कोरोनाः इन देशों ने वैक्सीन मँगा तो ली पर अब दूसरों को क्यों दे रहे हैं

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जहां कुछ देश वैक्सीन की खुराक कम पड़ने से परेशान हैं, वहीं कुछ देश उन वैक्सीन के निपटान के बारे में सोच रहे हैं जो उन्होंने मंगा तो लीं लेकिन अब सुरक्षा कारणों से उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है.

कई देशों ने ख़ून के थक्के बनने के थोड़े बहुत ख़तरे को देखते हुए ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन के युवाओं में इस्तेमाल पर रोक लगा दी है.

डेनमार्क ने भी एस्ट्राजेनेका वैक्सीन का इस्तेमाल रोक दिया था जिसके बाद वहां बची हुईं वैक्सीन में दूसरे देशों ने दिलचस्पी दिखाई है.

अब चेक गणराज्य ने डेनमार्क से सभी एस्ट्राजेनेका वैक्सीन खरीदने की पेशकश की है. एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है.

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ऐसा क्यों हो रहा है

कुछ मामलों में वैक्सीन लगाने के बाद खून के थक्के बनने की समस्या सामने आई है. ऐसा खासतौर पर युवाओं में देखा गया है. लेकिन, वैश्विक स्वास्थ्य नियामकों का कहना है कि कोविड-19 से पैदा हुआ ख़तरा इससे कहीं ज़्यादा बढ़ा है.

अमेरिकी स्वास्थ्य नियामक के आंकड़ों के मुताबिक अगर एक करोड़ लोगों को एस्ट्राजेनिका वैक्सीन दी जाती है तो 40 लोगों में ख़ून के थक्के बन सकते हैं. इनमें से 10 लोगों की जान जा सकती है यानी इससे 10 लाख में एक व्यक्ति की मौत हो सकती है.

ये उसी तरह का ख़तरा है जैसा किसी की अगले महीने में जान जाने का या 250 मील तक गाड़ी चलाने के बाद दुर्घटना होना का ख़तरा होता है.

फिर भी डेनमार्क में सरकार ने एस्ट्राजेनेक के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फ़ैसला किया है. वहां के स्वास्थ्य प्राधिकरण का कहना है कि उनके पास दूसरी वैक्सीन भी हैं और वहां महामारी अभी नियंत्रित है. वो इसके गंभीर प्रतिकूल प्रभावों के चलते सावधानी बरत रहे हैं.

डेनमार्क एस्ट्राजेनेका से जो दो करोड़ 40 लाख खुराक खरीदने वाला था वो अब इस फ़ैसले के बाद नहीं खरीदेगा.

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अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन और ख़ून के थक्के बनने के लिंक की जांच की जा रही है. जब तक सुरक्षा जांच नहीं कर ली जाती तब तक ये वैक्सीन अमेरिका में बिना इस्तेमाल किए ही पड़ी रहेंगी. अमेरिका ने वैक्सीन की 10 करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया था.

दक्षिण अफ़्रिका में भी जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन का इस्तेमाल रोक दिया गया है. इसलिए वहां भी वैक्सीन की अनुपयोगी खुराकें बची हुई हैं. अध्ययनों में इस वैक्सीन को स्थानीय कोविड-19 पर ज़्यादा कारगर बताया गया था. इसके बाद जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन का इस्तेमाल शुरू हुआ था.

इससे पहले दक्षिण अफ़्रिका ने एस्ट्राजेनेका के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी थी क्योंकि उसे नए वैरिएंट पर कम प्रभावी पाया गया था. अब वहां एस्ट्राजेनेका की भी अनुपयोगी खुराकें पड़ी हुई हैं.

वैक्सीन की इन खुराकों की बर्बादी को रोकने के लिए दक्षिण अफ़्रिका ने एस्ट्राजेनेका की 10 लाख खुराक 14 अन्य अफ़्रिकी देशों में बांट दी हैं.

वैक्सीन की खेप

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वैक्सीन का कहीं और इस्तेमाल संभव?

सैद्धांतिक रूप से हां. ये देश अपनी बची हुईं वैक्सीन को बेचना या दान में देना चाहते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोपीय निदेशक हैंस क्लूग ने गुरुवार को बताया कि डेनमार्क ऐसा करना चाहता है.

उन्होंने कहा, "मैं समझता हूं कि डेनमार्क का विदेश मंत्रालय एस्ट्राजेनेका वैक्सीन को गरीब देशों को देना चाहता है."

डेनमार्क के कुछ पड़ोसियों ने इन वैक्सीन को खरीदने की पेशकश भी की है.

लिथुआनिया के प्रधानमंत्री इनग्रिडा शिमोनीटे ने कहा, "हमारे पास उससे कम वैक्सीन है जितने लोग यहां वैक्सीन लगाना चाहते हैं. इसलिए डेनमार्क जितनी खुराकें देना चाहता है उतनी हमने लेने की पेशकश की है."

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चेक गणराज्य के गृह मंत्री यान हामाशेक ने एक ट्वीट में बताया कि उन्होंने एक राजनयिक को निर्देश दिए हैं कि वो डेनमार्क की सभी एस्ट्राजेनेका वैक्सीन खरीदने में हमारी दिलचस्पी के बारे में अवगत करा दें.

डेनमार्क की सरकार ने इसे लेकर अभी तक कोई बयान जारी नहीं किया है.

इस बीच वैक्सीन को संरक्षित करके रखा गया है. एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन को फ्रिज के तापमान पर स्टोर करके रखा जा सकता है.

जबकि फाइज़र की वैक्सीन को -70 डिग्री पर रखना ज़रूरी है. इसलिए एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन को फाइज़र के मुक़ाबले एक से दूसरी जगह ले जाना आसान है.

इन वैक्सीन की एक्सपायरी भी है जो इस पर निर्भर करती है कि वैक्सीन किस कंपनी की है.

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कितनी वैक्सीन इस्तेमाल नहीं हुईं

इसका कोई वैश्विक रिकॉर्ड नहीं है लेकिन स्थानीय आंकड़ों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

जैसे यूरोपियन सेंटर फॉर डिज़ीज़ प्रिवेंशन एंड कंट्रोल के मुताबिक डेनमार्क को 15 अप्रैल तक एस्ट्राजेनेका की 202,920 खुराक मिली हैं.

इनमें से 150,671 खुराक का इस्तेमाल किया गया लेकिन 52,249 खुराक बची हुई हैं.

पूरे यूरोप में लगभग यही स्थिति है जहां कई देशों ने एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन के बुज़ुर्गों के लिए इस्तेमाल पर रोक लगा दी है.

यूएस सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के डाटा के मुताबिक अमेरिका के कई राज्यों में ज़रूरत से ज़्यादा वैक्सीन है.

इन राज्यों में 20 प्रतिशत से ज़्यादा वैक्सीन इस्तेमाल नहीं हुई है. इनमें अलाबामा (37%), अलास्का (35%), वर्मोंट (27%) और नॉर्थ कैरोलाइना (24%) शामिल हैं.

ब्लूमबर्ग के मुताबिक पहले वेस्ट वर्जीनिया में उसे मिल रहीं वैक्सीन की पूरी खेप का इस्तेमाल हो रहा था लेकिन अब कुल खुराक का एक चौथाई हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. हर दिन लगभग 350,000 खुराक बच रही हैं.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन बचने का एक कारण ये भी हो सकता है कि उस राज्य कुछ इलाक़ों में रहने वाले लोग वैक्सीन ना लगवाना चाहते हों.

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बची हुईं वैक्सीन देने की कोई योजना है?

हां है, इसे कोवैक्स कहते हैं.

ये एक अंतरराष्ट्रीय योजना है जिसका मकसद है निष्पक्ष तरीक़े से गरीब और अमीर सभी देशों तक वैक्सीन पहुंचाना.

विश्व स्वास्थ्य संगठन इसका नेतृत्व कर रहा है और इसमें ग्लोबल वैक्सीन अलायंस (गावी) और कॉलिशन फॉर एपिडेमिक प्रीपेयर्डनेस इनोवेशनंस (सेपी) भी शामिल हैं.

2021 के अंत तक 190 देशों के लोगों को कोवैक्स की दो अरब खुराक देने की उम्मीद है.

इस योजना के तहत बची हुई वैक्सीन के दान को अमीर देशों से गरीब देशों तक पहुंचाना भी शामिल है.

उदाहरण के लिए, ब्रिटेन ने लगभग 45 करोड़ वैक्सीन का ऑर्डर दिया है और वो अपनी बची हुईं वैक्सीन गरीब देशों में दान करने के लिए प्रतिबद्ध है. अन्य अमीर देशों ने भी ऐसी ही एकजुटता दिखाने के संकेत दिए हैं.

हालांकि, ऐसे देशों पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने ये नहीं बताया है कि उनके पास कितनी खुराक बची हैं और वो कितनी दान देना चाहते हैं.

फिलहाल अमीर देश कोवैक्स को फंड उपलब्ध कराने के साथ-साथ अपनी आबादी को वैक्सीन लगाने पर ध्यान दे रहे हैं.

वैक्सीन की खेप

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कब बांटी जाएंगी ये वैक्सीन

इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है.

हमने गावी से इस संबंध में पूछा कि अतिरिक्त वैक्सीन वाले कितने देशों ने कौवेक्स के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है.

गावी ने जवाब दिया, "निकट अवधि में सीमित आपूर्ति के माहौल को देखते हुए, अधिक आपूर्ति वाले देशों से दान की गईं खुराक और कोवैक्स फैसिलिटी के ज़रिए उनका समान आवंटन करना वैश्विक स्तर पर तेज़ एवं न्यायसंगत पहुंच बनाने के लिए महत्वपूर्ण होगा. हम अतिरिक्त खुराक साझा करने के लिए उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के साथ बात कर रहे हैं और जल्द ही हमारे पहले समझौते की घोषणा करने की उम्मीद करते हैं."

फिलहाल बची हुईं वैक्सीन को साझा करने के समझौते अभी प्रक्रिया में हैं लेकिन कौन क्या दे रहा है और किसे मिल रहा है, इसके बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है.

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