तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन की 'साइप्रस योजना' से इसराइल के खड़े हुए कान

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इसराइल सरकार ने बीते मंगलवार को तुर्की और साइप्रस के बीच खड़े हुए नए विवाद में साइप्रस का समर्थन करने की घोषणा की है.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने मंगलवार को कहा था कि साइप्रस विवाद का तब तक हल नहीं हो सकता जब तक कि ये स्वीकार न किया जाए कि वहाँ दो समुदाय हैं और दो सरकारें (देश) हैं, जिनका एक समान स्तर है.
वहीं संयुक्त राष्ट्र एक लंबे समय से दो हिस्सों में बँटे साइप्रस को मिलाने की कोशिशों में लगा हुआ है.
अर्दोआन के इस बयान की दुनिया भर में निंदा हो रही है. अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने खुलकर इस बयान का विरोध किया है.
आमने-सामने आए तुर्की और इसराइल

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लेकिन इसराइल ने इस मामले में एक क़दम आगे जाकर साइप्रस सरकार के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है.
इसराइल के विदेश मंत्री ने साइप्रस के विदेश मंत्री से बात करके कहा है कि साइप्रस को इसराइल का पूरा समर्थन है.
इसके बाद इस क्षेत्र में तुर्की और इसराइल में एक बार फिर टकराव होने की आशंकाएं बढ़ गई हैं.
ये पहला मौक़ा नहीं है जब तुर्की और इसराइल इस तरह खुलकर आमने-सामने आए हों. इसराइल और फ़लस्तीनी क्षेत्र के बीच जंग के दौरान तुर्की ने खुलकर इसराइल के ख़िलाफ़ बयानबाजी की थी.
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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने कहा था कि "तुर्की इसराइली जुर्म के ख़िलाफ़ न चुप रहा है और न रहेगा."
इसके साथ ही अर्दोआन और नेतान्याहू के बीच ट्विटर पर तीख़ी बयानबाजी तक हुई थी.
अर्दोआन ने कहा था कि "नेतन्याहू के हाथ फ़लस्तीनियों के ख़ून से रंगे हैं, वे अपने अपराध को तुर्की पर हमला कर नहीं छुपा सकते हैं.''
इस पर नेतान्याहू ने पलटवार करते हुए लिखा था, ''अर्दोआन हमास के बड़े समर्थकों में से एक हैं और इसमें कोई शक नहीं है कि वे आतंकवाद और जनसंहार को अच्छी तरह समझते हैं. मैं उन्हें सलाह देता हूँ कि नैतिकता का पाठ न पढ़ाएं.'
अर्दोआन इससे पहले अल-अक़्सा मस्जिद समेत कई मुद्दों पर इसराइल के ख़िलाफ़ उकसावे भरी बयानबाजी करते रहे हैं.
लेकिन साइप्रस पर तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने अपने जिस प्लान को सामने रखा है, उस पर इसराइल समेत अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र एवं ब्रिटेन ने विरोध किया है.
अर्दोआन का साइप्रस प्लान?

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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने सोमवार को संसद सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा है कि "साइप्रस की समस्या आज आपके कंधों पर आ गइ है. ये भविष्य में भी आपके कंधों पर रहेगा."
उन्होंने कहा कि ये एक महान काम है और ये पूरे तुर्की देश का काम है. इसके बाद मंगलवार को उत्तरी साइप्रस (तुर्किक सायप्रस क्षेत्र) में पहुँचकर अर्दोआन ने कहा कि "साइप्रस समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता जब तक ये स्वीकार न किया जाए कि वहाँ दो समुदाय हैं और दो राज्य हैं, जिनका एक समान स्तर है."
अर्दोआन ने ये बात तुर्की की सेना के साइप्रस पर आक्रमण की 47वीं बरसी पर कही.
इसके साथ ही उन्होंने साइप्रस को लेकर अपनी आगामी योजना के संकेत दिए हैं, जिससे भूमध्यसागरीय क्षेत्र में हलचल मच गई है.
उन्होंने कहा है कि "मारस (वरोशा का तुर्किक नाम) में एक नया युग शुरू होगा जिससे सभी को फ़ायदा होगा."
अर्दोआन ने जो कहा है, उसकी गंभीरता को समझने के लिए हमें साइप्रस के इतिहास में झाँकना होगा.

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क्या है साइप्रस विवाद
साइप्रस एक भूमध्यसागरीय द्वीप है जो तुर्की के दक्षिण में, सीरिया के पश्चिम और इसराइल के उत्तर पश्चिम में स्थित है.
यहां तुर्की और ग्रीक समुदाय के लोग रहते हैं, जिनके बीच एक लंबे समय से नस्ली विवाद जारी है.
साल 1974 में ग्रीक लड़ाकों की ओर से तख़्तापलट की एक घटना के बाद तुर्की की सेना ने इस द्वीप पर आक्रमण किया था.
इसके बाद तुर्की ने साइप्रस के मशहूर शहर वरोशा शहर को अपने कब्जे में ले लिया. बहुमंजिला इमारतों वाला ये शहर जो कभी पर्यटकों से भरा रहता था, पिछले 47 सालों से निर्जन पड़ा हुआ है.
तुर्की ने अपनी सेना में से 35 हज़ार सैनिकों को इस क्षेत्र में तैनात करके रखा हुआ है.
इस घटना के बाद से ये द्वीप दो हिस्सों में बँटा हुआ है. तुर्क साइप्रस वासियों ने अपने इलाक़े को एक स्वघोषित राष्ट्र का दर्जा दिया है जिसे सिर्फ़ तुर्की स्वीकार करता है.
वहीं, ग्रीक साइप्रस सरकार को संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका समेत दुनिया के कई राष्ट्र स्वीकार करते हैं.
संयुक्त राष्ट्र एक लंबे समय से इस द्वीप में एकीकरण के प्रयास कर रहा है. लेकिन अब तक यूएन को कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है.
टर्किश साइप्रस सरकार का एलान

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अर्दोआन ने नाम लिए बगैर संयुक्त राष्ट्र की असफलता पर टिप्पणी करते हुए कहा, "मारस (वरोशा का तुर्की नाम) में एक नए युग की शुरुआत होगी जिससे सभी का फ़ायदा होगा. हमारे पास ख़राब करने के लिए और 50 वर्ष नहीं हैं."
साइप्रस में टर्किश समुदाय के नेता इरिसन तातर ने मंगलवार को घोषणा की है कि सूनसान पड़े वरोशा शहर में से लगभग 3.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सैन्य क्षेत्र से नागरिक क्षेत्र में बदला जाएगा, जिससे ग्रीक समुदाय के साइप्रस वासी अचल संपत्ति आयोग के तहत अपनी संपत्तियों पर पुन: अधिकार हासिल कर सकें.
तातर और अर्दोआन की इस योजना का ग्रीक साइप्रस सरकार ने कड़ा विरोध किया है.
रिपब्लिक ऑफ़ साइप्रस के प्रधानमंत्री निकस एनास्टासिएस ने इसे "अस्वीकार्य" क़दम बताया है. उन्होंने कहा है कि "ये क़दम मौजूदा स्थिति को बदलता है या बदलने का प्रयास है."
ग्रीक साइप्रस सरकार के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह इस क़दम की कठोर निंदा करता है.
संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने किया विरोध

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वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि ये फ़ैसला "स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुरूप नहीं है जो कि स्पष्ट रूप से कहता है कि वरोशा का प्रशासन संयुक्त राष्ट्र द्वारा किया जाना चाहिए.
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अमेरिका तुर्की की शह पर टर्किश साइप्रस (गुट) द्वारा वरोशा में उठाए गए क़दम को एक उकसाने वाला, अस्वीकार्य क़दम मानता है जो कि सेटलमेंट टॉक्स में रचनात्मक रूप से शामिल होने से जुड़े उनके पूर्व समर्पण से मेल नहीं खाता है."
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का 550 प्रस्ताव ये कहता है कि वरोशा शहर के बाशिंदों के अलावा किसी अन्य पक्ष द्वारा इस क्षेत्र के किसी भी हिस्से को बसाने की कोशिश अस्वीकार्य है और ये माँग करता है कि इस क्षेत्र को प्रशासन के लिए संयुक्त राष्ट्र को सौंपा जाए."
यूरोपीय संघ की ओर से भी तुर्की के ख़िलाफ़ बयान आया है.
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ईयू के फॉरन पॉलिसी चीफ़ जोसेप बोरपेल ने कहा है कि यूरोपीय संघ साइप्रस के दोबारा एक होने को एक लक्ष्य के रूप में देखता है और सुरक्षा परिषद के दखल का समर्थन करता है.
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य देश है जबकि तुर्की ईयू का सदस्य नहीं है.
ब्रितानी विदेश मंत्री डॉमिनिक राब ने ट्वीट करके लिखा है, "वरोशा को आंशिक रूप से खोले जाने के राष्ट्रपति अर्दोआन से मैं बेहद चिंतित हैं. ये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के विपरीत है और इससे सायप्रस सेटलमेंट प्रक्रिया को कमतर करने का जोख़िम पैदा करती है. हम इस मुद्दे पर जल्द ही सुरक्षा परिषद के सदस्यों के साथ बात कर रहे हैं."
क्या कर सकता है इसराइल

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इसराइली विदेश मंत्रालय प्रवक्ता ने ट्वीट करके लिखा है "इसराइल तुर्की के हालिया क़दमों और वरोशा से जुड़े बयान को बेहद चिंता के साथ देख रहा है. इसराइल फिर कहता है कि वह साइप्रस के साथ एकजुट है और उसे हमारा पूरा समर्थन है. विदेश मंत्री लेपिड ने भी साइप्रस के विदेश मंत्री निकोस क्रिस्टोडोलाइडस से बात करके अपना समर्थन जताया है."
ऐसा माना जा रहा है कि तुर्की के इस क़दम से एक बार फिर दोनों मुल्कों और क्षेत्र में अशांति की स्थिति बन सकती है.
अंकारा के एक थिंक टैंक फॉरेन अफेयर्स इंस्टिट्यूट से जुड़े हुसैन बाग्ची मानते हैं कि अर्दोआन ये नहीं चाहते कि स्थिति जस की तस बनी रहे.
अमेरिकी समाचार वेबसाइट वॉइस ऑफ़ अमेरिका से बात करते हुए वे कहते हैं कि तुर्की सरकार टर्किश साइप्रस गुट को अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता दिलाने के अपने प्रयासों को आगे बढ़ाएगी.
वो कहते हैं, "अर्दोआन की रुचि स्थिति को जस का तस बनाए रखने में नहीं है. ये एक अन्य मुद्दा है जिसे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाएंगे, ये देखना होगा कि कितने देश उनके टू-नेशन सॉल्युशन (दो राज्यों के समाधान) वाले बयान को स्वीकार करेंगे, कुछ देश होंगे जैसे कि अजरबैजान या बांग्लादेश और संभवत: पाकिस्तान इसे स्वीकार्यता दे दे."
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ऐसा माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में अशांति भड़क सकती है क्योंकि अर्दोआन ने ग्रीक साइप्रस वासियों पर उस समुद्री क्षेत्र में ऊर्जा के भंडार तलाशने का आरोप लगाया है जिन पर टर्किश साइप्रस वासी अपना दावा करते हैं. ये माना जाता है कि इस क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के व्यापक भंडार है जिन्हें अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया है.
इसकी वजह से दोनों गुटों की नौसेनाएं आमने-सामने आ चुकी हैं, जिसमें अमेरिका और यूरोपीय संघ ने बीच-बचाव किया था.
एथेंस यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंटिस्ट सेंगिज अक्टर चेतावनी देते हैं कि तुर्की की बढ़ती आक्रामकता इस क्षेत्र में तनाव को बढ़ाएगी.
वॉइस ऑफ़ अमेरिका से बात करते हुए वे कहते हैं, "एक गैस फोरम है जहाँ साइप्रस, ग्रीस, मिस्र और इसराइल इकट्ठे होते हैं जो अंकारा की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसके हर क़दम के साथ अपने आर्थिक और सैन्य प्रयासों को मजबूती देते जाएंगे."
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