इसराइल में रा'म पार्टी के मंसूर अब्बास, जो किंगमेकर बनकर उभरे

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इमेज कैप्शन, यूनाइटेड अरब लिस्ट या रा'म पार्टी के प्रमुख डॉ. मंसूर अब्बास
    • Author, हरेंद्र मिश्र
    • पदनाम, यरुशलम से, बीबीसी हिन्दी के लिए

हाल ही में जब इसराइल अपने सबसे बुरे सांप्रदायिक दंगों से जूझ रहा था तब किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि यहां कुछ ही दिनों में एक अनोखी राष्ट्रीय एकता की सरकार का गठन हो सकता है, जिसमें हर सोच की पार्टियाँ- दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी- तो शामिल होंगी ही, साथ ही साथ एक महत्वपूर्ण अरब पार्टी भी इसमें अहम भूमिका निभाएगी.

लेकिन अब ये सब हक़ीक़त है. बिन्यामिन नेतन्याहू की इसराइली प्रधानमंत्री पद से विदाई हो गई है. इसराइली संसद में नयी गठबंधन सरकार के पक्ष में बहुमत होने के चलते नेतन्याहू को अपना पद गंवाना पड़ा है.

अब दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नेता नेफ़्टाली बैनेट ने इसराइल के नए प्रधानमंत्री का पद संभाल लिया है. यह इसराइल के लिए एक ऐतिहासिक मौक़ा है जो कि 1948 में उसके निर्माण के बाद से लेकर अब तक अकल्पनीय था.

राजनीतिक अस्थिरता से गुज़र रहे इसराइल में इसकी संभावनाएं कुछ समय से नज़र आ रही थीं मगर हाल के तनाव के कारण इसमें अड़चन पैदा हो गई थी.

ये नई सरकार सामुदायिक स्तर पर बुरी तरह से विभाजित इस क्षेत्र के लिए निश्चित तौर पर बहुत अहम पहल और प्रयोग साबित हो सकती है.

इस सरकार की ख़ास बात यह है कि इसमें शामिल हर पार्टी की अपनी विशेष अहमियत है और सभी का सहयोग अनिवार्य है.

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सरकार में शामिल होंगे अब्बास

120 सदस्यीय इसराइली संसद में महज 61 सदस्यों के समर्थन से बनने वाली इस सरकार के लिए अपने कार्यकाल का कोई भी दिन सहज नहीं होने जा रहा है.

ग़ौरतलब है कि सरकार में शामिल अरब पार्टी, रा'म (Ra'am), बाहर से सरकार का समर्थन नहीं कर रही बल्कि उसका हिस्सा है.

दैनिक ह'आरेत्ज़ के पत्रकार अंशेल फ़ेफ़र ने विपक्ष के नेता याइर लापीद द्वारा राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन को सरकार गठन को लेकर पर्याप्त समर्थन जुटा लेने की सूचना देने के कुछ घंटे पहले एक ट्वीट किया था.

उन्होंने लिखा था, "आज रात और विश्वासमत होने तक के दिनों में चाहे जो कुछ भी हो, यह एक ऐतिहासिक तस्वीर है. एक अरब-इसरायली पार्टी के नेता और एक यहूदी-राष्ट्रवादी पार्टी के नेता एक साथ सरकार में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर कर रहे हैं."

उन्होंने ट्वीट के साथ रा'म पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास की एक तस्वीर पोस्ट की, जिसमें वो दक्षिणपंथी यमिना पार्टी के नेता नेफ़्टाली बेनेट और सेंट्रिस्ट यश अतीद के याइर लापीद के साथ गठबंधन समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए देखे जा सकते हैं.

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पहली बार अरब नेता की भागीदारी

यह तस्वीर गुरुवार को देश में चर्चा का विषय बन गई और सभी मीडिया आउटलेट इस "ऐतिहासिक क्षण" के बारे में बात करने लगे. इससे पहले किसी अरब नेता या पार्टी के इसराइली सरकार में शामिल होने की कल्पना किसी ने नहीं की थी.

इस अहम उपलब्धि से इसराइल में एक आशावादी रुख़ नज़र आ रहा है. सड़कों और मीडिया में भी एक अनदेखा उत्साह दिख रहा है.

लोगों को आभास है कि यह एक आसान प्रयोग नहीं है मगर आबादी का बड़ा हिस्सा इसके प्रति अनुकूल रवैया दिखाता नज़र आ रहा है. साथ ही साथ इस नए डेवलपमेंट ने कई सवाल भी खड़े किये हैं.

जिन बातों पर ख़ासकर चर्चा हो रही है, वो है-आख़िर यह कौन अरब नेता हैं जो लीक से हटकर इतना बड़ा फ़ैसला कर रहे हैं. क्या यह सरकार लंबे समय तक टिक पाएगी? इस गठबंधन का इसराइल के अंदर, क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या असर होगा?

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मास्टर डिग्री भी हासिल कर रहे हैं अब्बास

यूनाइटेड अरब लिस्ट या रा'म पार्टी के प्रमुख डॉक्टर मंसूर अब्बास पेशे से दंत चिकित्सक हैं. 47 वर्षीय अब्बास का जन्म इसराइल के उत्तरी हिस्से में हुआ था.

वो युवावस्था से ही राजनीति में सक्रिय हैं और हिब्रू विश्वविद्यालय में अरब छात्र समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं. वर्तमान में अब्बास हाइफा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री के लिए अध्ययनरत भी हैं.

डॉक्टर अब्बास इस्लामी आंदोलन की दक्षिणी शाखा के उपाध्यक्ष भी हैं. हालांकि वो इसराइल के उत्तरी इलाक़े के रहने वाले हैं मगर दक्षिणी इलाक़ों में उनका अच्छा बोलबाला है.

उन्हें इसराइल के दक्षिणी इलाक़ों में ख़ासा समर्थन मिला, जिसके बदौलत उनकी पार्टी सारी अटकलों को झुठलाते हुए संसद में स्थान बना पाई. इसराइली चुनावी नियमों के मुताबिक़ किसी भी पार्टी को संसद में शामिल होने के लिए न्यूनतम 3.25 प्रतिशत वोट पाना होता है.

किसी समय इस नियम को बनाए जाने की वजह अरब पार्टियों को संसद से दूर करना था मगर इसकी वजह से उनमें एकता हुई और पिछले कुछ चुनावों में सभी अरब पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा है.

हालाँकि अब्बास का बाक़ी अरब पार्टियों से सैद्धांतिक मतभेद नज़र आया और उन्होंने उनका साथ छोड़ने का फ़ैसला किया. इस फ़ैसले को कई लोगों ने आत्मघाती बताया और शुरुआती दौर में ऐसा लगा कि वो न्यूनतम वोट प्रतिशत की कसौटी पर भी सफल नहीं हो सकेंगे.

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सिद्धांतों पर कितने अडिग?

मंसूर अब्बास को क़रीब से जानने वाले बताते है कि सौम्य स्वभाव के अब्बास सैद्धांतिक मूल्यों पर अडिग रहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कितनी भी बड़ी क़ीमत क्यों न चुकानी पड़े.

आश्चर्य की बात यह है कि जिस बात को लेकर उनका बाक़ी दिग्गज अरब नेताओं से मतभेद था, कोई उम्मीद नहीं कर सकता था कि उस पर उन्हें सफलता मिलेगी.

अब्बास का मानना है कि इसराइल में अरब आबादी के विकास के लिए ज़रूरी है कि उनके नेता मुख्यधारा की यहूदी पार्टियों के साथ मिलकर काम करें.

चुनावों के पहले जब उन्होंने यह बात खुलकर स्थानीय मीडिया में कही तो अरब नेताओं ने उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी.

इसके बावजूद वो इस बात को दोहराते रहे और इसका उन्हें ख़ामियाजा भी भुगतना पड़ा. बाक़ी की अरब पार्टियों ने आख़िरी चुनाव में उनकी पार्टी को अपने गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया.

चुनावी प्रचार शुरू करने के पहले ही डॉक्टर अब्बास ने घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी संसद में चुने जाने पर किसी भी मुख्यधारा की यहूदी पार्टी के साथ काम करने को तैयार है जो अरब लोगों की तरक्की के लिए उनकी शर्तों को मानने के लिए राज़ी हो जाए.

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अरब-यूहदी संबंधों पर असर

इसी सोच के तहत अब्बास प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का भी साथ देने को तैयार थे लेकिन उनके गठबंधन में शामिल दक्षिणपंथी पार्टियां उनकी पार्टी से हाथ मिलाने में असहज महसूस कर रही थीं.

इसराइली अरब आबादी को इस सोच पर तैयार करना और उनका समर्थन हासिल करना असंभव काम माना जा रहा था लेकिन अब्बास इसमें सफल रहे. यह कामयाबी उन लोगों के लिए आशा की किरण है जो अरब-यहूदी समुदाय के बीच अच्छे संबंधों के हिमायती हैं.

अब्बास और बाक़ी अरब नेताओं की सोच में एक और गूढ़ फ़र्क़ है. अब्बास इसराइली होने को लेकर असहज महसूस नहीं करते और अपनी पहचान का खुलकर ज़िक्र करते हैं.

वो फ़लस्तीनियों के साथ अमन के समर्थक हैं और उनका मानना है कि ऐसा होने से इसराइल को इस्लामी दुनिया में अपने आप कबूल कर लिया जाएगा.

अब्बास ने हालिया अब्राहम अकॉर्ड्स का यह कहते हुए विरोध किया कि अगर फ़लस्तीनियों के साथ संधि हो जाएगी तो इसराइल को अरब मुल्कों के साथ एक-एक करके संबंध जोड़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी.

वो इस्लामिक मूवमेंट चार्टर के सूत्रधार और लेखक भी हैं जो 'वासतिया इस्लाम' को पुष्ट करता है. यह एक उदारवादी सोच वाली मूवमेंट के तौर पर उभर कर सामने आया है जिसमे सामाजिक सुधार पर विशेष ज़ोर दिया जाता रहा है.

सरकार के गठन को लेकर अब्बास की राष्ट्रीय एकता की ज़्यादातर शर्तें इसी से प्रेरित हैं और उन्होंने ज़ोर दिया है कि इसराइल के अरब क्षेत्र में अपराध और हिंसा का मुक़ाबला करने पर बल दिया जाए. वो अरब समाज में अपराध उन्मूलन पर संसद की विशेष समिति के अध्यक्ष रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वो इस काम को लेकर बेहद गंभीर हैं.

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इसराइल की राजनीति में कैसे बनाई जगह?

जानकार सूत्रों के अनुसार उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विशेष प्रबंध करने की शर्त रखी है और विस्तार से उसकी रुपरेखा पर भी चर्चा की है.

कई जटिल मामलों पर ध्यान देने के बजाय डॉक्टर अब्बास ने व्यावहारिक रवैया अपनाते हुए अरब समाज के आतंरिक विकास पर बल दिया है. उनकी सारी शर्तें अरब आबादी की रोज़मर्रा की समस्याओं के समाधान और उनके जीवन स्तर को सुधरने के लिए कारगर क़दम उठाए जाने से जुड़ी हैं.

चुनाव के बाद एग्ज़िट पोल्स में कहा गया कि उनकी पार्टी न्यूनतम मत प्रतिशत की शर्त को पूरा नहीं कर पाएगी लेकिन वो लगातार आश्वस्त नज़र आए और कहते रहे कि वो सफल होंगे.

सफलता कुछ इस कदर उनके हाथ लगी कि चुनाव के बाद उन्हें किंगमेकर का ख़िताब मिला और निस्संदेह अगर नई सरकार बनती है तो वो उसके किंगमेकर साबित होंगे.

हालांकि इस बात से इनकार नहीं है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय एकता की सरकार तमाम विरोधाभासों से घिरी हुई है. इसराइली राजनैतिक स्पेक्ट्रम के हर धारा की पार्टियां इसमें शामिल हैं.

शायद ही कोई ऐसा मुद्दा होगा जिस पर इन सभी पार्टियों के बीच सर्वसम्मति की कल्पना की जा सके. ऐसे में इस सरकार के लिए हर दिन निकालना एक चुनौती होने जा रहा है. कभी भी एक छोटी सी चिंगारी भूचाल का रूप अख़्तियार कर इसे गिरा सकती है.

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कितने दिन चलेगी नई सरकार?

नई सरकार की कामयाबी उसी बात पर निर्भर होगी जिसने इस कल्पना को फ़िलहाल कारगर बनाया है. समझौता इस सरकार की कुंजी है और ये कितने दिन टिकेगी, ये भी इसी बात पर निर्भर है.

जिस तरह इसके गठन के दौरान सभी ने इसका परिचय दिया है वैसे ही आगे भी करते रहे तो इसके लंबा चलने की भी कल्पना की जा सकती है. वैसे राजनीति असंख्य संभावनाओं का खेल है और इसराइली राजनीति इससे अछूता नहीं है.

नई सरकार के गठन के बाद सत्ता के सुख से वंचित पार्टियों का इसकी ओर रुख़ करने की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता.

बमुश्किल दो हफ्ते पहले इसराइल अपने सबसे बड़े तनाव से गुज़र रहा था. अब धीरे-धीरे वो घाव भरते नज़र आ रहे हैं और जब ऐसा प्रतीत होने लगा था कि ग़ज़ा स्थित चरमपंथी संगठन हमास का इसराइल में बोलबाला मज़बूत हुआ है. अब्बास का इसरायली सरकार में शामिल होना इस दावे को कुछ हद तक खोखला करता है.

तनाव के दौरान अब्बास ने गठबंधन सरकार के गठन से संबंधित बातचीत बंद कर दी थी. मगर अब ऐसा लग रहा है कि वो अपने समर्थकों को साथ लेकर ही आगे बढ़े हैं.

ऐसे में हमास का पूरे फ़लस्तीनी आवाम का नेतृत्व करने के मंसूबे को ठेस पहुँची है. वैसे भी इसराइली अरब आबादी में विविधता देखी जा सकती है, जहाँ पूर्वी यरूशलम में हमास की मज़बूत पकड़ देखी जा सकती है वहीं उत्तरी इलाक़े जहाँ पर इसराइली नागरिकता वाले ज़्यादातर अरब रहते हैं और उनकी सोच काफ़ी अलग है.

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फ़लस्तीनी प्रशासन पर क्या होगा असर?

जहाँ तक फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के नेतृत्व वाली फ़लस्तीनी प्रशासन का सवाल है तो उनके लिए यह अच्छी ख़बर हो सकती हैं.

हालांकि औपचारिक तौर पर फ़लस्तीनी प्रशासन ने कहा है की उनके लिए यह मायने नहीं रखता की कौन इसराइली सरकार का नेतृत्व कर रहा है और उनके लिए सिर्फ़ सरकार की नीतियाँ मायने रखती हैं लेकिनएक अरब पार्टी का सरकार में शामिल होना उनके लिए दो स्तर पर लाभदायक है.

ऐसा होने से हमास की पकड़ और दावा कि वो पूरी फ़लस्तीनी आवाम का प्रतिनिधित्व करता है, कमज़ोर होगा और फ़लस्तीनी प्रशासन से बातचीत भी करने में आसानी होगी.

वैसे भी पश्चिम तट तक उनका प्रभाव सीमित हो जाने की वजह से इसराइल पर उनकी निर्भरता काफी ज़्यादा है और वो विरोध प्रकट करने के बावजूद किसी प्रकार का सहयोग बनाकर चलेंगे.

मध्यपूर्व के बदलते राजनैतिक रंगमंच पर यह बेहद अहम साबित हो सकता है. एक अरब पार्टी का सरकार में शामिल होना इसराइल की छवि को सुधारने में कारगर साबित हो सकता है और जिस तरह से यहूदी राष्ट्र अरब और इस्लामी दुनिया में अपनी मान्यता बढ़ने का प्रयास कर रहा है, उसमें इसे बल मिल सकता है.

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अरब दुनिया के वो राष्ट्र जो अभी भी इसराइल के साथ संबंध जोड़ने में असहज महसूस कर रहे हैं उनके सामने मंसूर अब्बास जैसे नेताओं को इसराइली प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाकर पेश करने से देश की विश्वसनीयता पर अच्छा असर पड़ सकता है.

हालांकि इसे फ़िलहाल कल्पना मात्र ही समझा जाए मगर जो कुछ इसराइल में हो रहा है वो भी हाल तक अकल्पनीय ही था.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन ने इसराइल के प्रति वो ढील नहीं दी है जो ट्रंप के शासनकाल में देखने को मिली थी. हालांकि अमेरिका लगातार इसराइल की हिफाज़त को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताता रहा है लेकिन इसराइल की हर शर्त मानने कोभी वो तैयार नहीं नज़र आता.

बाइडन प्रशासन ईरान के मामले में भी इसराइल से इत्तफ़ाक़ नहीं रखता. इसके अलावा भी कई ऐसे मसले हैं जिनको लेकर दोनों पक्षों में मतभेद बना हुआ है.

नई इसराइली सरकार का नेतृत्व एक ऐसे दक्षिणपंथी नेता करेंगे जो कि इन मामलों पर समझौता करने का जोख़िम नहीं उठा सकते. ऐसा करने से उनके समर्थक भाग खड़े होंगे.

अब्बास का सरकार में शामिल होना उनके लिए पहले से ही ख़तरे का संकेत बना हुआ है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े समझौते करना उनके लिए असंभव-सा काम होगा.

वैसे, इसराइल को दुनिया के उन मुल्कों में मान्यता दिलाना, जो उसके अस्तित्व को नकारते हैं एक ऐसा मसला है जिस पर अमेरीकी और यहूदी राष्ट्र में आम सहमति है और राष्ट्रीय एकता की सरकार इस एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है.

वीडियो कैप्शन, गज़ा में इसराइली सेना की कार्रवाई में 60 फलस्तीनी लोगों के मारे जाने की आलोचना हो रही है.
वीडियो कैप्शन, अमरीका और इसराइल की नई शुरूआत

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