनाव के अपने परीक्षण में स्वतंत्र संस्था आईइएमओजी के प्रमुख सेर्गेई श्पिलकिन ने बताया कि पुतिन के सत्ता में आने के बाद से किसी भी चुनाव में मतों की जोड़-तोड़ और जालसाज़ी, अपने चरम पर है.

रूस में मतगणना के पैटर्न को देखें, तो पता चलेगा कि पुतिन के पक्ष में वोट पड़ने की संभावना लगभग 20 मिलियन नकली वोटों के पड़ने से बढ़ गई है.

ऐसा ही एक और क़दम रूसी सरकार ने उठाया है, जिसके अंतर्गत चुनाव केंद्रों की लाइव रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे सिर्फ़ कुछ ही लोगों को उपलब्ध कराया जायेगा.

रक्षा मंत्री रूस

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नई पार्टियाँ, नए चेहरे, पर बदलाव कुछ नहीं

एक निर्धारित तरीक़े से विपक्ष को दबाने की कोशिश और चुनाव के तरीक़ों से खिलवाड़ करने की वजह से रूसी सरकार को नई उभरती राजनीतिक पार्टियों के बनने की वजह के तौर पर देखा जा सकता है.

हालांकि, इनका इस इलेक्शन में जीतने का कम ही चांस है, लेकिन इन पार्टियों का मुख्य मक़सद संयुक्त रूस पार्टी के ख़िलाफ़ पड़ रहे वोटों को आपस में बाँटने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है.

रूसी सरकार ने यूनाइटेड रशिया की छवि को चमकाने के लिए कुछ उम्मीदवार भी खड़े किए हैं और दिमित्री मेदवेदेव, जो पुतिन के पुराने साथी होने के बावजूद रूस के कम लोकप्रिय नेता रहे हैं, को उनके पद से हटा दिया गया है.

चुने गए नए उम्मीदवारों में, सर्गेई शोईगू और सर्गेई लावरोफ़ जैसे नेताओं को शामिल किया गया है. इन्हें कई बार देश का मीडिया नायक के तौर पर दिखाता है जो रूस की सुरक्षा और पश्चिमी देशों को लेकर अपने आक्रामक रुख़ के लिए प्रसिद्ध हैं.

इन पाँच उम्मीदवारों में डेनिस प्रोत्सेन्को को भी शामिल किया गया है जो मॉस्को में कोविड-19 अस्पताल के प्रमुख हैं. इन्हें भी देश की मीडिया ने काफ़ी कवरेज दी है.

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ऐसे क़दम क्यों उठा गए?

ज़्यादतर रूसी जानकार मानते हैं कि ऐसे क़दम इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि ओपिनियन पोल के मुताबिक़, संयुक्त रूस पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है.

अधिकारियों को डर है कि कोविड के प्रबंधन, धीमे विकास और ख़राब जीवन गुणवत्ता की वजह से लोग पुतिन की पार्टी को सज़ा देने की कोशिश कर सकते हैं.

मेडूज़ा के नवंबर में छपे आर्टिकल के अनुसार, रूसी सरकार चाहती है कि आने वाले चुनाव में पुतिन की पार्टी दो-तिहाई अंतर से जीते. हालांकि, यह पिछली बार के मुताबिक़, 76 प्रतिशत सीटों तक कम हो सकता है, फिर भी इतने अंतर से जीतने पर पुतिन की पार्टी संविधान को बिना किसी दखलअंदाज़ी के बदल पाएगी.

खोजी वेबसाइट प्रोयेक्त के राजनैतिक विशेषज्ञ ग्रिगौरी गोलोसोव कहते हैं कि यह मरे हुए चुनाव हैं जिन्हें असली चुनाव की तरह दिखना पड़ेगा, लेकिन सिर्फ़ उन लोगों को सत्ता में रखने के लिए जो कि पहले से ही सत्तारूढ़ हैं. ये चुनाव ज़रूरी इसलिए हैं क्योंकि बिना चुनाव जीते, लोगों को यह बता पाना मुश्किल है कि उन्हें इतना बड़ा पद क्यों दिया गया.

हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि सितंबर में होने वाले इन चुनावों में कुछ भी हो सकता है, भले ही रूसी सरकार ने ऐसा ना होने देने के लिए कई क़दम उठाए हैं.

विपक्ष के नेता व्लादिमीर मिलोव कहते हैं कि पुतिन की पार्टी की लोगों की नज़र में अपनी साख बचाने की कोशिशें नाकाम रही हैं क्योंकि उनके ओपिनियन पोल के मुताबिक़ यह 30 प्रतिशत से भी नीचे आ गया है.

लेकिन गोलोसोव बताते हैं कि आधी सीटें सिंगल मेंबर वाले चुनाव क्षेत्रों से चुनी जाती हैं जिसकी वजह से पुतिन की पार्टी को संविधान में बदलाव करने की ताक़त मिल सकती है.

वो बताते हैं कि ऐसा लग रहा है, जैसे इस बार रूसी सरकार चुनावी मतों को बदलने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

वो कहते हैं कि इस बात का कोई भ्रम मत रखिए कि चुनाव में फ़ेयर रिज़ल्ट मिलेगा.

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