इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू क्या अब भी खेल सकते हैं कोई दाँव

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इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू ने विपक्षी दलों के बीच गठबंधन सरकार बनाने को लेकर हुई सहमति के बावजूद हथियार नहीं डाले हैं.
नेतन्याहू ने संसद के दक्षिणपंथी सदस्यों से अपील की है वो गठबंधन को सरकार बनाने से रोकें.
विपक्षी दलों के गठबंधन के एलान के बाद पहली बार प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने संसद में दक्षिणपंथी वोटों से जीत कर आए सदस्यों से गठबंधन का विरोध करने की अपील की.
ट्विटर पर एक पोस्ट में उन्होंने गठबंधन को वामपंथी और ख़तरनाक बताया. उन्होंने इससे पहले गठबंधन सरकार बनाने के प्रयासों को "सदी का सबसे बड़ा छल" बताते हुए चेतावनी दी थी कि इससे इसराइल की सुरक्षा और भविष्य पर ख़तरा खड़ा हो जाएगा.
इसराइल में आठ पार्टियों ने सरकार बनाने के लिए गठबंधन बना लिया है, लेकिन नई सरकार को संसद में विश्वास मत हासिल करने के बाद ही शपथ दिलाई जा सकेगी.
अभी इसके लिए कोई तारीख़ तय नहीं हुई है, लेकिन समझा जाता है कि इसके लिए संसद का सत्र अगले सप्ताह बुलाया जाएगा. सदस्यों के पाला बदलने से नई सरकार के गठन में अभी भी मुश्किल खड़ी हो सकती है.
120 सीटों वाली इसराइली संसद क्नेसेट में 61 का बहुमत सिद्ध करने के लिए सभी आठ पार्टियों की ज़रूरत होगी. अगर गठबंधन बहुमत साबित नहीं कर पाता, तो वहाँ फिर से चुनाव कराने पड़ सकते हैं.
इसराइल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की चुनावी प्रक्रिया की वजह से किसी एक पार्टी के लिए चुनाव में बहुमत जुटाना मुश्किल होता है. इसी वजह से वहाँ पिछले दो सालों में चार बार चुनाव हो चुके हैं.
मार्च में हुए चुनाव में बिन्यामिन नेतन्याहू की दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी सबसे आगे रही थी, लेकिन वो सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं जुटा सकी जिसके बाद दूसरे नंबर की मध्यमार्गी येश एटिड पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया गया था.
नेतन्याहू की विदाई लगभग तय

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इसराइल में दूसरे नंबर की पार्टी को अन्य सहयोगियों के साथ सरकार बनाने का निमंत्रण दिया गया था. उन्हें बुधवार 2 जून की मध्यरात्रि तक बहुमत साबित करना था.
समयसीमा समाप्त होने के कुछ ही देर पहले विपक्षी नेता येर लेपिड ने घोषणा की कि आठ दलों के बीच गठबंधन हो गया है और अब वो सरकार बनाएँगे.
इसके साथ ही वहाँ नेतन्याहू की विदाई का रास्ता साफ़ हो गया है. नेतन्याहू इसराइल में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं और पिछले 12 साल से देश की राजनीति उनके ही इर्द-गिर्द घूमती रही है.
गठबंधन बनने के साथ ही इसराइल में राजनीतिक अनिश्चितता के बीच जारी अटकलों पर विराम लग गया क्योंकि गठबंधन पर सहमति होने को कई लोग असंभव बात मान रहे थे.
ऐसा नहीं हो पाने की सूरत में इसराइल में दो साल के भीतर पाँचवीं बार चुनाव करवाने की नौबत आ जाती.
गठबंधन के लिए हुए समझौते के तहत बारी-बारी से दो अलग दलों के नेता प्रधानमंत्री बनेंगे. सबसे पहले दक्षिणपंथी यामिना पार्टी के नेता नेफ़्टाली बेनेट प्रधानमंत्री बनेंगे.
बेनेट 2023 तक प्रधानमंत्री रहेंगे. उस साल 27 अगस्त को वो ये पद मध्यमार्गी येश एटिड पार्टी के नेता येर लेपिड को सौंप देंगे.

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आठ पार्टियों का गठबंधन
लेपिड ने बुधवार रात को गठबंधन का एलान करते हुए कहा, "ये सरकार इसराइल के सभी नागरिकों के लिए काम करेगी जिन्होंने हमें वोट दिया उनके लिए भी और जिन्होंने नहीं दिया उनके लिए भी. ये सरकार इसराइली समाज को एकजुट रखने के लिए हरसंभव काम करेगी."
इसराइली मीडिया में एक तस्वीर दिखाई जा रही है जिसमें येर लेपिड, नेफ़्टाली बेनेट और अरब इस्लामी राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास समझौते पर दस्तख़त करते दिखाई दे रहे हैं.
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मंसूर अब्बास ने पत्रकारों से कहा, "ये मुश्किल फ़ैसला था, हमारे बीच कई मतभेद थे, लेकिन सहमति पर पहुँचना अहम था."
उन्होंने कहा कि "समझौते में कई ऐसी चीज़ें हैं, जिनसे अरब समाज को फ़ायदा होगा."
इसराइल में नए गठबंठन में दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यमार्गी पार्टियाँ शामिल हैं. इन सभी दलों में राजनीतिक तौर पर बहुत कम समानता है, लेकिन इन सबका मक़सद नेतन्याहू के शासन का अंत करना रहा है.
नेतन्याहू ने दक्षिणपंथी यामिना पार्टी के नेता नेफ़्टाली बेनेट पर "लोगों को गुमराह करने" का आरोप लगाया था. वो बेनेट के पिछले बयानों की ओर इशारा कर रहे थे जिसमें उन्होंने लोगों से वादा किया था कि वो लेपिड के साथ जुड़ी ताक़तों के साथ नहीं जाएँगे.
नेतन्याहू पर आरोप और दो साल में चार चुनाव
71 वर्षीय नेतन्याहू इसराइल में सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेता हैं और इसराइल की राजनीति में एक पूरे दौर में उनका दबदबा रहा है.
लेकिन रिश्वतखोरी और धाँधली के आरोपों का सामना कर रहे नेतन्याहू की लिकुड पार्टी मार्च में हुए आम चुनाव में बहुमत नहीं जुटा पाई और चुनाव के बाद भी वो सहयोगियों का समर्थन नहीं हासिल कर सके.
इसराइल में पिछले दो सालों से लगातार राजनीतिक अस्थिरता बनी है और दो साल में चार बार चुनाव हो चुके हैं.
इसके बावजूद वहाँ स्थिर सरकार नहीं बन पाई है और ना ही नेतन्याहू बहुमत साबित कर पाए हैं.
नेतन्याहू के बहुमत नहीं साबित करने के बाद येर लेपिड को सरकार बनाने के लिए 28 दिनों का समय दिया गया था लेकिन ग़ज़ा में संघर्ष की वजह से इसपर असर पड़ा.
तब उनकी एक संभावित सहयोगी अरब इस्लामिस्ट राम पार्टी ने गठबंधन के लिए जारी बातचीत से ख़ुद को अलग कर लिया.
फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट हमास और इसराइल के बीच 11 दिनों तक चली लड़ाई के दौरान इसराइल के भीतर भी यहूदियों और वहाँ बसे अरबों के बीच संघर्ष हुआ था.

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'किंगमेकर'नेफ़्टाली बेनेट की भूमिका
इसराइल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की चुनावी प्रक्रिया की वजह से किसी एक पार्टी के लिए चुनाव में बहुमत जुटाना मुश्किल होता है.
ऐसे में छोटे दलों की अहमियत बढ़ जाती है, जिनकी बदौलत बड़ी पार्टियाँ सरकार बनाने के आँकड़े को हासिल कर पाती हैं.
जैसे अभी 120 सीटों वाली इसराइली संसद में नेफ़्टाली बेनेट की पार्टी के केवल छह सांसद हैं, लेकिन विपक्ष को स्पष्ट बहुमत दिलाने में उनकी भूमिका अहम बन गई थी.
बीबीसी के मध्य पूर्व मामलों के संपादक जेरेमी बोवेन का कहना है कि नेतन्याहू की हार उनके वामपंथी विरोधियों की वजह से नहीं बल्कि उन्हीं के दक्षिणपंथी सहयोगियों के कारण हुई जिन्हें उन्होंने अपने सख़्त रवैए की वजह से दुश्मन बना लिया था.
बोवेन कहते हैं कि नए गठबंधन से किसी को भी बड़े या नए फ़ैसलों की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. वो साथ ही कहते हैं कि गठबंधन के नेताओं का सारा ध्यान अभी नेतन्याहू को मात देने के बाद अपनी सरकार को बचाने पर रहेगा.
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