कोरोनाः पाकिस्तान तीसरी लहर से परेशान, इमरान ख़ान ने दी चेतावनी

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- Author, आबिद हुसैन
- पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी उर्दू संवाददाता
कोरोना वायरस से बचाव के लिए महविश भट्टी ने एक निजी लेबोरेटरी में जा कर वैक्सीन लगवाई. उनके पास यही आख़िरी रास्ता बचा था.
लाहौर में रहने वाली 35 साल की महविश ने फ़ोन पर बीबीसी को बताया, "मैं हताश थी और घबरा रही थी. मेरी मां अभी भी कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज़ का इंतज़ार कर रही हैं. मुझे लगा कि मेरा नंबर कभी आएगा ही नहीं. मैंने खुद से कहा कि बाज़ार में जो भी वैक्सीन उपलब्ध है उसे लगवा लेना ही बेहतर है."
हाल में महविश की नौकरी छूट गई थी. रूस की बनाई स्पुत्निक-V कोरोना वैक्सीन के लिए उन्होंने अपने बचाए पैसों से 12,000 रुपये खर्च दिए.
वो कहती है, "वैक्सीन तो मैंने लगवाया लेकिन ये मेरे बचाए पैसों के लिए झटका भी साबित हुआ."
हालांकि वो कहती हैं कि हो सकता है वैक्सीन लेने का उनका फ़ैसला अब तक का उनका सबसे समझदार फ़ैसला साबित हो.
महविश पाकिस्तान के उन दो फीसदी लोगों में शामिल हैं जिन्होंने वैक्सीन लगवा ली है. वैक्सीन के लिए लंबा इंतज़ार करने की बजाय उन्होंने पैसा खर्च कर वैक्सीन लगवाना सही समझा.

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अब धीरे-धीरे पाकिस्तान में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, बीते सप्ताह यहां संक्रमण के रिकॉर्ड मामले दर्ज किए गए.
पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क भारत में कोरोना वायरस ने जिस तेज़ी से अपने पैर पसारे हैं वो इस बात की ओर इशारा है कि ये महामारी किस कदर कयामत की शक्ल ले सकती है.
बीते कई दिनों से भारत में कई जगहों में ऑक्सीजन की कमी के कारण दम तोड़ते मरीज़ों और श्मशान घाटों में लाशें जलाने के लिए जगह कम पड़ने की ख़बरें मिल रही हैं.
मार्च के पहले सप्ताह में पाकिस्तान में कोरोना के 16,000 ऐक्टिव मामले थे लेकिन अप्रैल में ऐक्टिव मामले आठ गुना से अधिक हो गए.
अप्रैल में कोरोना के ऐक्टिव मामलों की संख्या 1,40,000 तक पहुंच गई. केवल इस एक महीने में यहां तीन हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई है. महामारी की शुरूआत से अब तक यहां एक महीने में कोरोना के कारण इतनी संख्या में मौतें नहीं हुई थीं.
आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो 28 अप्रैल को लाहौर के बड़े अस्पतालों के 93 फीसदी आईसीयू बेड मरीज़ों से भर चुके थे. वहीं कुछ और बड़े शहरों और पंजाब प्रांत में अस्पतालों में मौजूद 80 फीसदी वेन्टिलेटर और ऑक्सीजन वाले बेड मरीज़ों से भर गए थे.
अगर आने वाले दिनों में यहां कोरोना संक्रमण के मामले बढ़े तो देश के अस्पतालों में बेड की कमी हो सकती है.
योजना मंत्री असद उमर के अनुसार जितनी ऑक्सीजन सप्लाई देश के पास है उसका 90 फीसदी अभी इस्तेमाल हो रहा है और 80 फीसदी से अधिक का इस्तेमाल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किया जा रहा है.
वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने चेतावनी दी है कि देश में प्रति क़रीब 963 लोगों पर एक डॉक्टर है, ऐसे में अगर कोरोना वायरस ने पैर फैलाए तो भयंकर आपदा आ सकती है.
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पाकिस्तान में स्थिति कैसे बिगड़ी?
असद उमर से इस बात की पुष्टि की है कि मार्च के दूसरे सप्ताह में देश में कोरोना वायरस का ब्रितानी वेरिएंट देश में महामारी की स्थिति बिगड़ने की एक वजह हो सकता है.
बाद में उन्होंने कहा कि पहले के कोरोना वायरस स्ट्रेन के मुक़ाबले ब्रितानी वेरिएंट अधिक ख़तरनाक है.
लेकिन वायरस के फैलने की वजह केवल उसका होना नहीं बल्कि प्रशासन की उदासीनता भी रही.
कराची के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में से एक जिन्ना पोस्टग्रैजुएट मेडिकल सेंटर की कार्यकारी निदेशक डॉ सीमी जमाली कहती हैं, "महामारी की दूसरी लहर के बाद लोगों को लगा कि अब ये ख़त्म हो गया है. इसके बाद से शायद की कोई हो जिसने मास्क पहनने और सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करने जैसे गाइडलाइन्स को माना हो. अस्पतालों में भी लोगों ने सतर्कता बरतनी छोड़ दी."
देखा जाए तो पाकिस्तान कोरोना महामारी की पहली और दूसरी लहर के असर से अधिक प्रभावित नहीं हुआ था.
यहां महामारी की पहली लहर बीते साल मई-जून के महीने में आई थी लेकिन कुछ ही हफ़्तों में इसका असर कम पड़ने लग गया था. महामारी की दूसरी लहर बीते साल सितंबर के मध्य में आई और इस साल फरवरी के आख़िर तक रही.

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बीते साल फरवरी में पाकिस्तान में कोरोना संक्रमण के पहले मामले की पुष्टि हुई थी. इसके बाद के चौदह महीनों में यहां संक्रमण के आठ लाख मामले दर्ज किए जा चुके हैं जबकि 17 हज़ार लोगों की मौत हुई है.
लेकिन 21.6 करोड़ी से ज़्यादा की आबादी वाली इस देश में ये आंकड़े डराने वाले नहीं लगते. लेकिन समस्या ये है कि अब तक कोई निश्चित तौर पर ये नहीं बता सकता कि पाकिस्तान के महामारी पर जीत कैसे पाई.
डॉ सीमी जमाली कहती हैं ये केवल पाकिस्तान का "भाग्य" था कि महामारी बस इसे छू कर गुज़र गई. लेकिन उनकी राय से दूसरे जानकार इत्तेफाक नहीं रखते.
कराची के आगा ख़ान युनिवर्सिटी हॉस्पिटल में संक्रामक रोग विभाग के प्रमुख डॉ सैयद फ़ैसल महमूद कहते हैं, "सच कहूं तो हमें अभी भी यकीन नहीं है कि महामारी की पहली लहर अपेक्षाकृत कम प्रभावी क्यों हुई."
"पीछे मुड़ कर देखें तो इसका एक कारण ये हो सकता है कि उस वक्त महामारी पैर पसारती, उससे पहले ही कड़ा लॉकडाउन लगा दिया गया था."
लेकिन ताज़ा हालातों के बीच प्रधानमंत्री एक बार फिर लॉकडाउन लगाने को राज़ी नहीं है.
अप्रैल के आख़िर में इमरान ख़ान ने स्पष्ट कर दिया था कि वो ऐसा कोई कदम उठाना नहीं चाहते जिसका बुरा असर मज़दूरों और श्रमिक वर्ग पर पड़े. हालांकि उन्होंने ये भी कहा था कि "अगर हालात भारत जैसे हो गए" तो सरकार कड़े कदम उठाने के लिए बाध्य होगी.
आने वाली 'कयामत' से बचने की कोशिश
लेकिन महामारी की शुरुआत अब तक से वायरस को फैलने से रोकने के लिए फ़ैसले लेने वाले प्रांत एक बार फिर कोरोना के बढ़ते मामलों पर क़ाबू पाने के लिए नियंत्रण अपने हाथों में ले सकते हैं.
बीते साल मार्च में कठोर देशव्यापी लॉकडाउन के बाद केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों ने "स्मार्ट या माइक्रो लॉकडाउन" लगाने की फ़ैसला किया था और उन जगहों पर ध्यान केंद्रित किया जो महामारी के बुरी तरह प्रभावित थे.
ये रणनीति देश में काफी लोकप्रिय है. हालांकि आलोचक सरकार के इस तरीके के असर को लेकर कर आश्वस्त नहीं है.
डॉ. जमाली के अनुसार अधिक सतकर्ता बरतते हुए स्कूल बंद करने, रेस्त्रां को केवल टेक-अवे की अनुमति देना, लोग मास्क पहनें और सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करें ये देखने के लिए सेना को बुलाने जैसे कदमों का स्वागत किया जा सकता है लेकिन लॉकडाउन लगने में देरी करना कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता.
वो कहती हैं, "मेरी निजी राय ये है कि कड़े कदम उठाने का वक्त आ गया है. सरकार को लॉकडाउन लगाने चाहिए और तैयारी रखनी चाहिए. केवल लॉकडाउन की धमकी देने भर से काम नहीं चलेगा क्योंकि लोग सरकार की बात नहीं मान रहे हैं. देश की भलाई के लिए सरकार को अपने मज़बूत इरादों को ज़ाहिर करना ही होगा."

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लाहौर के हमीद लतीफ़ अस्पताल में कोविड-19 टीम के प्रमुख डॉ नसीम अली शेख़ कहते हैं, "देश में शादी समारोह और दूसरे त्योहारों को लेकर कोई रोक नहीं लगाई गई है. बड़ी संख्या में लोगों के एक जगह पर जमा होने से वायरस के फैलने का ख़तरा होता है."
वो कहते हैं, "ईद नज़दीक आ रही है, लोगों की भीड़ सड़कों पर उमड़ रही है और लोग कोरोना से जुड़े नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं. केवल कानून बनाने भर से कुछ नहीं होगा, अगर आने वाले दिनों में कयामत से बचना है तो इन नियमों को लागू भी करना होगा."

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वायरस पर क़ाबू पाने के लिए वैक्सीन की मदद
बेशक़ वायरस को रोकने का का एक तरीका लोगों को वैक्सीन देना भी है.
लेकिन इस साल के आख़िर तक देश की आधी आबादी को कोरोना वैक्सीन लगाने का सरकार का लक्ष्य पूरा होने से कोसों दूर दिख रहा है.
स्वास्थ्य मामलों में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के स्पेशल असिस्टेंट डॉ फ़ैसल सुल्तान के अनुसार दो फरवरी को टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद से पाकिस्तान में अब तक वैक्सीन की 20 लाख खुराक लोगों को दी गई है. हिसाब करें तो सौ लोगों में से 0.95 लोगों को कोरोना की वैक्सीन दी गई है.
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वहीं पड़ोसी भारत में इसी साल जनवरी में कोरोना टीकाकरण अभियान शुरू हुआ था. तब से लेकर अब तक देश में वैक्सीन की 15.88 करोड़ खुराक सदी जा चुकी है, यानी प्रति सौ लोगों में से 10.5 लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है.
डॉ सुल्तान के अनुसार पाकिस्तान ने वैक्सीन निर्माताओं के साथ वैक्सीन की 180 लाख डोज़ खरीदने का करार किया है और उसे अब तक इसमें से 50 लाख डोज़ मिल चुके हैं.
ड्यूक ग्लोबल हेल्थ इनोवेशन सेंटर द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान को कोरोना वैक्सीन की कम से कम 8.60 करोड़ खुराक की ज़रूरत होगी.
अपनी रिपोर्ट में द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने कहा है कि पाकिस्तान साल 2023 की शुरुआत तक देश की वयस्क आबादी के 60 से 70 फीसदी हिस्से के टीकाकरण का लक्ष्य हासिल कर सकेगा.
डॉ जमाली का मानना है कि कोरोना की वैक्सीन को लेकर दुष्प्रचार और इसे लेकर हिचक, टीकाकरण कार्यक्रम की गति धीमा करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. हालांकि वो मानती हैं कि "सरकार की वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया भी काफी धीमी है."
वहीं दूसरी ओर, डॉ शेख़ कहते हैं कि वैक्सीन के लिए पंजीकरण प्रक्रिया को आसान बनाकर सरकार टीकाकरण अभियान को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाने में सफल रही है, लेकिन ये काफी नहीं है.
वो कहते हैं, "दुर्भाग्य की बात ये है कि हमारी आबादी का अधिकांश हिस्सा न तो टीकाकरण के कॉन्सेप्ट को समझता है और न ही इसकी ज़रूरत को समझता है. सरकार को टीकाकरण अभियान में जागरूकता अभियान को भी शामिल करने की ज़रूरत है. इसके साथ-साथ सभी को कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए नियमों का भी सख्ती से पालन करना होगा."

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महविश भट्टी ने हाल में स्पुत्निक V वैक्सीन की दूसरी ख़ुराक ली है, लेकिन देश के दूसरे नागरिकों के लिए स्थिति बेहतर नहीं है.
महविश कहती हैं "टीकाकरण अभियान काफी धीमी गति से बढ़ रहा है. मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि मेरी उम्र के लोगों के लिए वैक्सीन लगवाने की बारी कब तक आएगी."
वो कहती हैं, "मेरा नसीब अच्छा है कि मैं अपने लिए वैक्सीन की दो ख़ुराक खरीद सकी लेकिन आम आदमी का क्या, मज़दूरों का क्या? उनके पास वैक्सीन की क़ीमत चुकाने के पैसे नहीं है. अगर उनके लिए टीका नहीं है तो वो क्या करेंगे?"
(ये रिपोर्ट लाहौर में मौजूद स्थानीय पत्रकार बेनज़ीर शाह की मदद से तैयार की गई है.)
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